Friday, April 14, 2017

पंखुड़ी




कई बार अतीत बीत कर भी नहीं बीतता और वर्तमान आकर भी नहीं आता। आज साल भर बाद भी उस घर के बीते हुए लम्हें सीत के उभरे नक्शों की शक्ल में उसकी दीवारों से चिपके टंगें थे। उन दीवारों के दायरे में क़ैद धुएँ के गुबार, बरसाती मौसम के बदबूदार चिपचिपे कपड़े, दीवान की चादर पर चिपकी चिकत्ती सब मिलकर अतीत के उन नक्शों से यादों की चूती पपड़ियों को रोज़ देखा करते। बरसात में उस घर का अतीत और भी चिपचिपा हो गया था। छत से लटके उस पंखे की तरह जो धुएँ की कालिख को अपनी पंखुड़ी से चिपकाए रोज़ बेहिसी से उसके ऊपर मंडराया करता। कमरे में रखे उस फर्नीचर की तरह जो अपने भीतर की कुरेदती दीमक को अपनी आत्मा से चिपकाए इंतज़ार में खड़ा रहता ऐसे ही किसी एक दिन भुरभुरा के गिर पड़ने के लिए। उसी भुरभुराते सोफ़े पर बैठा वो सोचा करता कि सुलगती सिगरेट शायद भीतर जाकर सीत की चिपचिपी दरारों, उनमें उभरे नक्शों और उनसे चूती अतीत की पपड़ियों को भरेगी, लेकिन वो सिगरेट महज़ उसके सामने शून्य में तैरती एक एशट्रे ही भर पाती।

एक और शून्य भी था उस घर में। एक और एशट्रे भी... जिसमें सुधा अपनी आत्मा पर चिपके अपने अपराध-बोध की राख़ जमा करती। न बीरेन की दरारें ही भरतीं थीं, न सुधा का अपराध-बोध ही खुरचता था। जब वो बाहर दीमक लगे सोफ़े में भुरभुराता बैठा रहता, वो भीतर अपने पलंग पर लेटे, दवाइयों के कडवेपन को अपने ज़ेहन से चिपकाए, उम्मीदों की बत्ती बंद किए, अतीत के झीने रोशनदान से रिसते शून्य में तैरती पड़ी रहती। सिरहाने एक ढंका गिलास रखा रहता जिसके पानी में घुले गुनाह उसके भीतर तैरते कडवेपन को और भी भीतर तक ठेल देते। आँखों ने काफी पहले रोशनी बर्दाश्त करना छोड़ दिया था। दोनों कमरों के बीच का एक साझा अतीत भी था जो साल भर पहले अपने धड़े से दो फाँकों में बंट चुका था। जब अतीत बंटता है तो उसके तमाम किरदार गौण हो जाते हैं... शून्य की तरह... कभी झीने रोशनदान से रिसते हुए, कभी एशट्रे में अपनी भुरभुरी कालिख जमा करते हुए। रोशनदान और एशट्रे के बीच एक काला गुबार भी जमा हो चुका था... जो न फटता था, न ख़त्म होता था। उतना ही ताज़ा बना रहता, उतना ही सख्त। साल भर हुए दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी। उनकी बेटी पंखुड़ी की आज पहली बरसी थी।

क्या कोई भी चीज़ हमेशा एक सी रहती है?... रह सकती है? न बीरेन और सुधा की ज़िंदगियाँ हमेशा से ऐसी थीं ना इस घर की दीवारें। कहते हैं कि ज़िंदगी में खुशियों के दाखिल होने के अनगिनत रास्ते होते हैं। उस दिन वो एक ख़बर की शक्ल अख़्तियार कर अस्पताल के उस लेबर रूम से बाहर आई थी

- बधाई हो! लड़की हुई है!

थोड़ी ही देर में वो खुशी लेबर रूम से निकल कर वार्ड में शिफ्ट हो गई। उस खुशी का नाम उन्होनें पहले ही सोच रखा था

- पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा न!
- अगर लड़की हुई तो
- लड़की ही होगी
- तुम्हें कैसे मालूम?
- मेरे गट फीलिंग कहती है
- अच्छा!
- हाँ!

अब ये बातें भी तमाम दूसरी बातों की तरह उन नक्शों की उभरी पपड़ियों से चिपकी हैं जो कभी-कभी छिटक कर बंद आँखों के पीछे तैरती यादों, मलालों और गुनाहों की ग्रंथियों में भी उतर जाती हैं। और तब एक बार फिर मन के किसी कोने में वो दिन दोबारा गुज़रने लगता है। जब बीरेन ने सुधा को 'थैंक यू' कहा था। बदले में सुधा सिर्फ मुसकुराई थी। उस वक़्त पंखुड़ी अस्पताल के सफ़ेद पालने में लेटी अपनी नाज़ुक पलकें उठाए क्षितिज से किसी शून्य में निहार रही थी। लगता था जैसे ज़िंदगी के लम्हें उसी शून्य से रिसते हुए उसके पास चले आएंगे। फिर नर्स का आना और पंखुड़ी के दूध का वक़्त हो जाना और बीरेन का बाहर रखी फाइबर की कुर्सियों में शिफ्ट हो जाना। सब कुछ उसी तरह हर रोज़ बीतता चला जाता है। फिर नर्स का घबराहट में बाहर निकलना और फ्लोर पर बने स्टाफ रूम की तरफ भागना और इंटरकॉम पर एक नंबर डायल करना भी हर रोज़ उसी कसक के साथ बीतता चला जाता है।

- सर! वार्ड नंबर 13 में इमरजेंसी है।
- अभी जिस बच्ची की डिलिवरी हुई है, उसकी चमड़ी नीली पड़ रही है!
- हाँ! चमड़ी पर दाने भी निकल रहे हैं। होंठ काले पड़ गए हैं।
- दूध नहीं पिला पा रहे। मुंह से झाग निकल रहा है।

बाहर के कमरे में रखे सोफ़े पर पड़ा वो अपनी खुशियों को भुरभुराता हर रोज़, बार-बार महसूस करता है। बार-बार दिखता है उसे पैथोलॉजी का वो लड़का और पंखुड़ी की नसों में धँसती वो सुई, उसके भीतर का रिसता काला ख़ून... धुएँ के किसी गुबार की तरह... काला... बंद दरवाजों, खिड़कियों और दीवारों के दायरे में क़ैद अंधेरे की तरह... काला... आत्मा में धँसते कड़वेपन की तरह... काला... तैरते... ढंके... गुनाहों की तरह... काला।

और फिर...

- सर! बच्ची की तबीयत अचानक बिगड़ गई है।
- डॉक्टर आ रहे हैं। कुछ टेस्ट करने पड़ेंगे।
- ख़ून में कोई इन्फेक्शन लगता है।

और फिर...

- पैथोलॉजी से लड़का आ रहा है ब्लड सैंपल के लिए।
- ब्लड ग्रुप पता लगते ही आप ब्लड का बंदोबस्त करने की कोशिश कीजिये।
- रिसेप्शन से ब्लड-बैंकों के नंबर मिल जाएंगे।

और फिर...

- देखिये! बच्ची के लिवर में इन्फ़ैकशन है।
- ख़ून में ज़हर फैल रहा है। ब्लड-ट्रांसफ़्यूज़न करना पड़ेगा।
- अभी ICU में शिफ़्ट करते हैं। ऊपर से ऑक्सीज़न भी देना पड़ेगा।

उसकी आँखों में तब दो चमकती बूंदें तैरने लगीं थीं और तब वो उन्हें गिरने से रोकने की कोशिश कर रहा था। तब... जब सब कुछ धुंधला और आभासी हुआ जा रहा था और सुधा उसी पलंग पर लेटी थी। उसकी बंद आँखों के पोरों से झड़ते अपराध-बोध सब्ज़ तकिये के किसी शून्य में रिसते जा रहे थे और वो ख़ुद एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में ब्लड-बैंकों के नंबरों का पर्चा लिए पिंडलियों में उठती सिहरनों को चिपकाए खड़ा था। तब... जब यादों की किसी अंधेरी दीवार से एक पपड़ी भुरभुरा के उखड़ गई थी। हाँ!... ठीक उसी वक़्त पहली बार उसे अपने और सुधा के बीच हुई नाड़ी के ख़ून वाली बात याद आई। पिंडलियों की सिहरन अचानक तेज़ हो गई और अपना संतुलन भी उसे बिगड़ता-सा लगा। धुंधली तैरती नज़रों से उसने सुधा की ओर देखा। वो भी उसे उस सब्ज़ तकिये के रास्ते उस शून्य में रिसती हुई सी प्रतीत हुई। सब कुछ धुंधला और आभासी-सा हुआ जा रहा था।

अगले दिन तक पंखुड़ी पूरी तरह मुरझा चुकी थी। उसकी चमड़ी पूरी तरह काली पड़ चुकी थी। एक मखमल का कपड़ा लाया गया था। पंखुड़ी को उसमें समेटा गया था। तब वो बार-बार ICU के शीशे के पास जाया करता। अपनी धुंधलाती पंखुड़ी को झुलसते हुए देखता और उसके ताप को अपनी आत्मा पर चढ़ता महसूस किया करता। आज साल भर बाद भी वो कपड़ा उनके बीच साझी एक अलमारी के एक अंधेरे खंड में रखा था। सुबह से आज दो बार वो उस कपड़े को अलमारी से निकाल कर उसमें अपनी पंखुड़ी की महक को महसूस करने की कोशिश कर चुका था। कभी पालथी मारकर उस कपड़े को अपनी गोद में रखता और कभी हताशा में तैरते आंसुओं को कमीज़ से पोंछता कि खारा पानी उस खुशबू को कहीं धुंधला न दे। पंखुड़ी उस ICU की आभासी दुनिया से कभी बाहर न आ सकी। बाहर के इसी कमरे में उसे रखा गया था। एक दिया जलाया गया था। गंगाजल भी छिड़का गया था। नहलाया भी गया था। नए कपड़े भी पहनाए गए थे। और फिर आया था वो सफ़ेद कपड़ा जिसमें उसे लपेटा गया था। सोने के सिक्के के साथ तुलसी उसने उसके मुंह में रखी थी। श्मशान के उस गड्ढे में अपने इन्हीं हाथों से उसे लिटाया था। एक मुट्ठी मिट्टी उसने उसके सफ़ेद कपड़ों पर उड़ेली थी। फिर धीरे-धीरे अंधेरे ने उस गड्ढे को लील लिया था। गरुड पुराण के ख़त्म होते तक उस अंधेरे ने उसे, सुधा को और इस घर को भी उसी गड्ढे में लील लिया था। अब जब भी वो अपने चारों तरफ देखता तो उसे वही अंधेरा अपने इर्द-गिर्द महसूस होता। फिर जब वो तैरती एशट्रे देखता तो एक और सिगरेट जला लेता। झक से उजाला तो ज़रूर होता लेकिन धुएँ का एक उठता गुबार उस उजाले को जल्द ही लील लेता... उसी अंधेरे गड्ढे की तरफ। 

तभी उसे भीतर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई। वो भीतर की ओर दौड़ा। सुधा कमरे के फर्श पर पड़ी थी। सिरहाने रखा गिलास भी वहीं बाजू में पड़ा था। भीतर भरे सारे गुनाह फर्श पर फैल चुके थे। अकड़े हाथ, आकडे पैर। भींचे हुए दाँत। कांपता शरीर। आँखें अब भी रोशनदान की ही ओर। उसने देखा कि सुधा के मुंह से कोई कड़वा झाग निकल रहा था। उसकी नज़रें उस रिसते झाग पर केन्द्रित हो गईं और तब उसके भीतर की दीवार से कोई पपड़ी भुरभुरा कर गिरी। उसे एक बच्ची की याद आई जिसके झुलसते होंठों से उसने एक बार इसी तरह का कड़वा झाग निकलते देखा था।

- पता है! मेरे अजमेर वाली बुआ कह रही थी कि अगर बच्चे के पैदा होते ही उसके होंठों पर नाड़ी का ख़ून लगा दो तो होंठ एक दम गुलाब की पंखुड़ी की तरह लाल हो जाते हैं
- भूल के भी ऐसा मत करना।
- अरे! मैं थोड़ी कुछ करे दे रही हूँ। मैं तो बस ऐसे ही बता रही हूँ।
- तो मत बताओ।
- अच्छा! ठीक है! नहीं बताती। गुस्सा क्यों होते हो? वैसे... पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा ना!


बीरेन अचानक ही शांत हो गया। अपने पैर उसने पीछे खींचे। पीठ घुमाई और अपने दीमक लगे सोफ़े पर वापस आकर बैठ गया। मखमल दोबारा अपनी गोद में रखा। सिगरेट सुलगाई। एक लंबा कश खींचा। सोफ़े पर अपना सिर टिकाया और आँखें बंद कर लीं। तभी... उसे लगा... कोई कड़वापन उसके भीतर भी धँसता जा रहा है।