Monday, March 27, 2017

आठ छोटी बेचैन अकविताएं




दिलों की लकड़ी 
शायद
गीली हो चुकी
धुआँ तो खूब ही करती है
पर
धधकती नहीं अब

***

एक टुकड़ा बादल
तलाशती हैं आँखें
गुज़रते घने बादलों में
आज भी

***

यूं तो
रोज़ ही मरते हैं
हम सभी
एक बित्ता
अपने भीतर ही
और
उस अंश के निमित्त
दो बूंद नमकीन सी
टपका भी देते हैं
और बढ़ जाती है आगे 
ज़िंदगी

***

हर आदमी 
अपने भीतर 
एक 
अनुकूल संसार 
बनाए रखता है
प्रत्यक्ष संसार से 
किनारा कर 
उसमें 
शरण पा सकने के लिए

***

ये 
हमारे आकाश का नहीं
खिडकियों का भेद है
और
हमारा 
ये समझना अभी बाकी है

***

कोई अभिमन्यु
फँस रहा है
किसी 
चक्रव्यूह में 
मेरे भीतर
शायद

***

ज़िंदगी में कई बार 
प्रश्न नहीं 
बल्कि 
उत्तर
सामने आकर 
खड़े हो जाते हैं
वे उत्तर 
जिनके प्रश्नों से 
हम मुंह चुराने को 
अभिशप्त हैं

***

कविता मर गयी
नदियाँ सूख गयीं
मानस 
खड़ा देख रहा
धर्मों के आडम्बर की 
ओट से


Thursday, March 23, 2017

दीवार




देखो! आज मैं जल्दी आ गया। कल रात एक सपने की वजह से नींद ही नहीं आई। बड़ा अजीब सपना था। मैंने देखा कि मैं अकेले खड़े एक दीवार से बातें कर रहा हूँ। तभी अचानक दीवार भी मेरी बातों का जवाब देने लगती है। मैं डर के मारे भागने की कोशिश करता हूँ। तभी दीवार फाड़ के भीतर से ढेर सारे हाथ बाहर निकलने लगते हैं और मुझे कस के पकड़ लेते हैं। कुछ हाथों में ज़ंजीरें हैं जिनसे मेरे हाथ और मेरे पैर बांध दिये जाते हैं। मैं चीखना चाहता हूँ पर गले से आवाज़ ही नहीं निकलती। तभी उनमें से एक हाथ आकर मेरे मुंह में एक कपड़ा ठूंस देता है और एक दूसरा हाथ मेरे पूरे चेहरे को एक काले नकाब से ढंक देता है। मैं हाथ-पैर हिलाने की कोशिश करता हूँ, चिल्लाने की कोशिश करता हूँ, बेबसी में छटपटाता हूँ। बस तभी मेरी आँख खुल जाती है। धड़कन बहुत तेज़ चल रही थी। पूरा बिस्तर भी पसीने से तर-ब-तर हो गया था।

तुम्हें पता है पुराने जमाने में राजे-महाराजे अपने दरबार में खास तौर से एक ज्योतिष सपनों को इंटरप्रिट करने के लिए रखते थे। अभी एक दिन तुम्हारे डॉक्टर साहब ही ओनिरॉलॉजी के बारे में बता रहे थे। सपने यूं ही नहीं आ जाते बल्कि इनका ताल्लुक हमारे अवचेतन से होता है। हमारे सब-कॉन्शस में जो दबे इमोशन्स होते हैं उनका दरअसल हमें भी ठीक-ठीक पता नहीं होता। न जाने कितनी दबी-कुचली नफ़रतें, हसरतें, मुहब्बतें, सुदूर अंतस में कहीं कैद डर, फोबिया, लालच, अपमान, तमाम तरह के कॉमप्लेक्सेज़, उनसे उपजे पूर्वाग्रह, असुरक्षाएँ और न जाने क्या-क्या! डॉक्टर साहब कह रहे थे कि इन सपनों के ज़रिये हम भी अपने आप को भी बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

अच्छा ये तो देखो! क्या है! नज़ीर अकबराबादी! याद है तुम्हें ये किताब! दीवाली की पुताई के वक़्त मानिकपुर वाले घर के टांड़ से मिली थी। दीवाली के बाद सर्दियों में हम छत पर इसे पढ़ा करते थे। कल रात को जब नींद खुली तो यूं ही पुराना अटाला टटोलने लगा था। अचानक एक पुराने बैग के भीतर पड़ी मिल गई। देखो ना! अटाले का भी अपना एक सफर होता है। पता है, और क्या मिला उस बैग से! ये देखो! मेरी एक पुरानी शायरी और ये तस्वीर। इस शायरी और तस्वीर का भी एक किस्सा है। ये जो लड़की है ना तस्वीर में इसका नाम है फिरदौस। तुमने वसीम बरेलवी का वो शेर सुना है:

किताब-ए-माज़ी के औराख़ उलट के देख ज़रा
न जाने कौन सा सफ़हा मुड़ा हुआ निकले
(माज़ी=अतीत)

और सच में कल लगा कि जैसे कोई फूल किसी पुरानी किताब में मिल जाया करता है वैसे ही मैंने भी उसे पा लिया। ये पता है कोई पाँच साल पहले की बात है। तुम तक़रीबन दो साल से PVS में पड़ीं थीं। हालांकि मैं तब पूरी तरह हिम्मत नहीं हारा था लेकिन फिर भी पैरों में थकान चढ़ने लगी थी। दिमाग को बोरियत की दीमक ने चाटना शुरू कर दिया था। देवेन की शादी का न्योता मिला तो लगा कि थोड़ा पुराने दोस्तों से मिल कर अच्छा ही लगे। फिरदौस उसी शादी में मिली थी। अस्पताल की दवाइयों और बोतलों की महक से इतर वो किसी ताज़ा ख़ुशबू सी नज़र आई। दिल्ली से आई थी इलाहाबाद। देवेन की दोस्त थी। पुराने दोस्त मिले तो सबने वहीं घेर लिया। कहने लगे - अशांत मियां! आज बड़े दिनों बाद मिले हो। शायरी तो सुनाना ही पड़ेगा। इलाहाबाद जाते वक़्त सफर में कच्चे से कुछ शेर लिखे थे वही सुना दिये। देखो यही तो है वो कागज़ जो कल बैग में मिल भी गया।

इश्क़ की राहों में दिल, और खोया नहीं जाता
रूह से बोझा अब जिस्म का, और ढोया नहीं जाता
फैलाए अपना दामन खड़े हैं इस भीगती बारिश में
इन आँखों से और इसे अब, भिगोया नहीं जाता
फूल हों गर तो सोचें भी, कांटे लिए ज़िद बैठे हैं
हमको क्यों माला में, आखिर पिरोया नहीं जाता
मत छीनो मेरे ग़म मुझसे, इन्हें यहीं पर रहने दो
न गहरी रातों में अब, तन्हा सोया नहीं जाता

महफिल में तो सभी वाह वाह करने लग गए। फिर बहुत हंसी मज़ाक भी हुआ बड़ी देर तक। मैं तो जैसे उसी दुनिया का हो कर रह गया था। कितना ख़ुश था मैं वहाँ! हम लोग खाने के टेबलों पर बैठ गए। मैं, फिरदौस और जोशी एक ही टेबल पर बैठे थे। वहीं हमारी जान-पहचान शुरू हुई। उसने बातों-बातों में कहा कि आप अच्छा लिखते हैं। अब कोई यहाँ कानपुर में दाद देता तो मैं शायद इतनी तवज्जो भी न लेता। लेकिन उस वक़्त शायद बिलकुल कॉलेज के लड़के सा फील करने लगा था। ऐसा लगता था जैसे कोई पतंग हो जो अपनी डोर से कट गई है और बस उसे अब उड़ते जाना है हवा के साथ। शेख़ी बघारते हुए मैंने कहा कि अभी तो मैंने शेर सुनाये ही कहाँ हैं! ये तो ऐसे ही कच्चे से शेर थे। बात ये है कि सब यहाँ पुराने दोस्त हैं और इनमें किसी को भी लिटरेचर की कोई समझ है नहीं। कोई भी तुकबंदी सुना दो वाह-वाह कर देते हैं। अच्छे शेर तो बड़ी महफिलों के लिए संभालकर रखना पड़ता है। वो हंसने लगी। जोशी भी थोड़ी देर में दूसरे लोगों में चला गया। हम लोग खाने के बाद भी देर तलक बैठे रहे। रात भी बढ्ने लगी। देवेन और उसकी दुल्हन भी स्टेज से उठ चुके थे और खाने जा रहे थे। लोकल के सभी मेहमान अपने घर जा रहे थे। बाहरी लोग भी होटल वगैरह में जाने लगे थे। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुर्सियों के झुंड आपस में हंसी-चउरा कर रहे थे। ठंड भी बढ़ रही थे और केटरिंग वाले कॉफी बाँट रहे थे। हमें भी एक लड़का कॉफी पकड़ा गया। म्यूज़िक बंद हो चुका था। हम लोग बातें कर रहे थे। कॉफी के बाद उसने एक सिगरेट जला ली। दिल्ली की लड़की थी। कन्यूनिस्ट लेफ़्टिस्ट टाइप की। उसी तरह के कपड़े। तुम कहोगी कि मैं बहुत ज़्यादा स्टीरियो-टाइपिंग किए दे रहा हूँ। लेकिन सच मानो, मैं झूठ नहीं बोल रहा। एक तो छोटे शहरों में कोई लड़की सिगरेट पीती दिखती नहीं। और बड़े शहर से कोई आ जाये तो लोग बस मुड़-मुड़ के देखते ही रहेंगे। कॉफी सुड़कते सारे झुंड बारी-बारी से हमें ही निहारने में लगे थे। उसके साथ-साथ मैं भी अनकम्फ़र्टेबल होने लगा। तभी उसने कहा चलो थोड़ा बाहर टहल के आते हैं। मैंने भी बोल दिया- टहलना क्या! लॉन्ग ड्राइव पर चलते हैं! मैंने देवेन की गाड़ी निकाली और हम लोग निकल लिए कानपुर रोड की तरफ

धीरे-धीरे शहर की सड़कों से आगे निकलते जा रहे थे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी गाड़ी के काँच से छनती हुई आ रही थी। चौराहों पर नारंगी ट्रैफिक लाइटें अपनी भारी पलकों से टिमटिमा रहीं थीं। कुत्तों के झुंड अपनी-अपनी गलियों की निगहबानी कर रहे थे। गश्त लगाती पीली बत्तियाँ अपना वायरलेस ऑन किए इधर-उधर सुस्ता रहीं थीं। इन पीली बत्तियों, नारंगी सिग्नलों और स्ट्रीट लाइटों को पीछे छोडते हुए हम लोग भी बढ़ते जा रहे थे अपने आगे एक पीली रोशनी का पुंज लिए। स्ट्रीट लाइटों की कतारें ख़त्म हुईं तो गाड़ी की रोशनी में नहाते पेड़, संकीर्ण पुलिया के सफ़ेद किनारे और मील के पत्थरों ने हमारा साथ देना शुरू कर दिया। लेकिन हम लोग ट्रकों के डिपर की आड़ में बचते-बचाते हाइवे पर बढ़ते जा रहे थे। उसने धीमी आवाज़ में अपने मोबाइल पर गाना चला दिया।

तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीन है
मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है

रूना लैला की आवाज़ वाकई जादू है। हम लोगों ने एक ढाबे पर गाड़ी खड़ी की और चाय मँगवाई। बाद में सिगरेट भी जलाई। तुम्हें पता है उसे सिगरेट पीते देखना एक अलग ही एहसास था। हाइवे से गुजरते ट्रकों की रोशनी में बार-बार उसकी आँखों का नहा जाना। उसकी आँखों में जाने क्यों एक बगावत सी नज़र आती थी। मुझे हमेशा लगता था कि लड़के तो बेवकूफ होते हैं जो बेवजह फेफड़े जलाते हैं। लड़की जब सिगरेट जलाती है तो वो एक स्टेटमेंट होता है, एक बगावत होती है। एक चुनौती होती है उसे हमेशा एक फ्रेम में फिट करने को लालायित नज़र आने वाली मानसिकता के लिए। पिछले दो सालों से तुम PVS में फंसी थी और मैं घर, अस्पताल और दफ्तर के बीच अपनी मशीनी ज़िंदगी में एक पुर्ज़े-सा घिसा जा रहा था। वो तुम्हारे डॉक्टर साहब नहीं कहा करते सब-कॉन्शस वाली बात! हो सकता है इसी वजह से शायद मैं उसकी बगावत की ओर आकर्षित हुए जा रहा था। तमाम लोग कहा करते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं! जैसी मर्ज़ी होगी जिएंगे! लेकिन परवाह ना करते हुए भी अगर कोई गुस्ताखी ना की तो परवाह ना करने का फायदा क्या? वजह तो खैर नहीं जानता इस आकर्षण की लेकिन इतना ज़रूर चाहता था कि वो रात कभी ख़त्म ना हो। ढाबे पर सिकती तंदूरी रोटियों की ताल और अलाव से उठती चटर-पटर की उन आवाज़ों के बीच से वो आसमान के सितारों को निहारने में मसरूफ़ थी। बड़े शहरों के नसीब में सितारे होते ही कहाँ हैं! मोबाइल के गाने बदलते जा रहे थे। उसने गाने की आवाज़ थोड़ी और मद्धम कर दी। इकबाल बानो की कोई ठुमरी चल रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने भी नहीं हटाया। हमारे चेहरे अंधेरे की वजह से भले ठीक से नज़र नहीं आ रहे थे पर उस अंधेरे में भी नज़रों के मिलने का ज़रूर एहसास हुआ था। हम लोग उस moment में कैद हो के रह गए थे। तभी ढाबे से एक लड़का आया गिलास-पैसे लेने और वो moment टूटा। मैंने लड़के से दो चाय और बुलवाई। उसके जाने के बाद उसने बताया कि किस तरह अपने पति को उसने लोधी गार्डेन में एक दूसरी औरत के साथ रोमांस करते पकड़ा था। पब्लिक में कोई तमाशा बनाने के बजाय उसने पति के मोबाइल से खुद को तीन तलाक sms कर लिए और खुद उसी दिन मुखर्जी नगर के एक PG में शिफ्ट हो गई। वो शायद बिलकुल वैसी थी जैसा मैं हो जाना चाहता था। कहीं-न-कहीं इस नैतिकता के लबादे से आज़ाद हो जाना चाहता था। लेकिन मैं कायर था शमा! लोग क्या कहेंगे? अपनी बीवी को इस हालत में छोड़ कर चला गया! मैं तुम्हें छोड़ देना चाहता था शमा! और आज भी मैं तुम्हें छोड़ देना चाहता हूँ। मैं भी आज़ाद हो जाना चाहता हूँ शमा! मैं थक गया हूँ इस अकेलेपन से! तुमसे इस तरह बात करते-करते। लगता है कि किसी दीवार से बात कर रहा हूँ। हाँ। अब मुझे अपने सपने का मतलब भी समझ आ रहा है। तुम्हारे साथ इस तरह जीते-जीते, तुमसे इस तरह मोनोलॉग करते-करते सात साल बीत चुके हैं शमा। सात लंबे साल! अब तो तुम्हारी आवाज़ भी शायद न पहचान पाऊँ। अपनी इस शादी को अस्पतालों के इन चक्करों के बीच खोजते-खोजते मैं थक गया हूँ। तुम अब मत आओ शमा! मुझे तो ये भी नहीं मालूम कि अब अगर तुम वापस आ भी गईं, तो मैं तुमसे बात क्या करूंगा? इतने सालों से तुमसे बात करते हुए तो मैं खुद से ही बात कर रहा हूँ। तुमसे तो बात करना भी मैं भूल चुका हूँ शमा। बस अब चली जाओ और ख़त्म कर दो इस अंतहीन सिलसिले को। मैं तो आदर्श पति के इस लबादे के बोझ में पिसा जा रहा हूँ। कैसे छोड़ दूँ अपनी तरफ से तुम्हें! दरअसल हम सभी अपनी-अपनी ज़िंदगियों में अपनी ही रची एक भूमिका चुन लेते हैं और फिर ताउम्र उसी को ढोये फिरते हैं। डरता हूँ कि कैसा दिखूँगा यदि इन भूमिकाओं, इन आवरणों को हटा दूँ तो? फिरदौस जैसा? या तुम्हारे जैसा?

पता है अगले दिन जाते वक़्त उसने अपनी यही फोटो दी थी। देखो! इसके पीछे क्या लिखा था!

कुछ इस तरह ज़िंदगी में अपनी, हमें जगह देना
तस्वीर जब कभी हमारी देखना, तो मुस्करा देना

जब मैंने उससे पूछा कि अब कब मिलोगी तो पता है उसने क्या कहा था? उसने कहा था कि अब तभी मिलेंगे जब तुम आज़ाद हो जाओगे।


खैर, चलो! ऑफिस के लिए लेट हो रहा हूँ। तुम्हारी भी स्पंजिंग का टाइम हो रहा है। नर्स भी आती होगी। शाम को थोड़ी देर से आ पाऊँगा, ऑफिस में काम थोड़ा ज़्यादा है।

Sunday, March 12, 2017

विधानसभा चुनाव - नज़रिया




कल पाँच राज्यों में चुनाव के नतीजे आ गए। दिन भर YouTube और Facebook पर ऑनलाइन नतीजे देखते रहे। ये चुनाव भी एक बार फिर डेमोक्रेसी की च्विंगम ही साबित हुए। रस तो कब ही का खत्म हो चुका है बस रबड़ है जब तक चबाते रहो। प्रधानमंत्री एक बार फिर सबसे शक्तिशाली साबित हुए। उनकी जीत के बाद तथाकथित liberals एक बार फिर छाती पीटते हुए नज़र आए। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। हर जगह conservatives आगे आ रहे हैं और liberals पीछे जाते जा रहे हैं। हिंदुस्तान में पीछे नहीं बल्कि बाहर ही हो जाएँगे लगता है। लेकिन सवाल है कि हिंदुस्तान में क्या liberals हैं भी? मुझे नहीं लगता। हिन्दुस्तान में सही अर्थों में कोई liberal पार्टी है ही नहीं। 

भारत दरअसल एक वोट-बैंक की राजनीति है, ideologies की नहीं। किसी भी तरह का 'ism' एक विचारधारा होती है लेकिन जब आप वोट-बैंक की बात करते हैं तो कहीं न कहीं आपके लिए विचारधारा गैर ज़रूरी हो जाती है बनिस्बत चुनाव जीतने के। 

तमाम पब्लिक भी बहुत खुश है कि उनकी पसंद की पार्टी जीत गई। जिन्हें खुश होना हों, हो लें, लेकिन खुद से एक सवाल भी करें कि जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के भ्रष्ट है वो दूसरी में जा के दूध का धुला कैसे हो गया? इन नेताओं की दरअसल कोई व्यक्तिगत विचारधारा है ही नहीं। जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के धर्मनिरपेक्ष है वही दूसरी में जा के कट्टरपंथी कैसे हो जाएगा? ये सरासर नामुमकिन है। सिद्धू और बहुगुणा के उदाहरण ताज़ातरीन सबके सामने हैं। क्या सिद्धू जब तक भाजपा में थे तो क्या मुसलमान विरोधी थे और आज तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों के खेमे में जा कर धर्मनिरपेक्ष हो गए? वहीं रीता बहुगुणा कांग्रेस से निकल कर भाजपा में गईं तो क्या हिंदुत्ववादी हो गईं? दरअसल ये सारे लोग शातिर, मौकापरस्त और चालाक राजनीतिज्ञ हैं। अपनी शातिर चालों में ये पब्लिक को उलझा के रखते हैं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या जनता को विकल्प मिला? 

एक राजनेता पार्टी 'A' से विधायक है और चुनाव के पहले एंटिइंकमबेनसी को देखते हुए पार्टी 'A' से पार्टी 'B' में चला जाता है। जनता 'विकल्प' की तलाश में 'PARTY B' को चुनती है लेकिन जो राजनेता चुन के आता है वो तो वही है जो पिछली सरकार में था। हम ये सोचें कि क्या यह व्यक्ति अचानक एक भ्रष्टाचारी से आदर्शवादी बन जाएगा? क्या ऐसा हो सकता है? और सबसे बड़ी बात है कि पार्टी 'B' ने तो चुनाव में जाने से पहले ही जनता को धोखा दे दिया। अगर दूसरी पार्टियों के दलबदलुओं को चुनाव में उतार कर एक विकल्प देने की बात की जा रही है, तब तो ये पहले दिन से ही ढोंग कहलाएगा और इसका पर्दा फ़ाश तो तभी हो जाता है जब टिकिटों का बंटवारा होता है। 

जनता को ये पता तो होता है कि चुनाव भी आईपीएल की तरह हो चुका है। पिछली बार जो इस टीम से खेला था अबकी बारी इस वाली से खेलेगा। अब जब जनता की जानकारी में सारी बातें हैं तो वह तो पुराने अनुभवों के आधार पर candidates को वोट देगी। इसलिए ठीक इसी समय उम्मीदवारों से और उनके ट्रैक-रिकॉर्ड से ध्यान हटाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। अगर ध्यान नहीं हटाया जाएगा तो पब्लिक तो हर उम्मीदवार के पिछले काम-काज को तौलेगी ही। इसमें सबसे पहले ज़रूरी हो जाता है जनता के सामने आदर्श पेश किया जाना। एक पार्टी विचारधारा के नाम पर हिन्दुत्व को परोसती है, दूसरी liberalism को। जबकि अभी तक जो धर्म-निरपेक्ष थे वही अब हिंदुत्ववादी खेमे में बैठे हैं। वोटों का ध्रुवीकरण ज़रूरी हो जाता है। जनता की स्टीरियो-टाइपिंग ज़रूरी हो जाती है। स्टार-प्रचारकों को न्यौते दिये जाते हैं। ये सब इसलिए कि जनता से ये मौका छीनना है कि वह अपने क्षेत्र के बारे में, चुनाव में उतरे सभी प्रत्याशियों के बारे में, उनके पिछले रेकॉर्ड के बारे में, किसी के ऊपर कोई क्रिमिनल केस है तो उसके बारे में कुछ भी मूल्यांकन करे। इस कड़ी में सबसे पहले कोई विवाद पैदा किया जाता है। हम सभी ने देखा था कि किस तरह पिछले कुछ चुनावों के समय भी लव जिहाद, घर वापसी, intolerance जैसे मुद्दे यकायक चुनावी discourse के बीच पटक दिये गए थे। इस बार रामजस कॉलेज में मार-पिटाई के बाद फिर एक नया मुद्दा आया - कौन nationalist है कौन anti-national? हालांकि ये मुद्दा पहले भी उठा है लेकिन चुनाव के समय ही इसे परवान चढ़ाया गया। पूरा देश इस debate में फंस गया। जब बाहर से कोई स्टार-प्रचारक जाता है तो उसे ना तो लोकल मुद्दों की detail में  जानकारी ही होती है और ना ही वो कोई ठोस या objectivity भरा कोई वादा ही कर सकता है। उसके भाषणों में एक ही बात होती है 'विकास' की बातें। विकास अपने आप में बहुत vague शब्द है। आवारा पूंजी और कॉर्पोरेटीकरण का ही दूसरा नाम विकास रख छोड़ा है। कोई मॉडेल किसी के पास नहीं है। दो विकल्प हैं - एक नागनाथ है और दूसरा सांपनाथ। पूरे चुनाव के दौरान टीवी चैनल और बाकी सोशल मीडिया इस विवाद में कूद-कूद के भाग लेतें है। एक पार्टी nationalist बन जाती है, बाकी सब एंटी-नेशनल। चुनाव कई चरणों में होता है और चरण-दर-चरण ये debate भी बहुत तीखा होता जाता है। चुनाव खत्म होते ही देशभक्ति के बादल छंट जाते हैं और कान फोडू debates की जगह ले लेते हैं Exit Polls। शेयर बाज़ार Exit Polls के दम पर एक दिन और हरे निशान में चढ़ता है। 

अब भाजपा को ये समझ आ गया है कि राम मंदिर में अब वो आकर्षण नहीं रहा। अब ज़रूरत है एक नए और पहले से बड़े ध्रुवीकरण के जुमले की। जो लोग कट्टर हिन्दू नहीं हैं वो भी nationalist तो बन ही सकते हैं क्योंकि सतही तौर पर nationalism काफी कुछ patriotism या देशभक्ति की तरह लगता है। आम दुनियादारी वाले आदमी के लिए ये बहुत पेचीदा बातें हैं कि भारत माता की जय न बोलना किस तरह से फ्रीडम ऑफ स्पीच से कनैक्टेड है और राष्ट्रगान के लिए खड़ा ना होना किस तरह ज़रूरी नहीं है। जो बातें दरअसल अकैडमिक मुद्दों के discussions की हैं उन्हें राजनीतिज्ञ बहुत चालाकी से प्राइमटाइम debate में तब्दील कर देते हैं। आम आदमी जो न तो इन मुद्दों की संवैधानिक पेचीदगियों से उतना परिचित होता है न ही उसे इतनी फुर्सत है। उसे बस एक स्टैंड लेना होता है। वो देखता है उन liberals को न्यूज़-स्टूडिओ में गला फाड़ते हुए जिन्होनें उसे बेरोजगारी और भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया था और जहां उसे वे लोग ये कहते हुए नज़र आते हैं कि भारत माता की जय बोलना ज़रूरी नहीं है, राष्ट्रगान में खड़े होना ज़रूरी नहीं है। वो फैसला कर लेता है और इस तरह वो न केवल एक liberal पार्टी को ही छोडता, बल्कि liberalism को भी छोड़ देता है। तमाम नतीजों के सारे भोंपू जब कल बजे, तो यही लगा कि हर शख्स liberals से खार खाये बैठा है। 

liberals से ये नफरत आज एक ग्लोबल पैटर्न है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ग्लोबलाइज़ेशन का दौर है। पूंजी एक देश से दूसरे देश में बह रही है और साथ में बहुत से sentiments भी बहा के ले जा रही है। इसी आवारा पूंजी के भरोसे टिके स्टॉक मार्केट, वायदा कारोबार, रीयल एस्टेट और War Against Terror के बुलबुले में क़ैद है सारी अर्थव्यवस्थाएँ। और ये बुलबुला ऐसा है जो अक्सर ही फटता भी रहता है। इसका फटना ही हर बार एक असंतोष, एक एंटी-इंकमबेनसी खड़ी कर देता है। और तब यही आवारा पूंजी एक दलबदलू की तरह दूसरे खेमे में शिफ्ट हो जाती है और एक rebellion की बोली बोलने बोलती है। बस, यहीं से पैदा होता है फासीवाद। फासीवाद कोई अचानक से नहीं आ जाता। 'विकल्प' की लंबी और थकाऊ तड़प या तो एक क्रान्ति को जन्म देती है या एक फासीवादी को जन्म देती है। इतिहास की जानकारी रखने वाले मेरी इस बात से तो सहमत होंगे ही कि पब्लिक ने liberals को भरपूर मौका दिया है। काफी समय उन्होनें राज किया। लेकिन उन्होनें liberalism की चाशनी में लपेट कर गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ही दिये हैं। ये तो बस चाशनी के बदलने का दौर है। लेकिन चाशनी बदल भी जाये तो भी चीनी तो वही रहनी है।