मेरे अर्थ
मेरे भीतर छिपे अर्थ को व्यक्त करते शब्द
Saturday, February 14, 2026
ऑटो-पायलट पर चलता देश
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भारत का "अमृत काल" एक 'आइस एज' (बर्फ युग) जैसा क्यों लग रहा है? गुरुग्राम की किसी बालकनी में खड़े होकर देखिए, आपको आज के आ...
Friday, June 20, 2025
अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ
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अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ हर शख़्स को हर शख़्स से ख़फ़ा देख रहा हूँ सूरज भी लगा आज उदासी से है निकला और शाम में भी दर्द नया देख रहा ह...
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Monday, May 12, 2025
कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में (ग़ज़ल)
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कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में इक सफ़र ही तो बस रवाँ है मुझ में शोर बाहर का थमा तो समझ आया भीतर भी इक शहर है यहाँ मुझ में फिर आएगी बारि...
Thursday, March 27, 2025
ग़ैर-मौजूदगी
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अब बस ढोता हूँ तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी को एक बोझे की मानिंद— बोझा जिसे किसी ने एक हुक में पिरोकर मेरी चमड़ी के ठीक नीचे टाँक दिया हो। सां...
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Monday, December 16, 2024
पुराने मोड़ से रस्ते नए निकल जाते हैं
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पुराने मोड़ से रस्ते नए निकल जाते हैं नए तजुर्बों से पुराने हल निकल जाते हैं सच कहूँ तिरी बात से अब कोई गिला नहीं ये तो आँसू हैं, बस यूं ही न...
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