Friday, April 14, 2017

पंखुड़ी




कई बार अतीत बीत कर भी नहीं बीतता और वर्तमान आकर भी नहीं आता। आज साल भर बाद भी उस घर के बीते हुए लम्हें सीत के उभरे नक्शों की शक्ल में उसकी दीवारों से चिपके टंगें थे। उन दीवारों के दायरे में क़ैद धुएँ के गुबार, बरसाती मौसम के बदबूदार चिपचिपे कपड़े, दीवान की चादर पर चिपकी चिकत्ती सब मिलकर अतीत के उन नक्शों से यादों की चूती पपड़ियों को रोज़ देखा करते। बरसात में उस घर का अतीत और भी चिपचिपा हो गया था। छत से लटके उस पंखे की तरह जो धुएँ की कालिख को अपनी पंखुड़ी से चिपकाए रोज़ बेहिसी से उसके ऊपर मंडराया करता। कमरे में रखे उस फर्नीचर की तरह जो अपने भीतर की कुरेदती दीमक को अपनी आत्मा से चिपकाए इंतज़ार में खड़ा रहता ऐसे ही किसी एक दिन भुरभुरा के गिर पड़ने के लिए। उसी भुरभुराते सोफ़े पर बैठा वो सोचा करता कि सुलगती सिगरेट शायद भीतर जाकर सीत की चिपचिपी दरारों, उनमें उभरे नक्शों और उनसे चूती अतीत की पपड़ियों को भरेगी, लेकिन वो सिगरेट महज़ उसके सामने शून्य में तैरती एक एशट्रे ही भर पाती।

एक और शून्य भी था उस घर में। एक और एशट्रे भी... जिसमें सुधा अपनी आत्मा पर चिपके अपने अपराध-बोध की राख़ जमा करती। न बीरेन की दरारें ही भरतीं थीं, न सुधा का अपराध-बोध ही खुरचता था। जब वो बाहर दीमक लगे सोफ़े में भुरभुराता बैठा रहता, वो भीतर अपने पलंग पर लेटे, दवाइयों के कडवेपन को अपने ज़ेहन से चिपकाए, उम्मीदों की बत्ती बंद किए, अतीत के झीने रोशनदान से रिसते शून्य में तैरती पड़ी रहती। सिरहाने एक ढंका गिलास रखा रहता जिसके पानी में घुले गुनाह उसके भीतर तैरते कडवेपन को और भी भीतर तक ठेल देते। आँखों ने काफी पहले रोशनी बर्दाश्त करना छोड़ दिया था। दोनों कमरों के बीच का एक साझा अतीत भी था जो साल भर पहले अपने धड़े से दो फाँकों में बंट चुका था। जब अतीत बंटता है तो उसके तमाम किरदार गौण हो जाते हैं... शून्य की तरह... कभी झीने रोशनदान से रिसते हुए, कभी एशट्रे में अपनी भुरभुरी कालिख जमा करते हुए। रोशनदान और एशट्रे के बीच एक काला गुबार भी जमा हो चुका था... जो न फटता था, न ख़त्म होता था। उतना ही ताज़ा बना रहता, उतना ही सख्त। साल भर हुए दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी। उनकी बेटी पंखुड़ी की आज पहली बरसी थी।

क्या कोई भी चीज़ हमेशा एक सी रहती है?... रह सकती है? न बीरेन और सुधा की ज़िंदगियाँ हमेशा से ऐसी थीं ना इस घर की दीवारें। कहते हैं कि ज़िंदगी में खुशियों के दाखिल होने के अनगिनत रास्ते होते हैं। उस दिन वो एक ख़बर की शक्ल अख़्तियार कर अस्पताल के उस लेबर रूम से बाहर आई थी

- बधाई हो! लड़की हुई है!

थोड़ी ही देर में वो खुशी लेबर रूम से निकल कर वार्ड में शिफ्ट हो गई। उस खुशी का नाम उन्होनें पहले ही सोच रखा था

- पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा न!
- अगर लड़की हुई तो
- लड़की ही होगी
- तुम्हें कैसे मालूम?
- मेरे गट फीलिंग कहती है
- अच्छा!
- हाँ!

अब ये बातें भी तमाम दूसरी बातों की तरह उन नक्शों की उभरी पपड़ियों से चिपकी हैं जो कभी-कभी छिटक कर बंद आँखों के पीछे तैरती यादों, मलालों और गुनाहों की ग्रंथियों में भी उतर जाती हैं। और तब एक बार फिर मन के किसी कोने में वो दिन दोबारा गुज़रने लगता है। जब बीरेन ने सुधा को 'थैंक यू' कहा था। बदले में सुधा सिर्फ मुसकुराई थी। उस वक़्त पंखुड़ी अस्पताल के सफ़ेद पालने में लेटी अपनी नाज़ुक पलकें उठाए क्षितिज से किसी शून्य में निहार रही थी। लगता था जैसे ज़िंदगी के लम्हें उसी शून्य से रिसते हुए उसके पास चले आएंगे। फिर नर्स का आना और पंखुड़ी के दूध का वक़्त हो जाना और बीरेन का बाहर रखी फाइबर की कुर्सियों में शिफ्ट हो जाना। सब कुछ उसी तरह हर रोज़ बीतता चला जाता है। फिर नर्स का घबराहट में बाहर निकलना और फ्लोर पर बने स्टाफ रूम की तरफ भागना और इंटरकॉम पर एक नंबर डायल करना भी हर रोज़ उसी कसक के साथ बीतता चला जाता है।

- सर! वार्ड नंबर 13 में इमरजेंसी है।
- अभी जिस बच्ची की डिलिवरी हुई है, उसकी चमड़ी नीली पड़ रही है!
- हाँ! चमड़ी पर दाने भी निकल रहे हैं। होंठ काले पड़ गए हैं।
- दूध नहीं पिला पा रहे। मुंह से झाग निकल रहा है।

बाहर के कमरे में रखे सोफ़े पर पड़ा वो अपनी खुशियों को भुरभुराता हर रोज़, बार-बार महसूस करता है। बार-बार दिखता है उसे पैथोलॉजी का वो लड़का और पंखुड़ी की नसों में धँसती वो सुई, उसके भीतर का रिसता काला ख़ून... धुएँ के किसी गुबार की तरह... काला... बंद दरवाजों, खिड़कियों और दीवारों के दायरे में क़ैद अंधेरे की तरह... काला... आत्मा में धँसते कड़वेपन की तरह... काला... तैरते... ढंके... गुनाहों की तरह... काला।

और फिर...

- सर! बच्ची की तबीयत अचानक बिगड़ गई है।
- डॉक्टर आ रहे हैं। कुछ टेस्ट करने पड़ेंगे।
- ख़ून में कोई इन्फेक्शन लगता है।

और फिर...

- पैथोलॉजी से लड़का आ रहा है ब्लड सैंपल के लिए।
- ब्लड ग्रुप पता लगते ही आप ब्लड का बंदोबस्त करने की कोशिश कीजिये।
- रिसेप्शन से ब्लड-बैंकों के नंबर मिल जाएंगे।

और फिर...

- देखिये! बच्ची के लिवर में इन्फ़ैकशन है।
- ख़ून में ज़हर फैल रहा है। ब्लड-ट्रांसफ़्यूज़न करना पड़ेगा।
- अभी ICU में शिफ़्ट करते हैं। ऊपर से ऑक्सीज़न भी देना पड़ेगा।

उसकी आँखों में तब दो चमकती बूंदें तैरने लगीं थीं और तब वो उन्हें गिरने से रोकने की कोशिश कर रहा था। तब... जब सब कुछ धुंधला और आभासी हुआ जा रहा था और सुधा उसी पलंग पर लेटी थी। उसकी बंद आँखों के पोरों से झड़ते अपराध-बोध सब्ज़ तकिये के किसी शून्य में रिसते जा रहे थे और वो ख़ुद एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में ब्लड-बैंकों के नंबरों का पर्चा लिए पिंडलियों में उठती सिहरनों को चिपकाए खड़ा था। तब... जब यादों की किसी अंधेरी दीवार से एक पपड़ी भुरभुरा के उखड़ गई थी। हाँ!... ठीक उसी वक़्त पहली बार उसे अपने और सुधा के बीच हुई नाड़ी के ख़ून वाली बात याद आई। पिंडलियों की सिहरन अचानक तेज़ हो गई और अपना संतुलन भी उसे बिगड़ता-सा लगा। धुंधली तैरती नज़रों से उसने सुधा की ओर देखा। वो भी उसे उस सब्ज़ तकिये के रास्ते उस शून्य में रिसती हुई सी प्रतीत हुई। सब कुछ धुंधला और आभासी-सा हुआ जा रहा था।

अगले दिन तक पंखुड़ी पूरी तरह मुरझा चुकी थी। उसकी चमड़ी पूरी तरह काली पड़ चुकी थी। एक मखमल का कपड़ा लाया गया था। पंखुड़ी को उसमें समेटा गया था। तब वो बार-बार ICU के शीशे के पास जाया करता। अपनी धुंधलाती पंखुड़ी को झुलसते हुए देखता और उसके ताप को अपनी आत्मा पर चढ़ता महसूस किया करता। आज साल भर बाद भी वो कपड़ा उनके बीच साझी एक अलमारी के एक अंधेरे खंड में रखा था। सुबह से आज दो बार वो उस कपड़े को अलमारी से निकाल कर उसमें अपनी पंखुड़ी की महक को महसूस करने की कोशिश कर चुका था। कभी पालथी मारकर उस कपड़े को अपनी गोद में रखता और कभी हताशा में तैरते आंसुओं को कमीज़ से पोंछता कि खारा पानी उस खुशबू को कहीं धुंधला न दे। पंखुड़ी उस ICU की आभासी दुनिया से कभी बाहर न आ सकी। बाहर के इसी कमरे में उसे रखा गया था। एक दिया जलाया गया था। गंगाजल भी छिड़का गया था। नहलाया भी गया था। नए कपड़े भी पहनाए गए थे। और फिर आया था वो सफ़ेद कपड़ा जिसमें उसे लपेटा गया था। सोने के सिक्के के साथ तुलसी उसने उसके मुंह में रखी थी। श्मशान के उस गड्ढे में अपने इन्हीं हाथों से उसे लिटाया था। एक मुट्ठी मिट्टी उसने उसके सफ़ेद कपड़ों पर उड़ेली थी। फिर धीरे-धीरे अंधेरे ने उस गड्ढे को लील लिया था। गरुड पुराण के ख़त्म होते तक उस अंधेरे ने उसे, सुधा को और इस घर को भी उसी गड्ढे में लील लिया था। अब जब भी वो अपने चारों तरफ देखता तो उसे वही अंधेरा अपने इर्द-गिर्द महसूस होता। फिर जब वो तैरती एशट्रे देखता तो एक और सिगरेट जला लेता। झक से उजाला तो ज़रूर होता लेकिन धुएँ का एक उठता गुबार उस उजाले को जल्द ही लील लेता... उसी अंधेरे गड्ढे की तरफ। 

तभी उसे भीतर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई। वो भीतर की ओर दौड़ा। सुधा कमरे के फर्श पर पड़ी थी। सिरहाने रखा गिलास भी वहीं बाजू में पड़ा था। भीतर भरे सारे गुनाह फर्श पर फैल चुके थे। अकड़े हाथ, आकडे पैर। भींचे हुए दाँत। कांपता शरीर। आँखें अब भी रोशनदान की ही ओर। उसने देखा कि सुधा के मुंह से कोई कड़वा झाग निकल रहा था। उसकी नज़रें उस रिसते झाग पर केन्द्रित हो गईं और तब उसके भीतर की दीवार से कोई पपड़ी भुरभुरा कर गिरी। उसे एक बच्ची की याद आई जिसके झुलसते होंठों से उसने एक बार इसी तरह का कड़वा झाग निकलते देखा था।

- पता है! मेरे अजमेर वाली बुआ कह रही थी कि अगर बच्चे के पैदा होते ही उसके होंठों पर नाड़ी का ख़ून लगा दो तो होंठ एक दम गुलाब की पंखुड़ी की तरह लाल हो जाते हैं
- भूल के भी ऐसा मत करना।
- अरे! मैं थोड़ी कुछ करे दे रही हूँ। मैं तो बस ऐसे ही बता रही हूँ।
- तो मत बताओ।
- अच्छा! ठीक है! नहीं बताती। गुस्सा क्यों होते हो? वैसे... पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा ना!


बीरेन अचानक ही शांत हो गया। अपने पैर उसने पीछे खींचे। पीठ घुमाई और अपने दीमक लगे सोफ़े पर वापस आकर बैठ गया। मखमल दोबारा अपनी गोद में रखा। सिगरेट सुलगाई। एक लंबा कश खींचा। सोफ़े पर अपना सिर टिकाया और आँखें बंद कर लीं। तभी... उसे लगा... कोई कड़वापन उसके भीतर भी धँसता जा रहा है। 

Monday, March 27, 2017

आठ छोटी बेचैन अकविताएं




दिलों की लकड़ी 
शायद
गीली हो चुकी
धुआँ तो खूब ही करती है
पर
धधकती नहीं अब

***

एक टुकड़ा बादल
तलाशती हैं आँखें
गुज़रते घने बादलों में
आज भी

***

यूं तो
रोज़ ही मरते हैं
हम सभी
एक बित्ता
अपने भीतर ही
और
उस अंश के निमित्त
दो बूंद नमकीन सी
टपका भी देते हैं
और बढ़ जाती है आगे 
ज़िंदगी

***

हर आदमी 
अपने भीतर 
एक 
अनुकूल संसार 
बनाए रखता है
प्रत्यक्ष संसार से 
किनारा कर 
उसमें 
शरण पा सकने के लिए

***

ये 
हमारे आकाश का नहीं
खिडकियों का भेद है
और
हमारा 
ये समझना अभी बाकी है

***

कोई अभिमन्यु
फँस रहा है
किसी 
चक्रव्यूह में 
मेरे भीतर
शायद

***

ज़िंदगी में कई बार 
प्रश्न नहीं 
बल्कि 
उत्तर
सामने आकर 
खड़े हो जाते हैं
वे उत्तर 
जिनके प्रश्नों से 
हम मुंह चुराने को 
अभिशप्त हैं

***

कविता मर गयी
नदियाँ सूख गयीं
मानस 
खड़ा देख रहा
धर्मों के आडम्बर की 
ओट से


Thursday, March 23, 2017

दीवार




देखो! आज मैं जल्दी आ गया। कल रात एक सपने की वजह से नींद ही नहीं आई। बड़ा अजीब सपना था। मैंने देखा कि मैं अकेले खड़े एक दीवार से बातें कर रहा हूँ। तभी अचानक दीवार भी मेरी बातों का जवाब देने लगती है। मैं डर के मारे भागने की कोशिश करता हूँ। तभी दीवार फाड़ के भीतर से ढेर सारे हाथ बाहर निकलने लगते हैं और मुझे कस के पकड़ लेते हैं। कुछ हाथों में ज़ंजीरें हैं जिनसे मेरे हाथ और मेरे पैर बांध दिये जाते हैं। मैं चीखना चाहता हूँ पर गले से आवाज़ ही नहीं निकलती। तभी उनमें से एक हाथ आकर मेरे मुंह में एक कपड़ा ठूंस देता है और एक दूसरा हाथ मेरे पूरे चेहरे को एक काले नकाब से ढंक देता है। मैं हाथ-पैर हिलाने की कोशिश करता हूँ, चिल्लाने की कोशिश करता हूँ, बेबसी में छटपटाता हूँ। बस तभी मेरी आँख खुल जाती है। धड़कन बहुत तेज़ चल रही थी। पूरा बिस्तर भी पसीने से तर-ब-तर हो गया था।

तुम्हें पता है पुराने जमाने में राजे-महाराजे अपने दरबार में खास तौर से एक ज्योतिष सपनों को इंटरप्रिट करने के लिए रखते थे। अभी एक दिन तुम्हारे डॉक्टर साहब ही ओनिरॉलॉजी के बारे में बता रहे थे। सपने यूं ही नहीं आ जाते बल्कि इनका ताल्लुक हमारे अवचेतन से होता है। हमारे सब-कॉन्शस में जो दबे इमोशन्स होते हैं उनका दरअसल हमें भी ठीक-ठीक पता नहीं होता। न जाने कितनी दबी-कुचली नफ़रतें, हसरतें, मुहब्बतें, सुदूर अंतस में कहीं कैद डर, फोबिया, लालच, अपमान, तमाम तरह के कॉमप्लेक्सेज़, उनसे उपजे पूर्वाग्रह, असुरक्षाएँ और न जाने क्या-क्या! डॉक्टर साहब कह रहे थे कि इन सपनों के ज़रिये हम भी अपने आप को भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

अच्छा ये तो देखो! क्या है! नज़ीर अकबराबादी! याद है तुम्हें ये किताब! दीवाली की पुताई के वक़्त मानिकपुर वाले घर के टांड़ से मिली थी। दीवाली के बाद सर्दियों में हम छत पर इसे पढ़ा करते थे। कल रात को जब नींद खुली तो यूं ही पुराना अटाला टटोलने लगा था। अचानक एक पुराने बैग के भीतर पड़ी मिल गई। देखो ना! अटाले का भी अपना एक सफर होता है। पता है, और क्या मिला उस बैग से! ये देखो! मेरी एक पुरानी शायरी और ये तस्वीर। इस शायरी और तस्वीर का भी एक किस्सा है। ये जो लड़की है ना तस्वीर में इसका नाम है फिरदौस। तुमने वसीम बरेलवी का वो शेर सुना है:

किताब-ए-माज़ी के औराख़ उलट के देख ज़रा
न जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले
(माज़ी=अतीत)

और सच में कल लगा कि जैसे कोई फूल किसी पुरानी किताब में मिल जाया करता है वैसे ही मैंने भी उसे पा लिया। ये पता है कोई पाँच साल पहले की बात है। तुम तक़रीबन दो साल से PVS में पड़ीं थीं। हालांकि मैं तब पूरी तरह हिम्मत नहीं हारा था लेकिन फिर भी पैरों में थकान चढ़ने लगी थी। दिमाग को बोरियत की दीमक ने चाटना शुरू कर दिया था। देवेन की शादी का न्योता मिला तो लगा कि थोड़ा पुराने दोस्तों से मिल कर अच्छा ही लगे। फिरदौस उसी शादी में मिली थी। अस्पताल की दवाइयों और बोतलों की महक से इतर वो किसी ताज़ा ख़ुशबू सी नज़र आई। दिल्ली से आई थी इलाहाबाद। देवेन की दोस्त थी। पुराने दोस्त मिले तो सबने वहीं घेर लिया। कहने लगे - अशांत मियां! आज बड़े दिनों बाद मिले हो। शायरी तो सुनाना ही पड़ेगा। इलाहाबाद जाते वक़्त सफर में कच्चे से कुछ शेर लिखे थे वही सुना दिये। देखो यही तो है वो कागज़ जो कल बैग में मिल भी गया।

इश्क़ की राहों में दिल, और खोया नहीं जाता
रूह से बोझा अब जिस्म का, और ढोया नहीं जाता
वो कहते हैं, इश्क़ करो! रूहानी सफर है!
कुली हो के ख़्वाब-ए-सफर, सँजोया नहीं जाता
फैलाए अपना दामन खड़े हैं इस भीगती बारिश में
इन आँखों से और इसे अब, भिगोया नहीं जाता
फूल हों गर तो सोचें भी, कांटे लिए ज़िद बैठे हैं
हमको क्यों माला में, आखिर पिरोया नहीं जाता
मत छीनो मेरे ग़म मुझसे, इन्हें यहीं पर रहने दो
न गहरी रातों में अब, तन्हा सोया नहीं जाता

महफिल में तो सभी वाह वाह करने लग गए। फिर बहुत हंसी मज़ाक भी हुआ बड़ी देर तक। मैं तो जैसे उसी दुनिया का हो कर रह गया था। कितना ख़ुश था मैं वहाँ! हम लोग खाने के टेबलों पर बैठ गए। मैं, फिरदौस और जोशी एक ही टेबल पर बैठे थे। वहीं हमारी जान-पहचान शुरू हुई। उसने बातों-बातों में कहा कि आप अच्छा लिखते हैं। अब कोई यहाँ कानपुर में दाद देता तो मैं शायद इतनी तवज्जो भी न लेता। लेकिन उस वक़्त शायद बिलकुल कॉलेज के लड़के सा फील करने लगा था। ऐसा लगता था जैसे कोई पतंग हो जो अपनी डोर से कट गई है और बस उसे अब उड़ते जाना है हवा के साथ। शेख़ी बघारते हुए मैंने कहा कि अभी तो मैंने शेर सुनाये ही कहाँ हैं! ये तो ऐसे ही कच्चे से शेर थे। बात ये है कि सब यहाँ पुराने दोस्त हैं और इनमें किसी को भी लिटरेचर की कोई समझ है नहीं। कोई भी तुकबंदी सुना दो वाह-वाह कर देते हैं। अच्छे शेर तो बड़ी महफिलों के लिए संभालकर रखना पड़ता है। वो हंसने लगी। जोशी भी थोड़ी देर में दूसरे लोगों में चला गया। हम लोग खाने के बाद भी देर तलक बैठे रहे। रात भी बढ्ने लगी। देवेन और उसकी दुल्हन भी स्टेज से उठ चुके थे और खाने जा रहे थे। लोकल के सभी मेहमान अपने घर जा रहे थे। बाहरी लोग भी होटल वगैरह में जाने लगे थे। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुर्सियों के झुंड आपस में हंसी-चउरा कर रहे थे। ठंड भी बढ़ रही थे और केटरिंग वाले कॉफी बाँट रहे थे। हमें भी एक लड़का कॉफी पकड़ा गया। म्यूज़िक बंद हो चुका था। हम लोग बातें कर रहे थे। कॉफी के बाद उसने एक सिगरेट जला ली। दिल्ली की लड़की थी। कन्यूनिस्ट लेफ़्टिस्ट टाइप की। उसी तरह के कपड़े। तुम कहोगी कि मैं बहुत ज़्यादा स्टीरियो-टाइपिंग किए दे रहा हूँ। लेकिन सच मानो, मैं झूठ नहीं बोल रहा। एक तो छोटे शहरों में कोई लड़की सिगरेट पीती दिखती नहीं। और बड़े शहर से कोई आ जाये तो लोग बस मुड़-मुड़ के देखते ही रहेंगे। कॉफी सुड़कते सारे झुंड बारी-बारी से हमें ही निहारने में लगे थे। उसके साथ-साथ मैं भी अनकम्फ़र्टेबल होने लगा। तभी उसने कहा चलो थोड़ा बाहर टहल के आते हैं। मैंने भी बोल दिया- टहलना क्या! लॉन्ग ड्राइव पर चलते हैं! मैंने देवेन की गाड़ी निकाली और हम लोग निकल लिए कानपुर रोड की तरफ

धीरे-धीरे शहर की सड़कों से आगे निकलते जा रहे थे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी गाड़ी के काँच से छनती हुई आ रही थी। चौराहों पर नारंगी ट्रैफिक लाइटें अपनी भारी पलकों से टिमटिमा रहीं थीं। कुत्तों के झुंड अपनी-अपनी गलियों की निगहबानी कर रहे थे। गश्त लगाती पीली बत्तियाँ अपना वायरलेस ऑन किए इधर-उधर सुस्ता रहीं थीं। इन पीली बत्तियों, नारंगी सिग्नलों और स्ट्रीट लाइटों को पीछे छोडते हुए हम लोग भी बढ़ते जा रहे थे अपने आगे एक पीली रोशनी का पुंज लिए। स्ट्रीट लाइटों की कतारें ख़त्म हुईं तो गाड़ी की रोशनी में नहाते पेड़, संकीर्ण पुलिया के सफ़ेद किनारे और मील के पत्थरों ने हमारा साथ देना शुरू कर दिया। लेकिन हम लोग ट्रकों के डिपर की आड़ में बचते-बचाते हाइवे पर बढ़ते जा रहे थे। उसने धीमी आवाज़ में अपने मोबाइल पर गाना चला दिया।

तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीन है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है

रूना लैला की आवाज़ वाकई जादू है। हम लोगों ने एक ढाबे पर गाड़ी खड़ी की और चाय मँगवाई। बाद में सिगरेट भी जलाई। तुम्हें पता है उसे सिगरेट पीते देखना एक अलग ही एहसास था। हाइवे से गुजरते ट्रकों की रोशनी में बार-बार उसकी आँखों का नहा जाना। उसकी आँखों में जाने क्यों एक बगावत सी नज़र आती थी। मुझे हमेशा लगता था कि लड़के तो बेवकूफ होते हैं जो बेवजह फेफड़े जलाते हैं। लड़की जब सिगरेट जलाती है तो वो एक स्टेटमेंट होता है, एक बगावत होती है। एक चुनौती होती है उसे हमेशा एक फ्रेम में फिट करने को लालायित नज़र आने वाली मानसिकता के लिए। पिछले दो सालों से तुम PVS में फंसी थी और मैं घर, अस्पताल और दफ्तर के बीच अपनी मशीनी ज़िंदगी में एक पुर्ज़े-सा घिसा जा रहा था। वो तुम्हारे डॉक्टर साहब नहीं कहा करते सब-कॉन्शस वाली बात! हो सकता है इसी वजह से शायद मैं उसकी बगावत की ओर आकर्षित हुए जा रहा था। तमाम लोग कहा करते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं! जैसी मर्ज़ी होगी जिएंगे! लेकिन परवाह ना करते हुए भी अगर कोई गुस्ताखी ना की तो परवाह ना करने का फायदा क्या? वजह तो खैर नहीं जानता इस आकर्षण की लेकिन इतना ज़रूर चाहता था कि वो रात कभी ख़त्म ना हो। ढाबे पर सिकती तंदूरी रोटियों की ताल और अलाव से उठती चटर-पटर की उन आवाज़ों के बीच से वो आसमान के सितारों को निहारने में मसरूफ़ थी। बड़े शहरों के नसीब में सितारे होते ही कहाँ हैं! मोबाइल के गाने बदलते जा रहे थे। उसने गाने की आवाज़ थोड़ी और मद्धम कर दी। इकबाल बानो की कोई ठुमरी चल रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने भी नहीं हटाया। हमारे चेहरे अंधेरे की वजह से भले ठीक से नज़र नहीं आ रहे थे पर उस अंधेरे में भी नज़रों के मिलने का ज़रूर एहसास हुआ था। हम लोग उस moment में कैद हो के रह गए थे। तभी ढाबे से एक लड़का आया गिलास-पैसे लेने और वो moment टूटा। मैंने लड़के से दो चाय और बुलवाई। उसके जाने के बाद उसने बताया कि किस तरह अपने पति को उसने लोधी गार्डेन में एक दूसरी औरत के साथ रोमांस करते पकड़ा था। पब्लिक में कोई तमाशा बनाने के बजाय उसने पति के मोबाइल से खुद को तीन तलाक sms कर लिए और खुद उसी दिन मुखर्जी नगर के एक PG में शिफ्ट हो गई। वो शायद बिलकुल वैसी थी जैसा मैं हो जाना चाहता था। कहीं-न-कहीं इस नैतिकता के लबादे से आज़ाद हो जाना चाहता था। लेकिन मैं कायर था शमा! लोग क्या कहेंगे? अपनी बीवी को इस हालत में छोड़ कर चला गया! मैं तुम्हें छोड़ देना चाहता था शमा! और आज भी मैं तुम्हें छोड़ देना चाहता हूँ। मैं भी आज़ाद हो जाना चाहता हूँ शमा! मैं थक गया हूँ इस अकेलेपन से! तुमसे इस तरह बात करते-करते। लगता है कि किसी दीवार से बात कर रहा हूँ। हाँ। अब मुझे अपने सपने का मतलब भी समझ आ रहा है। तुम्हारे साथ इस तरह जीते-जीते, तुमसे इस तरह मोनोलॉग करते-करते सात साल बीत चुके हैं शमा। सात लंबे साल! अब तो तुम्हारी आवाज़ भी शायद न पहचान पाऊँ। अपनी इस शादी को अस्पतालों के इन चक्करों के बीच खोजते-खोजते मैं थक गया हूँ। तुम अब मत आओ शमा! मुझे तो ये भी नहीं मालूम कि अब अगर तुम वापस आ भी गईं, तो मैं तुमसे बात क्या करूंगा? इतने सालों से तुमसे बात करते हुए तो मैं खुद से ही बात कर रहा हूँ। तुमसे तो बात करना भी मैं भूल चुका हूँ शमा। बस अब चली जाओ और ख़त्म कर दो इस अंतहीन सिलसिले को। मैं तो आदर्श पति के इस लबादे के बोझ में पिसा जा रहा हूँ। कैसे छोड़ दूँ अपनी तरफ से तुम्हें! दरअसल हम सभी अपनी-अपनी ज़िंदगियों में अपनी ही रची एक भूमिका चुन लेते हैं और फिर ताउम्र उसी को ढोये फिरते हैं। डरता हूँ कि कैसा दिखूँगा यदि इन भूमिकाओं, इन आवरणों को हटा दूँ तो? फिरदौस जैसा? या तुम्हारे जैसा?

पता है अगले दिन जाते वक़्त उसने अपनी यही फोटो दी थी। देखो! इसके पीछे क्या लिखा था!

कुछ इस तरह ज़िंदगी में अपनी, हमें जगह देना
तस्वीर जब कभी हमारी देखना, तो मुस्करा देना

जब मैंने उससे पूछा कि अब कब मिलोगी तो पता है उसने क्या कहा था? उसने कहा था कि अब तभी मिलेंगे जब तुम आज़ाद हो जाओगे।


खैर, चलो! ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ। तुम्हारी भी स्पंजिंग का टाइम हो रहा है। नर्स भी आती होगी। शाम को थोड़ी देर से आ पाऊँगा, ऑफिस में काम थोड़ा ज़्यादा है।

Sunday, March 12, 2017

विधानसभा चुनाव - नज़रिया




कल पाँच राज्यों में चुनाव के नतीजे आ गए। दिन भर YouTube और Facebook पर ऑनलाइन नतीजे देखते रहे। ये चुनाव भी एक बार फिर डेमोक्रेसी की च्विंगम ही साबित हुए। रस तो कब ही का खत्म हो चुका है बस रबड़ है जब तक चबाते रहो। प्रधानमंत्री एक बार फिर सबसे शक्तिशाली साबित हुए। उनकी जीत के बाद तथाकथित liberals एक बार फिर छाती पीटते हुए नज़र आए। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। हर जगह conservatives आगे आ रहे हैं और liberals पीछे जाते जा रहे हैं। हिंदुस्तान में पीछे नहीं बल्कि बाहर ही हो जाएँगे लगता है। लेकिन सवाल है कि हिंदुस्तान में क्या liberals हैं भी? मुझे नहीं लगता। हिन्दुस्तान में सही अर्थों में कोई liberal पार्टी है ही नहीं। 

भारत दरअसल एक वोट-बैंक की राजनीति है, ideologies की नहीं। किसी भी तरह का 'ism' एक विचारधारा होती है लेकिन जब आप वोट-बैंक की बात करते हैं तो कहीं न कहीं आपके लिए विचारधारा गैर ज़रूरी हो जाती है बनिस्बत चुनाव जीतने के। 

तमाम पब्लिक भी बहुत खुश है कि उनकी पसंद की पार्टी जीत गई। जिन्हें खुश होना हों, हो लें, लेकिन खुद से एक सवाल भी करें कि जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के भ्रष्ट है वो दूसरी में जा के दूध का धुला कैसे हो गया? इन नेताओं की दरअसल कोई व्यक्तिगत विचारधारा है ही नहीं। जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के धर्मनिरपेक्ष है वही दूसरी में जा के कट्टरपंथी कैसे हो जाएगा? ये सरासर नामुमकिन है। सिद्धू और बहुगुणा के उदाहरण ताज़ातरीन सबके सामने हैं। क्या सिद्धू जब तक भाजपा में थे तो क्या मुसलमान विरोधी थे और आज तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों के खेमे में जा कर धर्मनिरपेक्ष हो गए? वहीं रीता बहुगुणा कांग्रेस से निकल कर भाजपा में गईं तो क्या हिंदुत्ववादी हो गईं? दरअसल ये सारे लोग शातिर, मौकापरस्त और चालाक राजनीतिज्ञ हैं। अपनी शातिर चालों में ये पब्लिक को उलझा के रखते हैं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या जनता को विकल्प मिला? 

एक राजनेता पार्टी 'A' से विधायक है और चुनाव के पहले एंटिइंकमबेनसी को देखते हुए पार्टी 'A' से पार्टी 'B' में चला जाता है। जनता 'विकल्प' की तलाश में 'PARTY B' को चुनती है लेकिन जो राजनेता चुन के आता है वो तो वही है जो पिछली सरकार में था। हम ये सोचें कि क्या यह व्यक्ति अचानक एक भ्रष्टाचारी से आदर्शवादी बन जाएगा? क्या ऐसा हो सकता है? और सबसे बड़ी बात है कि पार्टी 'B' ने तो चुनाव में जाने से पहले ही जनता को धोखा दे दिया। अगर दूसरी पार्टियों के दलबदलुओं को चुनाव में उतार कर एक विकल्प देने की बात की जा रही है, तब तो ये पहले दिन से ही ढोंग कहलाएगा और इसका पर्दा फ़ाश तो तभी हो जाता है जब टिकिटों का बंटवारा होता है। 

जनता को ये पता तो होता है कि चुनाव भी आईपीएल की तरह हो चुका है। पिछली बार जो इस टीम से खेला था अबकी बारी इस वाली से खेलेगा। अब जब जनता की जानकारी में सारी बातें हैं तो वह तो पुराने अनुभवों के आधार पर candidates को वोट देगी। इसलिए ठीक इसी समय उम्मीदवारों से और उनके ट्रैक-रिकॉर्ड से ध्यान हटाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। अगर ध्यान नहीं हटाया जाएगा तो पब्लिक तो हर उम्मीदवार के पिछले काम-काज को तौलेगी ही। इसमें सबसे पहले ज़रूरी हो जाता है जनता के सामने आदर्श पेश किया जाना। एक पार्टी विचारधारा के नाम पर हिन्दुत्व को परोसती है, दूसरी liberalism को। जबकि अभी तक जो धर्म-निरपेक्ष थे वही अब हिंदुत्ववादी खेमे में बैठे हैं। वोटों का ध्रुवीकरण ज़रूरी हो जाता है। जनता की स्टीरियो-टाइपिंग ज़रूरी हो जाती है। स्टार-प्रचारकों को न्यौते दिये जाते हैं। ये सब इसलिए कि जनता से ये मौका छीनना है कि वह अपने क्षेत्र के बारे में, चुनाव में उतरे सभी प्रत्याशियों के बारे में, उनके पिछले रेकॉर्ड के बारे में, किसी के ऊपर कोई क्रिमिनल केस है तो उसके बारे में कुछ भी मूल्यांकन करे। इस कड़ी में सबसे पहले कोई विवाद पैदा किया जाता है। हम सभी ने देखा था कि किस तरह पिछले कुछ चुनावों के समय भी लव जिहाद, घर वापसी, intolerance जैसे मुद्दे यकायक चुनावी discourse के बीच पटक दिये गए थे। इस बार रामजस कॉलेज में मार-पिटाई के बाद फिर एक नया मुद्दा आया - कौन nationalist है कौन anti-national? हालांकि ये मुद्दा पहले भी उठा है लेकिन चुनाव के समय ही इसे परवान चढ़ाया गया। पूरा देश इस debate में फंस गया। जब बाहर से कोई स्टार-प्रचारक जाता है तो उसे ना तो लोकल मुद्दों की detail में  जानकारी ही होती है और ना ही वो कोई ठोस या objectivity भरा कोई वादा ही कर सकता है। उसके भाषणों में एक ही बात होती है 'विकास' की बातें। विकास अपने आप में बहुत vague शब्द है। आवारा पूंजी और कॉर्पोरेटीकरण का ही दूसरा नाम विकास रख छोड़ा है। कोई मॉडेल किसी के पास नहीं है। दो विकल्प हैं - एक नागनाथ है और दूसरा सांपनाथ। पूरे चुनाव के दौरान टीवी चैनल और बाकी सोशल मीडिया इस विवाद में कूद-कूद के भाग लेतें है। एक पार्टी nationalist बन जाती है, बाकी सब एंटी-नेशनल। चुनाव कई चरणों में होता है और चरण-दर-चरण ये debate भी बहुत तीखा होता जाता है। चुनाव खत्म होते ही देशभक्ति के बादल छंट जाते हैं और कान फोडू debates की जगह ले लेते हैं Exit Polls। शेयर बाज़ार Exit Polls के दम पर एक दिन और हरे निशान में चढ़ता है। 

अब भाजपा को ये समझ आ गया है कि राम मंदिर में अब वो आकर्षण नहीं रहा। अब ज़रूरत है एक नए और पहले से बड़े ध्रुवीकरण के जुमले की। जो लोग कट्टर हिन्दू नहीं हैं वो भी nationalist तो बन ही सकते हैं क्योंकि सतही तौर पर nationalism काफी कुछ patriotism या देशभक्ति की तरह लगता है। आम दुनियादारी वाले आदमी के लिए ये बहुत पेचीदा बातें हैं कि भारत माता की जय न बोलना किस तरह से फ्रीडम ऑफ स्पीच से कनैक्टेड है और राष्ट्रगान के लिए खड़ा ना होना किस तरह ज़रूरी नहीं है। जो बातें दरअसल अकैडमिक मुद्दों के discussions की हैं उन्हें राजनीतिज्ञ बहुत चालाकी से प्राइमटाइम debate में तब्दील कर देते हैं। आम आदमी जो न तो इन मुद्दों की संवैधानिक पेचीदगियों से उतना परिचित होता है न ही उसे इतनी फुर्सत है। उसे बस एक स्टैंड लेना होता है। वो देखता है उन liberals को न्यूज़-स्टूडिओ में गला फाड़ते हुए जिन्होनें उसे बेरोजगारी और भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया था और जहां उसे वे लोग ये कहते हुए नज़र आते हैं कि भारत माता की जय बोलना ज़रूरी नहीं है, राष्ट्रगान में खड़े होना ज़रूरी नहीं है। वो फैसला कर लेता है और इस तरह वो न केवल एक liberal पार्टी को ही छोडता, बल्कि liberalism को भी छोड़ देता है। तमाम नतीजों के सारे भोंपू जब कल बजे, तो यही लगा कि हर शख्स liberals से खार खाये बैठा है। 

liberals से ये नफरत आज एक ग्लोबल पैटर्न है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ग्लोबलाइज़ेशन का दौर है। पूंजी एक देश से दूसरे देश में बह रही है और साथ में बहुत से sentiments भी बहा के ले जा रही है। इसी आवारा पूंजी के भरोसे टिके स्टॉक मार्केट, वायदा कारोबार, रीयल एस्टेट और War Against Terror के बुलबुले में क़ैद है सारी अर्थव्यवस्थाएँ। और ये बुलबुला ऐसा है जो अक्सर ही फटता भी रहता है। इसका फटना ही हर बार एक असंतोष, एक एंटी-इंकमबेनसी खड़ी कर देता है। और तब यही आवारा पूंजी एक दलबदलू की तरह दूसरे खेमे में शिफ्ट हो जाती है और एक rebellion की बोली बोलने बोलती है। बस, यहीं से पैदा होता है फासीवाद। फासीवाद कोई अचानक से नहीं आ जाता। 'विकल्प' की लंबी और थकाऊ तड़प या तो एक क्रान्ति को जन्म देती है या एक फासीवादी को जन्म देती है। इतिहास की जानकारी रखने वाले मेरी इस बात से तो सहमत होंगे ही कि पब्लिक ने liberals को भरपूर मौका दिया है। काफी समय उन्होनें राज किया। लेकिन उन्होनें liberalism की चाशनी में लपेट कर गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ही दिये हैं। ये तो बस चाशनी के बदलने का दौर है। लेकिन चाशनी बदल भी जाये तो भी चीनी तो वही रहनी है। 

Tuesday, February 28, 2017

कैंसर



हमारा समाज दरअसल एक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। कोई भी समाज गुज़रता है। हर दौर में गुज़रता है। दरअसल इतिहास कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो गुज़र चुकी है। हम अपनी-अपनी ज़िंदगियों को जोड़-जोड़ कर जो एक समाज बनाते हैं उसकी अपनी एक ज़िंदगी होती है। और इस समाज की ज़िंदगी की घटनाओं को ही हम इतिहास और वर्तमान के दायरे में बांटते चलते हैं। मुझे अक्सर ही लगता है कि एक ऐसा भी तत्व है जो हम सभी के समग्र से परिभाषित होता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे हमारा अपना शरीर। हमारा शरीर अरबों-खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। रोज़ न जाने कितनी ही कोशिकाएँ मरती हैं, पैदा होतीं हैं। उन कोशिकाओं से मिल कर कई अंग बनते हैं जिनमें वे अपना-अपना काम करते हैं। इन कोशिकाओं की अपनी एक individual ज़िंदगी होती है। उन्हें individually ऑक्सिजन चाहिए, पोषण चाहिए। न जाने क्यों मुझे ये लगता है कि इन कोशिकाओं को ये कभी पता भी होगा कि उनके जैसे अरबों-खरबों से मिल कर एक शरीर बना है जो चलता है, फिरता है, खाता है, दफ्तर जाता है, घर पर काम करता है। जैसे कोशिकाएँ अपना काम करतीं हैं किसी दूसरे आयाम के एक अनजाने विराट के लिए, क्या ये मुमकिन हैं कि हम लोग भी ठीक उन्हीं कोशिकाओं की तरह अपना-अपना काम नहीं कर रहे हों। रोज़ न जाने कितने मरते हैं, कितने जन्मते हैं। अपनी-अपनी individual ज़िंदगियाँ इस समग्र में जीते हैं। लेकिन किसी और आयाम से देखने पर क्या हम भी उन्हीं कोशिकाओं की तरह ना होंगे जिन्हें अपने विराट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो ये नहीं समझ पा रहे कि उन जैसे अरबों-खरबों से मिल कर एक और आकार, कोई मेटा-शरीर भी कहीं होगा।

क्या ये समाज, देश, मानवता या ज़िंदगी उसी मेटा का हिस्सा है? जब शरीर की ये कोशिकाएँ बीमार हो जातीं हैं तो शरीर भी बीमार हो जाता है। इसका तर्क उल्टा भी किया जा सकता है। गर शरीर बीमार है तो यकीनन उसके अवयव भी बीमार होंगे।

आज के दौर में जब हम अपने समाज, देश और मानवता को देखते हैं तो लगता है कि बीमारी तो निश्चित रूप से है। अलग-अलग समाज अलग-अलग गुट बनाकर एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं। न केवल वैचारिक, बल्कि हिंसा पर भी अक्सर ही आमादा होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में तना-तनी है। अगर मेटा बीमार है तो निश्चित ही हम भी बीमार होंगे। चाहे आज सोशल-मीडिया या पारंपरिक मीडिया को देखें तो indiviiduals की ओर से प्रेरित नफ़रतों के सैलाब को आसानी से देख सकते हैं। और अक्सर ही हमारे इर्द-गिर्द, हमारे जाने-पहचाने चेहरे इन भीड़ों का हिस्सा होते हैं। अभी हाल ही में अमरीका में 2 भारतीयों को एक सरफिरे ने कत्ल कर दिया। क्या ये बात अचानक उसके मन में आई होगी कि चलो आज किसी गैर-मुल्की को मारा जाये? मुझे ऐसा नहीं लगता। ज़्यादा संभावना इस बात की है कि बहुत लंबे समय से नफरतों के इन गुटों में चाहे online हो या offline उसका affiliation रहा होगा। इसे ही brainwash कहा जाता है। तमाम आतंकी संगठन और कट्टर पंथी लोग इंसान की इस प्रकृति का इस्तेमाल करना जानते हैं। मैंने पढ़ा था कि तालिबान ने छोटे उम्र के बच्चों को अपने संगठन में शामिल करने लिए वहाँ के मदरसों को सबसे पहले अपना निशाना बनाया। हिटलर ने भी अपनी आत्म-कथा Mein Kampf में लिखा है कि किस तरह बच्चों में एक विशेष भावना भरना ज़रूरी है अपनी नाज़ी पार्टी के उद्देश्यों के लिए। दरअसल तार्किक रूप से देखा जाये तो हमारे इर्द-गिर्द के सामान्य विद्यालय जो सामान्य शिक्षा देते हैं वो भी एक तरह की brainwashing ही है। फर्क ये है कि ये शिक्षा नफरत से भरी हुई नहीं है लेकिन काम ये भी वैसे ही करती है। एक व्यक्ति को एक विशेष तरह के माहौल में बहुत समय तक रखो तो वो भी अंततः वैसा ही हो जाता है। लेकिन आज के दौर में सूचना प्राप्त करने के साधन बदल चुके है। आज इंटरनेट की वजह से ये आलम है कि हमारे इर्द-गिर्द हर तरह की सोच, हर तरह की नफरत बहुत ही आसानी से हमारी पीढ़ी तक पहुँच रही है। आप एक facebook लॉगिन करके खुद ही brainwash हो सकते हैं, बगैर ये समझे कि आप brainwash हो रहे हैं। यकीन जानिए कि आपको अपनी नफरत उतनी ही उचित प्रतीत होती होगी जितनी एक घोषित आतंकवादी को अपनी नफरत सही लगती होगी। जैसा कि मैंने पहले कहा कि जब शरीर बीमार होता है तो यकीनन उसकी कोशिकाएँ बीमार होंगी। ये कोशिकाएँ अगर किसी बाहरी तत्व जैसे bacteria या virus की वजह से बीमार हों तो एक बात है लेकिन ये उस phenomenon को आप क्या कहेंगे जब ये कोशिकाएँ खुद ही शरीर को मारने पर आमादा हो जाएँ? कैंसर।

Friday, February 17, 2017

और तभी...



एक बार फिर उसने बाइक की किक पर ताकत आज़माई.  लेकिन एक बार फिर बाइक ने स्टार्ट होने से मना कर दिया. चिपचिपी उमस तिस पर हेलमेट जिसे वो उतार भी नहीं सकता था. वो उस लम्हे को कोस रहा था जब इस मोहल्ले का रुख़ करने का ख़याल आया. यादें उमस मुक्त होतीं हैं और शायद इसलिए अच्छी भी लगती हैं. अक्सर ही आम ज़िंदगी हम जिए चले जाते हैं लेकिन कहीं कुछ ख़ास नज़र नहीं आता. अचानक एक दिन यही पल यादों के फॉर्मेट में दिमाग में कुलबुलाने लगते हैं तो एक नमकीन ज़ायका आने लगता है. 17 साल पहले जब वो दसवीं ग्यारहवीं में पढता था तो इन गलियों में आया करता था. यूं तो वो उसकी ही क्लास में पढ़ती थी पर इतवार, गर्मियों की छुट्टियां, शाम को स्कूल छूटने के बाद का समय वो इसी मोहल्ले में गुज़ारा करता. क्रिकेट के मैच बदने, उसके घर के पड़ोस के लड़कों से दोस्ती बढ़ाने या कभी कोई किताब या कॉपी मांगने या वापस करने के बहाने वो मोहल्ले में अक्सर ही मौजूद रहा करता. कई बार सोनू निगम के सस्ते टी सिरीज़ अल्बम लाल दिल वाले गिफ्ट रैपर में लपेटे अपनी जेब में खोसे घूमा करता कि कभी कोई मौक़ा मिले तो मोहब्बत का इज़हार कर सकूं. जब 17 साल बाद इसी शहर में बदली हुई तो दिल जैसे एक धड़कन स्किप कर गया. सबसे पहला ख़याल एक बार फिर से उसी मोहल्ले में जाने का ही आया. अब तो हालांकि उसकी शादी हो चुकी थी और उसे यकीन था कि उसकी हमउम्र रही उसकी मोहब्बत भी अब किसी से ब्याह कर ही चुकी होगी. दुबारा जाने की इच्छा ज़रूर हुई थी लेकिन इसमें मोहब्बत कम थी, रोमांच और नास्टैल्जिया ज़्यादा था. उसके मोहल्ले में दोबारा जाना इतने सालों बाद. वो दुकान जहां वो थम्स अप पीया करता था और कभी-कभी उसके भाई को भी पिलाया करता था. उसके घर के सामने का मैदान जहाँ वो इतवार को मैच खेलने जाता था और कभी कभी वो अपने बाल सुखाने छत पर आती थी. उसे आज भी याद है अपना वो छक्का जब गेंद उसकी छत पर पहुँच गयी थी और उसने वापस फेंकी थी. उससे नज़रें मिलीं थीं तो बिलकुल तेंदुलकर वाली फीलिंग आई थी. लड़की ने हालांकि बाद में उसका दिल तोड़ दिया पर वो खुद को उसकी ज़िंदगी में शामिल होने से रोक पाती? टीनेज का प्यार गुनगुनी धूप की तरह होता है. न जाने कितने ही दिल रोज़ दुनिया में टूटते हैं पर उन टूटे दिलों में दर्ज़ प्यार साबुत रह जाता है. वो प्यार यादों की परतों और रंध्रों में उतर जाता है। जैसे कुल्हड़ में चाय डालने पर मिट्टी का सौंधापन चाय में उतर आता है, जैसे कई बार ज़िंदगी के लाइव पलों में किसी बैकग्राउंड म्यूजिक का कोई अहसास होता है वैसे ही वो प्यार कई बार अकेले में कंपनी देता है और कई बार उस दौर के गानों को भी हम फर्स्ट पर्सन में जी लेते हैं.  लेकिन आज वो उस प्यार की वजह से कम बल्कि अपने अतीत की वजह से ज़्यादा आया था.

आज मौसम सुबह से ही ठंडक लिए था. रात को बारिश हुई थी. दफ्तर से लंच में वो बाइक उठा के चल पड़ा अपने याद शहर की ओर. कोई पुराना दोस्त ना मिल जाए उस मोहल्ले में इसलिए उसने हेलमेट भी पहन लिया था. नब्बे के दशक में जो सड़कें बहुत चौड़ी लगतीं थीं वो उसे कुछ संकरी सी लग रही थीं. टीनेज की हर चीज़ बड़ी होती थी शायद. तजुर्बा सबका आकार बराबर कर देता है. पहले कार भी कुछ ही लोगों के पास हुआ करती थी, लेकिन अब तो हर घर के बाहर एक कार खड़ी थी. बैंकों को पार्किंग स्पेस खरीदने के लिए भी अलग से एक लोन शुरू करना चाहिए. थम्स अप वाली दूकान की जगह एक मेडिकल स्टोर खुल गया था. सामने वाले मैदान में एक मंदिर खड़ा हो गया था. बच्चे न जाने कहाँ क्रिकेट खेलते होंगे अब? मैदान के सामने महबूब की गली के बाहर रोड में पानी भर गया था. जो उसकी छत थी अब वहां मकान की दूसरी मंज़िल है जिसके बाहर AC की एक आउटडोर यूनिट गरम हवा फुफकार रही थी. सभी मकानों की पुताइयों का रंग बदल चुका था और बहुतों में तो कोई रेनोवेशन भी हुआ था. उसका याद शहर उजड़ा-उजड़ा सा लग रहा था. बस अब वो वापस दफ्तर पहुंचना चाहता था. बाइक उसके घर के सामने भरे पानी से निकालते वक़्त अचानक रुक गयी. साइलेंसर में शायद पानी चला गया था .पैर टिकाये तो जूता गीला हो गया और उसमें भी पानी भर गया. बादल छंट चुके थे और उमस बढ़ने लगी थी. उसने बाइक को पानी से बाहर खींचा तो दूसरा जूते में भी पानी घुस गया. कई देर तक किक मारता रहा और झल्लाता रहा. हेलमेट उतार नहीं सकता था कहीं कोई पुराना साथी मिल जाए तो हंसी होगी कि अभी तक इसी गली में? वो नीचे बैठ कर स्पार्क प्लग चेक करने लगा.  तभी उसे हेलमेट के फ्लैप से एक औरत नज़र आयी जो उसी दरवाज़े से निकली थी. और तभी उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आयी. उसकी बाइक एक साइकल में बदल गयी और हाथों में स्पार्क प्लग की जगह एक चेन आ गयी. और तभी सारे मकानों के रंग बदलने लगे. सारी सड़कें फिर से चौड़ी होती चलीं गयीं. मंदिर गायब हो गया. गाड़ियां गायब हो गयीं. सोनू निगम की आवाज़ बैकग्रॉउंग म्यूजिक देने लगी और तभी... उसकी धड़कन एक बार फिर स्किप हो गई.

Sunday, January 1, 2017

Books read in 2016

Last year I read 43 books. Below are those books. Starred are recommended ones. The target for 2017 is of 60 books. Lets see how the year goes. Here goes the list:

1
Ba-Bye
Krishn Bihari
2
Madhushala
Bachchan
*
3
Mere Manch Ki Sargam
Piyush Mishra
4
Gunahon Ka Devta
Dharmveer Bharti
5
Kitne Pakistan
Kamaleshwar
*
6
Kathghare Mein Loktantra
Arundhati Roy
*
7
Kai Chand The Sar-e-Aasman
Shamsurrahman Farooqi
8
Ek Sahityik Ke Prempatra
Pushpa Bharti
9
Death Under the Deodars
Ruskin Bond
10
Relativity: The Special and the General Theory
Albert Einstien
11
Loser Kahin Ka
Pankan Dubey
12
The Glass Castle
Jeanette Walls
*
13
Metamorphosis
Franz Kafka
14
Khushwantnama (Mere Jeevan ke Sabak)
Khushwant Singh
15
Carol
Patricia Highsmith
16
Hum Tum aur who Truck
Mo Yan
17
Immortals of Meluha
Amish Tripathi
*
18
Secret of the Nagas
Amish Tripathi
19
The Oath of Vayuputras
Amish Tripathi
20
Narad Ki Bhavishyawani
Manu Sharma
21
The Home and the World
Tagore
*
22
Wings of Fire
APJ Kalam
23
Mrs Funnybones
Twinkle Khanna
24
The Rozabal Line
Ashwin Sanghi
25
2014: The Election that changes India
Rajdeep Sardesai
*
26
Cobalt Blue
Sachin Kundalkar
27
This Unquiet Land
Barkha Dutt
*
28
Forbidden Desires
Madhuri Banerjee
29
Breakthrough
Michael C. Grumley
*
30
Khali Naam Gulab Ka
Umberto Eco
31
Unity of Life and other essays
Tulsi Badrinath
32
Matchbox
Ashapurna Debi
33
Munnu: A Boy from Kashmir
Malik Sajad
*
34
The Brothers Bihari
Sankarshan Thakur
*
35
The Hour Before Dawn
Ajaz Ashraf
*
36
The Tunnel of Time
RK Laxman
37
Schitzophrenia
Diwakar Chaudhri
38
Station Eleven
Emily St. John Mandel
*
39
The Mystery of Munroe Island
Satyajit Ray
*
40
Ghaas Ka Pul
Ravindra Verma
41
NYPD Red 3
James Patterson
42
Conversation with Wahida Rehman
Nasreen Munni Kabir
*
43
Aadha Gaon
Rahi Masoom Raza