Sunday, April 13, 2014

भारतीय संस्कृति की परिभाषा


बड़े दुःख की बात है कि आज हमारे यहाँ ऐसे लोग और ऐसे संगठन आ गए हैं जो 'हमारी संस्कृति' और 'उनकी संस्कृति' कर रहे हैं। ये कहते हैं कि हिंदुस्तान १२०० सालों से ग़ुलाम है कहते हैं कि वे भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए कटिबद्ध हैं।


महोदय, भारतीय संस्कृति की कोई एक परिभाषा है ही नहीं। कई लोग अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि को ही भारतीय संस्कृति समझते हैं। भारतीय संस्कृति तो एक चलायमान फेनोमेना है। भारतीय संस्कृति का स्वरुप तो इतना व्यापक है कि जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।


राजस्थान के बीकानेर में करणी माता का एक मंदिर है जहां चूहों को भी प्रसाद चढ़ाते हैं। उज्जैन के काल भैरव के मंदिर में भोले बाबा को शराब चढ़ाई जाती है। हाल ही में एक ब्लॉग में एक सज्जन ने लिखा था कि उनके यहाँ ईष्टदेव के रूप में बेताल की पूजा की जाती है, जी हाँ बिक्रम-बेताल वाले बेताल की। केरल के सुब्रह्मण्यपुरम के मुरुगन स्वामी को चॉकलेट का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कुन्नूर के श्री मुथप्पन मंदिर में भुनी मछली का प्रसाद चढ़ाया जाता है और कुछ लोग कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में मांस खाना वर्जित है। कोलकता में एक चाइनीज़ काली मंदिर है जहां नूडल्स का प्रसाद चढ़ाते हैं और हमारे खाप वाले माननीय गण कहते हैं कि नूडल्स खाने से बलात्कारी प्रवृत्ति बढ़ती है। और तो और जोधपुर के नज़दीक स्थित है ॐ बन्ना मंदिर जहां बुलेट ३५० मोटरसाइकिल की पूजा की जाती है। महोदय, ये भारत देश इतना अनोखा और अद्भुत है कि आपको पल प्रतिपल आश्चर्यचकित करता है। हमारे उत्तर पूर्व प्रदेशों, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा आदि, की संस्कृति भी भारतीय संस्कृति का ही हिस्सा है और जो आदिवासी और जनजातियां झारखंड और ओडिशा के वन आच्छादित क्षेत्रों में बसते हैं, उनका खान-पान, पहनावा, परम्पराएं और मान्यताएं भी भारतीय संस्कृति का ही हिस्सा हैं। भारतीय संस्कृति तो है ही विविधता का नाम।


हमारी संस्कृति इतने खुले विचारों की है जहां कई पंथों ने अपनी नींव रखी। सिख, जैन और बौद्ध धर्म यहीं बने। जो बाहर से आये वो भी यहीं के हो गए। साईं बाबा ने जब कहा - सबका मालिक एक, तब क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सभी उनकी वन्दना को आये। अजमेर की दरगाह हो या हाजी अली का समुन्दर या फिर अमृतसर का सोमनाथ मंदिर सभी हिन्दू मुस्लिम सिख वहाँ सर पे कपड़ा रख के माथा टेकने जाते हैं।


हिन्दू लडकियां सलवार-कमीज़ पहनती हैं और मुस्लिम महिलाएं साड़ी अपने चटख रंगों की चमक के साथ। मेहंदी की खुशबू हिन्दू मुस्लिम सभी शादियों में एक सी महकती है। १८५७ की क्रांति में भी क्रांतिकारी दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह ज़फर के लिए ही तो लड़े थे जिसमें खूब लड़ी मर्दानी रानी झांसी की तलवार चमकी थी। जब उस्ताद बिस्मिल्ला खान अपनी दुर्गा के लिए राग भैरवी बजाते थे तो उनकी शहनाई सुन कर मौलानाओं की भी आँखें बंद हो जाती थीं। उर्दू की पैदाइश हिंदुस्तान में हुई जिसमें मिर्ज़ा ग़ालिब से ले के शहरयार और गुलज़ार तक ने ग़ज़लें लिखीं और जिन्हें जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दे कर ग़ज़ल सम्राट की उपाधि पायी। आज भी हमारे मंदिरों में मुहम्म्द हुसैन अहमद हुसैन के भजन बजते हैं। ईद की सिवइयों का इंतज़ार हिन्दू पड़ोसियों को भी रहा करता है। राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर आपने क़त्ल-ए-आम मचा दिया। आपको पता भी है कि अयोध्या के मंदिरों के बाहर फूल और प्रसाद बेचने वालों में कितने मुसलमान हैं?


इसलिए महोदय, मेरा आपसे नम्र निवेदन है कि आप भारतीय संस्कृति की रक्ष की फिक्र न करें। ये तब से फलती फूलती रही है जब आपके बाप दादे भी इस पावन धरती पर अवतरित नहीं हुए थे। यहाँ के लोगों को तो आप बस अपनी बिरयानी के दम का लुत्फ़ लेने दें और हो सके तो अपनी राजनीति थोड़ी साफ़ कर लें। इस संस्कृति में अफीम के बीज बोना आप बंद करें। अगर रक्षा करनी ही है तो इसके साझेपन की रक्षा करें।

इतिश्री।।

No comments:

Post a Comment