Friday, November 28, 2014

इलाहाबाद में अस्थि विसर्जन

पिछले दिनों मेरी दादी का देहावसान हुआ था। हम लोग अस्थि विसर्जन के लिए इलाहाबाद गए थे। मैं पहली बार अस्थि विसर्जन के लिए गया था। इतना तो मुझे पता था कि ये कोई फिल्मों की तरह का अस्थि विसर्जन नहीं होगा जिसमें शाहरुख खान अकेले ही नदी में खड़े हो कर अस्थि प्रवाहित कर दे और डुबकी लगा ले। ये धार्मिक आडंबरों से ओतप्रोत कोई कार्यक्रम होगा, लेकिन मैं आडंबरों के परिमाण को देखना चाहता था। हिन्दी फिल्में तो यथार्थ से इतनी दूर होतीं हैं कि कभी नायक अपने पिता की मृत्यु में बाल भी नहीं देता। सिर्फ एक फिल्म मुझे याद है 'नेमसेक' जिसमें ऐसा हुआ था, लेकिन उसमें इसे महिमामंडित किया था और इसे हमारी जड़ों के साथ जोड़ा गया था।

हमें इलाहाबाद में संगम जाना था। मुझे चाचा ने बताया था कि हमें हाथी पंडा के पास जाना था। मैं उम्मीद कर रहा था कि जैसे ही हम वहाँ पहुंचेंगे पंडा हमें ऐसे घेर लेंगे जैसे रेल्वे स्टेशन के बाहर ऑटो वाले। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमारी गाडियाँ जैसे ही उस क्षेत्र में पहुँचीं, एक मोटरसाइकल वाले आदमी ने हमें रोका। वो कुछ पूछता इससे पहले ही चाचा ने बोल दिया- "हाथी पंडा"। वो बोला-"पीछे आओ"। और फिर हमारी गाडियाँ उसकी मोटर साइकल के पीछे चल पड़ी। माहौल किसी बड़े से हाट सा लग रहा था।  सभी पंडा लोगों के अलग अलग पंडाल थे। हर पंडाल में एक झण्डा लगा हुआ था जिसमें उस पंडा का चिन्ह था, किसी राजनीतिक पार्टी के चुनाव चिन्ह सरीका। भैंस, शेर, भालू, बैलगाड़ी, नाव, घोडा, यहाँ तक कि रेलगाड़ी और हवाईजहाज वाले पंडा भी थे। कुछ देर में हम हाथी वाले पंडा के पंडाल के आगे रुक गए। इनके पंडाल में हाथी का झण्डा लगा था। चाचा ने बताया कि ये लोग एक दूसरे के 'यजमान' नहीं हथियाते, जो जिस पंडा का यजमान है उसी के यहाँ जाता है।

पंडाल में मौजूद पंडा ने हमें तखत पर बैठाया। हमारे लिए चाय का ऑर्डर दिया गया। उन्हें बताया कि हम लोग गाँव अमखेड़ा, जालौन से आए हैं। मैं थोड़ा इधर उधर का माहौल देखने लगा। आगे एक बहुत बड़ा होटल सा लग रहा था। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अगर ये पंडा लोग पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते हैं तो आज तक इन्होंने अपने पक्के स्ट्रक्चर क्यों नहीं खड़े किए। हर जगह टाट, तिरपाल और कपड़ों के पंडाल बंधे हुए थे। बाद में किसी ने बताया कि ये ज़मीन होटल वालों की है और वो इस पर पक्का कुछ भी खड़ा नहीं करने देते। इन सबका भी ठेका होता है। जगह जगह दीवारों पर गंगा की सफाई के नारे लिखे थे- "गंगा दर्शन ही गंगा स्नान है"। लेकिन मुझे गंगा का काला पानी देख कर लग नहीं रहा था कि इस नारे का कुछ असर हुआ है। हो सकता है कि मैं बरसात के मौसम में आया था इसलिए पानी कुछ ज़्यादा ही गंदा लग रहा था। और वैसे भी भक्तों को केवल दर्शन से चैन थोड़े ही मिलेगा, स्नान तो वे करेंगे ही। हर पंडाल में कुछ बड़े बड़े लोहे के बक्से रखे थे। हाथी पंडा के यहाँ भी थे। इनमें यजमानों का लेखा जोखा था। मैं इधर उधर ताकने के बाद वापस आया तब तक एक बक्सा खुल चुका था और उसमें से एक मोटा सा लेखा निकल चुका था। लेखा के ऊपर एक खाकी हरे रंग का कवर भी था ताकि अंदर तक सीलन ना पहुंचे और लेखा पीढ़ियों तक चलता रहे। पंडा ने कवर हटाया, उसके ऊपर जालौन लिखा था। कुछ पन्ने पलटने के बाद उन्होने हमारा पन्ना खोज निकाला।

एक वंश को दो पेज आबंटित होते हैं। हमारे पन्ने के ऊपर हमारे दादाजी के दादाजी का नाम लिखा था। हमारे खानदान से सबसे पहले उनकी ही अस्थियों के विसर्जन के लिए उनके पुत्र इन हाथी वाले पंडाजी के यहाँ आए थे। लेखा में उन लोगों के नाम भी लिखे थे जो अस्थियाँ लाये थे और उन सभी लोगों के भी जो उन सभी उपस्थित लोगों के वंश को आगे बढ़ाने वाले थे। यानि उनके सभी पुत्रों के, और उनके पुत्रों के, और उनके पुत्रों के, इस तरह उनके पास पूरी वंशावली थी। मुझे भी कहा गया कि मैं भी अपना नाम लिखवा दूँ इस वंशावली में लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरा नाम पहले से ही मौजूद था। खैर मेरे चाचा ने अपने पोते का जो अभी 2 साल का है उसका नाम ज़रूर जुड़वा दिया। मेरी मम्मी ने मुझे अपनी बेटी का नाम लिखवाने के लिए कहा लेकिन - "औरतों का नाम नहीं लिखा जाता"। अब बारी आई इस बार के प्रयोजन की तो लिखवाया गया हमारी दादी का नाम और उनकी अस्थि विसर्जन में जो जो पहुंचा था उनका नाम। बुआ ने कहा मेरा भी नाम लिखो, ताऊजी ने दूर से ही कहा- "औरतों का नाम नहीं लिखा जाता"। ये बात बुआ को नागवार गुज़री। उन्होंने कहा- "अपनी माँ की अस्थि विसर्जन करने आए हैं तो नाम तो लिखेगा ही।" ताऊजी सरेंडर। ताना देते हुए बोले- "लिख दो भाई इनका भी नाम। औरतों का तो आजकल बराबरी का हिस्सा है।" बुआ बोलीं- "मैं कोई हिस्सा थोड़े ही मांग रही हूँ भाईसाहब, नाम ही तो लिखने को कह रही हूँ। माँ तो वे सबकी थी और आए भी सभी हैं।" मुझे मज़ा आ गया बुआ की इस बात पर। खैर बुआ का और शायद सभी महिलाओं का नाम लिखा गया। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि ये नाम वंशावली वाले नहीं थे बल्कि इस बाबत थे कि कौन-कौन व्यक्ति अस्थि विसर्जन करने आया है। वंशावली में औरतों का नाम नहीं लिखा जाता, मेरी बहन का नहीं लिखा गया ना ही मेरी बेटी का। अपनी बेटी का नाम लिखवाना मेरी प्राथमिकता भी नहीं थी। इसलिए मैंने बुआ की तरह कोई विरोध भी नहीं किया। खैर फिर शुरू हुई पूजा। चाचा तखत पर बैठे। पिंडदान वही करता है जिसने दाह संस्कार किया हो और दाह संस्कार सबसे बड़ा या सबसे छोटा पुत्र करता है। पिंडदान का पिंड आटे की एक बड़ी सी लोई की तरह होता है (शायद आटे की लोई न हो पर दिखता वैसा ही है) और उसकी पूजा की जाती है। पूजा के बाद जब हमने पिंड देखा तो उस पर तमाम सिंदूर, चावल, कलावा और बहुत कुछ चढ़ा था। अस्थियाँ जो एक प्लास्टिक की एक थैली में लायी गईं थीं उनकी भी कुछ पूजा हुई। पंडा मंत्र पढ़ते गए और बताते गए कि कैसे कैसे पूजा करना है।

दादी का जब दाह संस्कार किया गया था तो उनकी पैरों की बिछिया और हाथ की एक चूड़ी जो चांदी की थी, और नथ जो सोने की थी पंडित जी ने उतरवा दी थीं। उनको भी अस्थियों के साथ विसर्जित करना था। पंडा को वो सब आइटम भी दे दिये गए। पंडा ने बड़ी चतुराई से हाथ की छींगली उंगली में सोने की नथ दबा के बाकी चांदी के आइटम अस्थियों के साथ मिला दिये। बाकी किसी का ध्यान नहीं गया पर चाचा का ध्यान चला गया। चाचा ने पहले ही देख लिया था कि ये नथ उंगली में दबा रहा है और उन्होने पंडा से कहा भी कि लाइये मुझे दीजिये पर पंडा ने जल्दी जल्दी बाकी सारी चीज़ें मिला दीं और ऐसे बर्ताव किया जैसे उसने कुछ भी नहीं दबाया। चाचा ने बाद में हमसे कहा -"मैंने सोचा कि छोड़ो अब किसी न किसी को तो मिलना ही है पर गंगा का जल छू जाता और उसके बाद कोई ले लेता तो मुझे दुख नहीं होता।" अब बारी थी संगम तक जाने की। पंडा ने दो नाव बुक करवाईं हम लोगों के लिए। उसने हम से कहा- "आपको संगम तक जाना है और प्रतिव्यक्ति 10 रुपये से ज़्यादा नहीं देना है। नाव वाला बीच में और ज़्यादा माँगेगा पर आप सिर्फ इतना ही देना। संगम में स्नान करने का कुल 100 रुपया दे दीजिएगा। इससे ज़्यादा नहीं। संगम पर ही आपको अस्थि विसर्जन करना है। वहाँ पर पंडित लोग कुछ कुछ बोलेंगे उस पर ध्यान नहीं दीजिएगा। हर चीज़ का पैसा लगता है।" हम लोग दो नावों में चल दिये। पानी एकदम काला दिख रहा था। शायद बरसात की वजह से। हालांकि मैं स्नान का इच्छुक नहीं था पर अक्सर ही मैं रीती रिवाजों के बीच आस्तिकों और श्रध्द्धालुओं का दिल नहीं दुखाता जब तक कोई ठोस कारण ना हो। नाव में चढ़ने से पहले कई सारे डिब्बे खरीद लिए गए थे गंगाजल भरने को। उनकी कीमत शायद 20 रुपये प्रति डिब्बा थी।

नाव थोड़ी आगे चली तो केवट ने शुरू किया- "उस ओर से कानपुर से गंगा आ रही है और इस ओर से दिल्ली से जमुना आ रही है। वहाँ पर संगम है जहां आपको लकीर दिखाई दे रही है। इस घाट पर लेटे हनुमान जी का मंदिर है। उस घाट पर (मुझे याद नहीं किसका) किला है। सरस्वती इनके नीचे से बहती है जो दिखाई नहीं देती जैसे कि हवा है हमें महसूस होती है पर दिखाई नहीं देती, जैसे कि आवाज़ है सुनाई तो देती है पर दिखाई नहीं देती। वैसे ही सरस्वती है जो है तो पर दिखती नहीं।" फिर उसने बोला-"किसकी अस्थियाँ है?" ताऊजी ने बताया-"माँ की"। उसने कहा-"सबकी नैया पार लगाने वाले भगवान राम की नैया एक केवट ने पार लगाई थी आज आपकी माता जी की नैया ये केवट पार लगा रहा है। श्रद्धा से जो ठीक समझें दे दीजिये।" सब लोगों से एक सुर में कहना शुरू किया- "नहीं नहीं। अभी कुछ नहीं। जितनी बात हुई थी उतना ही देंगे।" केवट बोला- "अरे! अपनी माँ के कार्यक्रम के लिए आए हो, इतना नहीं कर सकते।" लेकिन उसका इमोशनल अत्याचार चल नहीं पाया। फिर वो बोला-"हाथी निकल गया भैया और तुम पुंछ पकड़ कर लटक गए!" उसकी बात सुन कर सब ठहाका लगा कर हंस पड़े।

संगम आया। चाचा ने थैली का मुंह खोला। बाजू में दो तीन लड़के पानी में गोता लगाने को तैयार खड़े थे। जैसे ही चाचा ने थैली पलटाई लड़के पानी में गोता लगा दिये। एक ने तो, जो बिलकुल बाजू में था, ऐसा गोता लगाया कि आधी अस्थियाँ तो शायद पानी के नीचे उसने ही लपक लीं। शायद उनमें से किसी को बिछियाँ और चूड़ी मिल गईं हों। नथ तो खैर पहले ही पंडा हड़प चुका था। संगम पर कई बड़ी बड़ी नावों ने आपस में मिल कर एक घेरा बनाया हुआ था। बीच घेरे में पानी के अंदर नीचे लकड़ी के पटिये बंधे थे, जो घेरे की नावों से बंधे थे। श्रद्धालुओं को अपनी नाव से इस घेरे वाली नाव पर आना था फिर पानी में डूबे उन पटियों पर उतरना था और डुबकी लगानी थी। सब ने बारी बारी से स्नान किया। मोबाइल से अस्थि विसर्जन की और गंगा स्नान की कुछ तस्वीरें भी उतारी गईं।

मैंने भी स्नान किया। हालांकि पानी देख कर स्नान करने का मन बिलकुल नहीं था, पर मैं बड़े बुज़ुर्गों से विद्रोही का मेडल नहीं जीतना चाहता था। वैसे भी पानी इतना गंदा था कि मेरे नहाने से पानी तो क्या गंदा होता उल्टे मुझे अपने ही गंदे होने का डर लग रहा था। स्नान करने के बाद एक आदमी जो वहाँ बैठा था मुझे हाथ में दूध का एक गिलास देते हुए बोला- "दूध अर्पित कीजिये"। मैं समझ गया कि ये इसके 10-20 रुपये माँगेगा। मैंने कहा- "नहीं ऐसे ही ठीक है"। दूध भी बस कहने को था। 90 प्रतिशत तो पानी था। कुछ लोग वहीं पर हवन भी करवा रहे थे। बाद में मुझे पता चला यहाँ हर चीज़ का ठेका होता है। संगम में पटिये लगा कर स्नान करवाने से लेकर दूध चढ़वाने और यहाँ तक कि गोता लगाने वालों तक का। ऐसा नहीं कि कोई भी जाये और गोता लगाकर अस्थियों में से सोना-चांदी लूटने लगे। फिर हम लोग वापस लौटने लगे। लौटने का मार्ग अलग था थोड़ा सा। शायद इन नाविकों में भी नम्बर सिस्टम चलता है। इसे अब सबसे पीछे लगाना था। जहां से लौटना था वहाँ का पानी थोड़ा उथला था। दो नावों में कुल तीन केवट थे। हमारी नाव में दो और दूसरी नाव में एक। उथले पाने की वजह से केवट के चप्पू (मुझे दूसरा शब्द नहीं पता) दलदल में फंस सकते थे। इसलिए केवट को उतार कर पानी में धक्का लगाना पड़ रहा था और दूसरा आगे से खींच रहा था। दूसरी नाव जिसमें महिलाएं थीं उसमें तो एक ही मल्लाह था और उसे तो अकेले ही नाव को धक्का भी लगाना पड़ रहा था और अकेले ही खींचना भी पड़ रहा था। पानी की धार भी उल्टी थी इसलिए मेहनत भी और ज़्यादा लग रही थी। खैर, हम लोग किनारे पहुंचे और केवट को चैन मिला। किनारे के दलदल भरे पानी में भी कई लोग मिट्टी टटोल रही थे। पन्नी में मिट्टी भरते फिर उसे टटोलते कि शायद कोई सोना, चांदी या सिक्के मिल जाएँ। दूसरी नाव किनारे पर आ रही पर एक आदमी इतना तल्लीन हो के मिट्टी टटोल रहा था कि उसे नाव दिखी ही नहीं। वो तो भला हो कि सबने शोर मचाया तो उसका ध्यान गया और वो नाव के रास्ते से हटा, नहीं तो नाव उस पर चढ़ने ही वाली थी। पापा ने केवट को 500 रुपये दिये तो केवट खुश हो गया। उसने इतनी उम्मीद नहीं की थी। पापा ने भी उसकी मेहनत देख कर उसे 500 दे दिये थे। वो काम वाकई बहुत मेहनत का था। फिर ताऊजी ने केवट से कहा- "अब तो पूंछ निकल गई भैया?" और फिर सब ने एक जोरदार ठहाका लगाया। मल्लाह भी मुस्कुरा दिया। फिर उसने बताया कि उन्हें जो पैसे मिलते हैं उनमें से आधे पैसे तो पंडा लोग ले लेते हैं। पंडाल में लौटते वक़्त कुछ भिखारी भी मिले लेकिन उन्हें हम में से किसी ने भी कुछ भी नहीं दिया।

हमारे ड्राइवर ने भी एक बिसलेरी की बोतल दी थी गंगा जल भर लाने को। सारे डिब्बे और बोतलें संगम पर ही भर लीं गईं थीं। पानी इतना काला था पीने की सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन सारे बड़े लोग गंगाजल की तारीफ पर तारीफ कर रहे थे- "ये पानी इतना शुद्ध है कि कितने भी साल रखे रखो कभी कीड़े नहीं पड़ते। साधारण पानी को आप रख के देख लो, थोड़े ही दिनों में कीड़े पड़ जाएँगे। इसीलिए तो इसका महत्व है। दुनिया भर के वैज्ञानिक आश्चर्य करते हैं कि गंगा में ऐसा क्या है कि इसका पानी कभी खराब नहीं होता।"

खैर हम लोग वापस पहुंचे तो पंडा ने सबके हाथ में कलावा बांधा और 21000 रुपये की दक्षिणा मांग ली- "आपका हमारा साथ तो हमेशा का है। आप हमेशा हमारे यहाँ आते रहेंगे। पीढ़ियों का रिश्ता है। आपसे मांगना तो हमारा अधिकार है। देना आपकी श्रद्धा है। हमने तो बता दिया, अब आपकी जो मर्ज़ी हो दे दीजिये।" उसे कुल कितनी दक्षिणा दी, ये तो मुझे याद नहीं, लेकिन 21000 तो निश्चित रूप से नहीं ही दी थी। हमने फिर पंडा जी से बिदा ली। खाना हम लोग साथ लाये थे, वही जो उत्तर भारत में लगभग सभी लोग सफर में ले जाते हैं- पूरी, सब्जी, आचार और सेंव। पंडा ने बताया था- "आप लोग खाना लेटे हनुमान के मंदिर के बाहर जो मैदान है वहाँ बैठ कर खा लीजिये। लेकिन मंदिर के अंदर दर्शन के लिए मत जाइएगा। त्रयोदशी तक किसी का भी मंदिर में जाना वर्जित है।"

हम लोगों ने मंदिर के बाहर बने पार्क में चादरें बिछा कर खाना खाया। ताईजी और शायद चाची ने मंदिर के बाहर से ही कोशिश की कि शायद लेटे हनुमान के दर्शन हो जाएँ, लेकिन उन्हें वहाँ से हनुमानजी ने दर्शन नहीं दिये। मंदिर के अंदर तो जाने का प्रश्न ही नहीं था। पंडा ने पहले ही मना कर ही दिया था। खाने के बाद हम लोग वापस कटनी के लिए चल दिये।

गांधी जी की आत्मकथा 'सत्य के मेरे प्रयोग" में उन्होने अपनी काशी यात्रा का ज़िक्र किया है, जो मुझे प्रयाग (इलाहाबाद) यात्रा के इस पूरे घटनाक्रम में बराबर से याद आती रही। एक अंश इस प्रकार है:
संकरी, फिसलन वाली गली में से होकर जाना था। शांति का नाम भी नहीं था। मक्खियों की भिनभिनाहट तथा यात्रियों और दूकानदारों का कोलाहल मेरी सहन-शक्ति से परे था। जिस जगह मनुष्य ध्यान और भगवत-चिंतन की आशा रखता है, वहाँ उसे इनमें से कुछ नहीं मिलता। यदि ध्यान की ज़रूरत हो तो उसे अपने अंदर से पाना होगा। मंदिर में पहुँचने पर दरवाजे के सामने बदबूदार सड़े हुए फूल मिले। अंदर संगमरमर का बढ़िया फर्श था लेकिन किसी अंध श्रद्धालू ने उसे रुपयों से जडवाकर खराब कर डाला था और रुपयों में मैल भरा था।
दक्षिणा के रूप में कुछ चढ़ाने की मेरी श्रद्धा नहीं थी। इसलिए मैंने सचमुच ही सिर्फ एक पाई चढ़ाई, जिससे पुजारी पंडाजी तमतमा उठे। उन्होने पाई फेंक दी। दो-चार गालियां देकर बोले- "तू यों अपमान करेगा तो नर्क में सड़ेगा।" मैं शांत रहा। मैंने कहा- "महाराज, मेरा तो जो होना होगा सो होगा, पर आपके मुंह से गाली शोभा नहीं देती। यह पाई लेनी हो तो लीजिये, नहीं तो यह भी हाथ से जाएगी।" "जा तेरी पाई मुझे नहीं चाहिए", कहकर उन्होने मुझे दो-चार और सुना दीं। मैं पाई ले कर चल दिया। मैंने माना कि महाराज ने पाई खोई और मैंने बचाई। लेकिन महाराज पाई खोने वाले नहीं थे। उन्होने मुझे वापस बुलाया और कहा- "अच्छा, धर दे। मैं तेरे जैसा नहीं होना चाहता। मैं ना लूँ तो तेरा बुरा हो।" मैंने चुपचाप पाई दे दी और लंबी सांस लेकर चल दिया। इसके बाद मैं दो बार काशी-विश्वनाथ के दर्शन कर चुका हूँ, लेकिन वह तो 'महात्मा' बनने के बाद। इसलिए 1902 के अनुभव तो फिर कहाँ से पाता। मेरा 'दर्शन' करने वाले लोग मुझे दर्शन क्यों करने देते? 'महात्मा' के दुख तो मेरे जैसे 'महात्मा' ही जानते हैं। अलबत्ता, गंदगी और कोलाहल तो मैंने पहले जैसा ही पाया।
किसी को भगवान की दया के बारे में शंका हो, तो उसे ऐसे तीर्थ देखने चाहिए। वह महायोगी अपने नाम पर कितना ढोंग, अधर्म, पाखंड इत्यादि सहन करता है? उसने तो कह रखा है
ये यथा मां पद्यन्ते तांस्तथैव भ्जाम्यहम
अर्थात 'जैसी करनी वैसी भरनी'। कर्म को मिथ्या कौन कर सकता है? फिर भगवान को बीच में पड़ने की ज़रूरत ही क्या है? उसने तो अपना कानून बनाकर अपना पल्ला झाड लिया।

लौटते वक़्त गाड़ी में मुझे बड़े ताऊजी की बात याद आई, जो उन्होने नाव में अपना पर्स खंगालते हुए बोली थी- "कोई चिल्लर मिले तो गंगा जी में डाल दें।"

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