Saturday, April 2, 2016

खला



ऐ अक्स मेरे! क्यूँ मुझसे मुलाक़ात नहीं करते?
रहते हो अनमने से, कोई बात नहीं करते!
वक़्त तो ला खड़ा करता है हमें दोराहे पे लेकिन
इंतिख़ाब* हमारी राहों का, क्या हालात नहीं करते?

हर फैसला मुताहिदहोगा ज़िंदगी में, ये उम्मीद ही बेमानी है
है सुबूत कोई, मुखौटे सारे तब भी यूं फसादात नहीं करते?

ज़िंदगी कमीलहै इन खलाओंके ही जानिब*
ख्वाहिश और तकमीलदोनों कोज़ाहिरएक साथ नहीं करते

अधूरापन ही तो भरता है इस वरनाखाली ज़िंदगी को
क्या करते हयातका जब रोज़ नई शुरुआत नहीं करते 

इंतिख़ाब: selection
मुताहिद: correct
कमील: perfect
खलाओं: emptiness
जानिब: support
तकमील: perfection
ज़ाहिर: manifest
वरना: otherwise

हयात: life