Friday, April 4, 2014

चल जाने दो



कब से आख़िर तपते-तपते झुलस गया होगा 
मेरे हिस्से का जो सूरज ढलता है ढल जाने दो 

भाले,बर्छी और कटार, बहुत बना लिए सबने 
ये लोहा जो वीणा में, ढलता है ढल जाने दो 

ज़मीर को अपने बेच कर, ऊंचे महल जब बनवाये  
ईमान का भी जो थोड़ा कुछ, फलता है फल जाने दो 

मैं तो आँखों देखी कहता, तुम जानो अपने दिल की 
मेरा कहा अगर किसी को, खलता है खल जाने दो 

मुजरिम जब अब मान लिया है, बिना किसी सुनवाई के 
फैसले का जो दिन भी गर, टलता है टल जाने दो  

चलता है धड़ल्ले से, अब जब काला पैसा भी 
किसी ग़रीब का खोटा सिक्का, चलता है चल जाने दो 

7 comments:

  1. कल 06/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. एक निवेदन
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।
    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।
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    अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न वीडियो देखें-
    http://www.youtube.com/watch?v=VPb9XTuompc

    धन्यवाद!

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  3. एक निवेदन और-
    कृपया अपने ब्लॉग पर follow option जोड़ लें इससे आपके पाठक भी बढ़ेंगे और उन्हें आपकी नयी पोस्ट तक आने मे सुविधा रहेगी।
    अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न वीडियो देखें-
    http://www.youtube.com/watch?v=ToN8Z7_aYgk

    सादर

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  4. शुभ प्रभात
    पसंद आई आपकी रचना
    सादर

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  5. वाह क्या खूब लिखा है अभिषेक भाई...

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  6. वाह लिखा है अभिषेक भाई...

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