Tuesday, February 18, 2020

एक शाम का गुमनाम होना अभी बाक़ी था




एक शाम का गुमनाम होना अभी बाक़ी था
एक मोहब्बत का अंजाम होना अभी बाक़ी था

बड़े एहतिमाम से हर शाम जलाते थे चराग़
उम्मीदों का नाक़ाम होना अभी बाक़ी था

वो लेते ही न थे हमारे तजरबों से सबक़
तनहाइयों का हर शाम होना अभी बाक़ी था

ढूँढता फिरता था म'आनी अपने वजूद के
तेरा नाम हमनाम होना अभी बाक़ी था

मेरे अफसानों में निशां ढूंढेगा अपने कोई
आख़िरी ये भी एक काम होना अभी बाक़ी था

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