मेरे अर्थ

मेरे भीतर छिपे अर्थ को व्यक्त करते शब्द

Thursday, April 16, 2026

जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे

›
  जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे लफ़्ज़  न कोई असर-दार हुआ करते थे बड़ी उम्मीदों से देखती थी दुनिया  हम कहां ऐसे लाचार हुआ करते थे बियाब...
Thursday, April 9, 2026

स्पंज युग

›
किसी तेज़ धार से नहीं , ये सब हवा के गाढ़े होने से शुरू होता है। एक धीमा , चिपचिपा रस बर्फ़ की चोटियों से उतरकर , नमक-भरे किनारों तक...
Saturday, February 14, 2026

ऑटो-पायलट पर चलता देश

›
भारत का "अमृत काल" एक 'आइस एज' (बर्फ युग) जैसा क्यों लग रहा है? गुरुग्राम की किसी बालकनी में खड़े होकर देखिए, आपको आज के आ...
Friday, June 20, 2025

अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ

›
अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ हर शख़्स को हर शख़्स से ख़फ़ा देख रहा हूँ सूरज भी लगा आज उदासी से है निकला और शाम में भी दर्द नया देख रहा ह...
4 comments:
Monday, May 12, 2025

कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में (ग़ज़ल)

›
कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में इक सफ़र ही तो बस रवाँ है मुझ में   शोर बाहर का थमा तो समझ आया  भीतर भी इक शहर है यहाँ मुझ में    फिर आएगी बारि...
›
Home
View web version

About Me

My photo
Abhishek Thakur
I read a lot. I write a little. I like writing stories but sometimes other stuff as well.
View my complete profile
Powered by Blogger.