Friday, February 28, 2014

ख़ूँख़ार रात (आज के नेताओं की डरावनी राजनीति)


आँखों में उठता 
धुएं का गुबार है 
हवाओं में घुटती 
सिसकियों की पुकार है 
ख़ौफ़ का ये जाने 
कौन-सा प्रकार है 
घणी काली ये रात आज 
बड़ी ही ख़ूँख़ार है 

रात है ये सन्नाटों की 
भूतों की, पिशाचों की 
कुत्तों की हुँकारों की 
घात लगाए सियारों की
हब्सी हैं, अघोरी हैं
दहलाता अंधियार है  
लाशों पे हैं सबकी नज़रें 
आँखों से टपकती लार है 
घणी काली ये रात आज 
बड़ी ही ख़ूँख़ार है 

जिनके दांतों में ख़ून लगा 
वो नरभक्षी हैं घूम रहे 
सत्ता की है भूख इन्हें 
मदहोशी में झूम रहे 
अपनी हवस मिटाने को 
शैतान की ये ललकार है 
मंडराते काले सायों में 
चहुँओर चीत्कार है 
घणी काली ये रात आज 
बड़ी ही ख़ूँख़ार है 



Friday, February 21, 2014

यादें


बेफ़िक्र हाथों से खिंचती लकीरों में 
एक तस्वीर उभर कर आयी है 
डायरी के सूखे ग़ुलाबों से 
अहसास की ख़ुशबू लायी है 
ये यादों की पुरवाई है 

थोड़ी खट्टी, थोड़ी मीठी 
थोड़ी सौंधी, थोड़ी सूखी 
यादें हैं कुछ कच्ची-पक्की 
झिलमिल आँखें लायी है 
ये यादों की पुरवाई है 

जीवन का ये शहद अनोखा 
अवचेतन का संचय है 
किसी निमित्त से सतह पर आती 
अंतस की परछाई है 
ये यादों की पुरवाई है 

Sunday, February 16, 2014

अव्यक्त



कभी कुछ कहते हुए 
थोड़ा रह जाता हूँ मैं 
कभी आँखों के रस्ते 
थोड़ा बह जाता हूँ मैं 
मैं अव्यक्त हूँ 
एक पहेली-सा 
एक अनकही में 
कुछ कह जाता हूँ मैं 


अव्यक्त का अपना एक वजूद है 
व्यक्त उसका ही तो प्रकट स्वरुप है 
पर अव्यक्त किसका स्वरुप है ?
किस अमूर्त्य का मूर्त्य है ?
किसकी खोज है ?
किसको ढूँढता रह जाता हूँ मैं 
एक अनकही में 
कुछ कह जाता हूँ मैं 


कैसा हो कि 
हों दो अलग दुनियां 
एक व्यक्त की , 
एक अव्यक्त की दुनिया 
इस दुनिया में आये हों 
उस दुनिया से सभी 
जिस दुनिया में मौजूद हैं 
वो सभी 
जो व्यक्त न हुए 
यहाँ कभी 
पर उस दुनिया में भी 
उन्हें व्यक्त कहें 
या कहें अव्यक्त ही 
इस जवाब के लिए 
अव्यक्त की दुनिया में 
बह जाता हूँ मैं 
एक अनकही में 
जाने क्या कुछ 
कह जाता हूँ में 

बचपन



इस दुनिया में छिपी 
एक और दुनिया है 
जिस दुनिया में कोई 
क़ायदा नहीं होता 
बस प्यार होता है 
आँखों में मासूमियत होती है 
असीम विश्वास होता है 
निहीत स्वार्थ और 
फ़ायदा नहीं होता 


यहाँ शेर को बचाता एक चूहा है 
ख़रगोश को हराता एक कछुआ है 
हमारी दुनिया की तरह कोई 
भेड़ की खाल ओढ़े 
भेड़िया नहीं होता 


इस दुनिया का हर शख्स 
क़बीर है 
जीता है बस 
इस एक पल को 
हमारी दुनिया कि तरह यहाँ कोई 
सिद्धान्तों का दिखावा नहीं होता 


बचपन एक दुनिया ही है 
ये कोई दौर नहीं होता 
क्योंकि दौर तो गुज़र जाते हैं 
पर बचपन कभी बूढ़ा नहीं होता 
बचपन कभी बूढ़ा नहीं होता 

अंशि



नंगे पंजों के बल दौड़ते हुए
गिरने के बाद जो सौंधा अहसास है 
रोज़मर्रा कि फीकी ज़िन्दगी के बीच 
जो मिश्री की मिठास है 

पुतलाये ठूंठ मुखौटों के बीच 
जो किलकारी कि आवाज़ है 
दशहत से पथराई आँखों के बीच 
जो परियों का  मासूम ख्वाब है 

कंटीली दुनियादारी के मरुस्थल में 
फूटती नई कपोल पे ओस कि महक 
यकीं नहीं होता 
वो कस्तूरी मेरे इतने पास है 

अटाला



एक कहानी जिसे सुनाना बाक़ी है 
एक तस्वीर जिसे उतारना बाक़ी है 
यादों और ख्वाहिशों के गलीचों के बीच 
कुछ ऐसा है जिसे अभी टटोलना बाक़ी है 

सोचता हूँ घर के टाँड़ पे पड़े 
काठ के टूटे घोड़े में 
चंद कीलों के पैबंद लगा किसी बचपन को दे दूँ 
कि कल की यादों में 
आज के लम्हों को बचाना बाक़ी है 

और...  कुछ झपटी हुई पतंगें हैं 
जिन्हें उड़ाना बाकी है 
लूटा हुआ मांजा है ज़िन्दगी-सा 
जिसे अब भी सुलझाना बाकी है 
रद्दी हुए अखबारों कि एक नाव 
जिसे बौछारों में बहाना बाकी है 
और भी न जाने क्या क्या छुपा है 
यादों के इस अटाले में 
बस टाट का ये पर्दा हटाना बाकी है