दिलों की लकड़ी
शायद
गीली हो चुकी
धुआँ तो खूब ही करती है
पर
धधकती नहीं अब
***
एक टुकड़ा बादल
तलाशती हैं आँखें
गुज़रते घने बादलों में
आज भी
***
यूं तो
रोज़ ही मरते हैं
हम सभी
एक बित्ता
अपने भीतर ही
और
उस अंश के निमित्त
दो बूंद नमकीन सी
टपका भी देते हैं
और बढ़ जाती है आगे
ज़िंदगी
***
हर आदमी
अपने भीतर
एक
अनुकूल संसार
बनाए रखता है
प्रत्यक्ष संसार से
किनारा कर
उसमें
शरण पा सकने के लिए
***
ये
हमारे आकाश का नहीं
खिडकियों का भेद है
और
हमारा
ये समझना अभी बाकी है
***
कोई अभिमन्यु
फँस रहा है
किसी
चक्रव्यूह में
मेरे भीतर
शायद
***
ज़िंदगी में कई बार
प्रश्न नहीं
बल्कि
उत्तर
सामने आकर
खड़े हो जाते हैं
वे उत्तर
जिनके प्रश्नों से
हम मुंह चुराने को
अभिशप्त हैं
***
कविता मर गयी
नदियाँ सूख गयीं
मानस
खड़ा देख रहा
धर्मों के आडम्बर की
ओट से
