जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे
लफ़्ज़ न कोई असर-दार हुआ करते थे
देखती थी बड़ी क़द्र से दुनिया कभी
हम कहां ऐसे लाचार हुआ करते थे
ये जो वीरान-सी लगती है बस्ती तुम्हारी
ख़ूबसूरत कभी यहां गुलज़ार हुआ करते थे
गुज़र जाते हैं जो आज अजनबी बन के
कभी हमारे वो तलबगार हुआ करते थे
वो जो आज अपने होंठों को सिए बैठे हैं
महफ़िल की कभी झंकार हुआ करते थे
जीत के जश्न में था शामिल सारा ज़माना
हम फ़क़त हार के हिस्सेदार हुआ करते थे
यूं मिली सज़ा जैसे भरे शहर में बस
इकलौते हमीं गुनहगार हुआ करते थे
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