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Thursday, April 16, 2026

जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे

 



जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे
लफ़्ज़ न कोई असर-दार हुआ करते थे

बड़ी उम्मीदों से देखती थी दुनिया 
हम कहां ऐसे लाचार हुआ करते थे

बियाबां लगती है ये बस्ती तुम्हें आज
ख़ूबसूरत यहां गुलज़ार हुआ करते थे

गुज़र जाते हैं वो आज अजनबी बन कर 
जो हमारे तलबगार हुआ करते थे

जो आज अपने होंठों को सिए बैठे हैं
महफ़िल की कभी झंकार हुआ करते थे

जीत के जश्न में शामिल था सारा ज़माना
हम बस हार के हिस्सेदार हुआ करते थे

यूं मिली सज़ा जैसे भरे शहर में 
एक बस हमीं गुनहगार हुआ करते थे

*

Friday, June 20, 2025

अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ




अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ
हर शख़्स को हर शख़्स से ख़फ़ा देख रहा हूँ

सूरज भी लगा आज उदासी से है निकला
और शाम में भी दर्द नया देख रहा हूँ

हर मौत पे मुस्कान है, उत्सव का समां है
मैं दोस्तों का रंग जुदा देख रहा हूँ

इस दौर के इंसान की तहरीर क्या कहिए
हर आँख में बाज़ार छुपा देख रहा हूँ

तन्हाई के साहिल पे खड़ा हूँ मैं अकेला
लहरों में तेरा नाम लिखा देख रहा हूँ

अख़बार में भरमार-ए-इश्तेहार छपी है
सच का लहू बहता हुआ देख रहा हूँ

वो लौट के आया नहीं बरसों से मगर मैं
रस्ते में उसी की ही सदा देख रहा हूँ

मन्नतें मांगू भी तो किस मुंह से मैं मांगू
हर मोड़ पे लाचार ख़ुदा देख रहा हूँ

***

Monday, May 12, 2025

कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में (ग़ज़ल)

कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में

इक सफ़र ही तो बस रवाँ है मुझ में

 

शोर बाहर का थमा तो समझ आया 

भीतर भी इक शहर है यहाँ मुझ में 

 

फिर आएगी बारिश, चली जाएगी 

बुझ न पाएगा वो धुआँ है मुझ में

 

ढूँढता रहा जिसे मैं यूं तमाम उम्र 

कहीं और नहीं वो यहाँ है मुझ में 


छोड़ दिया तूने जिसे पीछे कहीं 

वो लम्हा एक अब तक जवाँ है मुझ में 

 

जाना था मैंने जिसे अपना कभी

वो शख़्स भी अब लेकिन कहाँ है मुझ में 


Thursday, March 27, 2025

ग़ैर-मौजूदगी



अब बस ढोता हूँ तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी को 

एक बोझे की मानिंद—  

बोझा जिसे किसी ने एक हुक में पिरोकर  

मेरी चमड़ी के ठीक नीचे टाँक दिया हो।  

सांस दर सांस  

तुम्हारे कर्ज़ में डूबता जाता हूँ,  

हर कदम पर उठती है आहट

कहती है—  “तुम क्यों? मैं क्यों नहीं?”


मेरा आधा जिस्म चलता है यहाँ-वहाँ,  

ज़िंदा आदमियों, जानवरों और पेड़ों के बीच,  

और आधा दफ़न है तुम्हारी चुप्पी में।  

हर गुज़रता दिन मेरे कान में फुसफुसाता है,  

याद दिलाता है— तुम नहीं हो।  

मैं बुदबुदाता हूँ,  

माफ़ी मांगता हूँ  

अपने सीने में अब तक थड़-थड़ बजती धड़कन के लिए।


हर सपना तुम्हारी नींद में एक सेंध-सा लगता है,  

जैसे तुम्हारे आँखें मूँदते ही  

चुरा लाया था मैं तुम्हारा सारा जमा ख़ज़ाना,  

और अब उसी में से  

रोज़ निकाल कर एक-एक सिक्का 

चुका रहा हूँ दाम—  

सूरज का, सुबह का, सांस का।  

हर सुबह उधारी की,  

हर मुस्कान चोरी की।


तुम्हारा नाम उठाए,  

परछाई ओढ़े,  

बस खड़ा हूँ  

एक मुसाफ़िर की तरह,  

जो सफ़र में कहीं पीछे छूट गया है,  

कि जिसके पैरों में बंधी हैं  

ज़ंजीरें तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी की।


Monday, December 16, 2024

पुराने मोड़ से रस्ते नए निकल जाते हैं



पुराने मोड़ से रस्ते नए निकल जाते हैं
नए तजुर्बों से पुराने हल निकल जाते हैं


सच कहूँ तिरी बात से अब कोई गिला नहीं
ये तो आँसू हैं, बस यूं ही निकल जाते हैं


तमाम दुनियादारी में अब डूबते-उबरते
वक़्त कट जाता है दिन निकल जाते हैं


तेरे हाथ भी जोड़ने से कुछ न हुआ होता
जाने वाले तो हर बात पे निकल जाते हैं


इतना भी गुमान ना कर अपनी ख़ुदाई का
तमाम ख़ुदा आख़िर में पत्थर निकल जाते हैं 

***

Friday, January 26, 2024

यूं सफ़र-ए-हयात का अंजाम लिख दिया

 



यूं सफ़र-ए-हयात का अंजाम लिख दिया 
हर ख़ुशी हर ग़म पे तेरा नाम लिख दिया 


ख़ुद को ख़त लिखते रहे तेरे नाम के 
आख़िरी अलविदा भी कल शाम लिख दिया 


रात भर सोचा किए न सोचेंगे उन्हें  
सुबह सुबह उन्हीं को सलाम लिख दिया 


हिक़ारत के अल्फ़ाज़ निचोड़कर मैंने
उस सियाही से नया कलाम लिख दिया 


गुनाह जिस जिस के अपने सिर लिये 
सलीब पे उस उस ने मेरा नाम लिख दिया 

***

Wednesday, August 5, 2020

जो उट्ठेंगे तेरी महफिल से, कहाँ जाएंगे




जो उट्ठेंगे तेरी महफिल से, कहाँ जाएंगे
जहां गुमशुदा हर शख़्स गया, वहाँ जाएंगे

काँटों और पत्थरों से कैसे रोक पाओगे
हम जब लेके अपनी हथेली पे जां जाएंगे

क्या छुपा सकेंगे कभी मेरे गुनाह मुझसे
ये आईने कब इतने मेहरबां जाएंगे

नफ़रतों के किस्सों से अब गिला क्या रक्खें
जब मोहब्बतों के किस्से यूं ख़ामख़ा जाएंगे

वो फिर पूछेगा हिफ़ाज़त-ए-ख़ुदा को जाओगे
ख़ुदा के वास्ते अबकी मत कहना हाँ जाएंगे

Tuesday, May 26, 2020

तस्वीरें पलटना भी बहाना हो गया



तस्वीरें पलटना भी बहाना हो गया
आईने में चेहरा अब पुराना हो गया

टूटे ख़्वाबों को दफ़्न कर दिया जब से
ज़िंदगी का सफ़र भी सुहाना हो गया

कब तलक राह देखे कोई अच्छे दिनों की
छोड़ो कि अब मंज़र वो पुराना हो गया

भूखे पेटों के लिए सिर्फ़ गर्व की ही नेमतें
हाकिम का रोज़ का फ़साना हो गया

मैंने तो जो कहा बस सच ही कहा था
हरेक उठती उंगली का निशाना हो गया

Tuesday, February 18, 2020

एक शाम का गुमनाम होना अभी बाक़ी था




एक शाम का गुमनाम होना अभी बाक़ी था
एक मोहब्बत का अंजाम होना अभी बाक़ी था

बड़े एहतिमाम से हर शाम जलाते थे चराग़
उम्मीदों का नाक़ाम होना अभी बाक़ी था

वो लेते ही न थे हमारे तजरबों से सबक़
तनहाइयों का हर शाम होना अभी बाक़ी था

ढूँढता फिरता था म'आनी अपने वजूद के
तेरा नाम हमनाम होना अभी बाक़ी था

मेरे अफसानों में निशां ढूंढेगा अपने कोई
आख़िरी ये भी एक काम होना अभी बाक़ी था

Thursday, September 12, 2019

ख़ुश-आमदीद आब-ओ-हवा बताते रहे



वो ख़ुश-आमदीद आब-ओ-हवा बताते रहे
सनक को भी बादशाह की अदा बताते रहे

अंतिम तिनके के भी हाथ से छूटने तलक
वो ख़ुद को हमारा ना-ख़ुदा बताते रहे

वो जानते थे हमारे जुनून-ए-इश्क़ की इंतेहा
बस आँखों में आखें डाल बेवफ़ा बताते रहे


लफ़्ज़ों का हमारे यूं गला घोंटने के बाद
आंखों की हलचल को गुस्ताख़ सदा बताते रहे
  
हमारे अंधे हो जाने के बहुत पहले ही वो 
रात को दिन औ' शाम को सुबहा बताते रहे
  
देखा था उस शख़्स को कभी पत्थर की शक़्ल में
बताने वाले हालांकि उसे ख़ुदा बताते रहे


Thursday, January 17, 2019

बग़ावत का ग़ुरूर किरदार की नादानी है



बग़ावत का ग़ुरूर किरदार की नादानी है
ये उसकी नहीं किस्सागो की कहानी है

कोई तो मसीहा गुज़रा होगा ज़रूर इस रस्ते
लहू की बू ये फ़ज़ा में जानी पहचानी है

तुम जिसे कहते हो पानी पे खींची लकीर
मेरी फरियाद पे हुए इंसाफ की निशानी है

वो पूछते हैं कि बस्ती लुटी तो लुटी कैसे
चौकीदार से पूछो जिसकी निगहबानी है

हरेक दास्ताँ भीतर उम्मीद समेटे बैठी है
ज़िन्दगी क्या फ़क़त उम्मीद की कहानी है

Friday, January 11, 2019

जाम हो, शराब हो, पर ख़ुमारी न हो




जाम हो, शराब हो, पर ख़ुमारी न हो
ज़िक्र हो ज़ख़्मों का, तिरी शुमारी न हो

मिट्टी के भाव न बिके ज़िंदगी तिरा खज़ाना
अधूरी हसरतों का गर कारोबारी न हो

बड़ी मासूमियत से तिरे दर पे आए हैं हाकिम
अब ऐलान-ए-नाइंसाफी में इंतिज़ारी न हो

थक गई है अवाम भी वोटों की डुगडुगी से
 
ऐ ख़ुदा कभी तो तमाशे में मदारी न हो

वो कभी न बनाएंगे तुम्हें रहनुमा शहर का
जो मंदिर-मस्जिद करने की बीमारी न हो

Tuesday, January 8, 2019

वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता


वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता
किसी साये का अपना कोई बाक़ी निशां नहीं रहता

यूं तो वो क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद है
जिस भी गली मैं देखूँ, केवल वहाँ नहीं रहता

मुद्दतें गुज़रीं, अब किससे मिलने आए हो
वो शख्स कोई और था, अब यहाँ नहीं रहता

तलाशते अपनी ज़मीन को यां पहुंच तो गए लेकिन
मालूम न था शहर में अब आसमां नहीं रहता

कोई राज़ तब जाकर मुक़म्मल होता है जब
उसका दुनिया में अंतिम भी राज़दां नही रहता

जो तन्हा छोड़ दो तो वो भी खंडहर हो जाएगा
अपने बाशिंद से जुदा तो कोई मकां नहीं रहता

Tuesday, December 18, 2018

अक्सर आ जाता है, माज़ी से हाल में




अक्सर आ जाता है, माज़ी से हाल में
गुनाह रहता नहीं ठहरकर, क़ैद-ए-ख़याल में

पूछता है सवाल, लहज़े में जवाब के
कैसे दूँ जवाब, लहज़ा-ए-सवाल में

थोड़ा और इंतज़ार, कि तस्वीर बदल जाये
काटी है जिंदगी बस इसी बवाल में

डूबा था उस वक़्त, इंतक़ाम के सुकून में
डूबा हूँ इस वक़्त, उसी के मलाल में


सब रंग मिल कर बदरंग हो गए
फिर आई डेमोक्रेसी, फटे हाल में

Monday, March 27, 2017

आठ छोटी बेचैन अकविताएं




दिलों की लकड़ी 
शायद
गीली हो चुकी
धुआँ तो खूब ही करती है
पर
धधकती नहीं अब

***

एक टुकड़ा बादल
तलाशती हैं आँखें
गुज़रते घने बादलों में
आज भी

***

यूं तो
रोज़ ही मरते हैं
हम सभी
एक बित्ता
अपने भीतर ही
और
उस अंश के निमित्त
दो बूंद नमकीन सी
टपका भी देते हैं
और बढ़ जाती है आगे 
ज़िंदगी

***

हर आदमी 
अपने भीतर 
एक 
अनुकूल संसार 
बनाए रखता है
प्रत्यक्ष संसार से 
किनारा कर 
उसमें 
शरण पा सकने के लिए

***

ये 
हमारे आकाश का नहीं
खिडकियों का भेद है
और
हमारा 
ये समझना अभी बाकी है

***

कोई अभिमन्यु
फँस रहा है
किसी 
चक्रव्यूह में 
मेरे भीतर
शायद

***

ज़िंदगी में कई बार 
प्रश्न नहीं 
बल्कि 
उत्तर
सामने आकर 
खड़े हो जाते हैं
वे उत्तर 
जिनके प्रश्नों से 
हम मुंह चुराने को 
अभिशप्त हैं

***

कविता मर गयी
नदियाँ सूख गयीं
मानस 
खड़ा देख रहा
धर्मों के आडम्बर की 
ओट से


Saturday, February 21, 2015

लकीरें




सीधी सही पर 
बड़ी पेचीदा होती हैं 
कभी कच्ची 
तो कभी 
गाढ़ी होती हैं 
लकीरें 

वो 
जो कच्ची होती हैं 
खिंचती हैं 
काली सी स्लेट पर 
और फिर जब 
स्लेट को छोड़ दो 
रख दो कहीं 
बस यूं ही ख़ुद-ब-ख़ुद 
धुंधला जाती हैं 
लकीरें 

कुछ लकीरें 
जब उकरतीं हैं 
रेत के अखाड़े  में 
और बनाती हैं पाला 
कबड्डी का 
हँसते हैं सभी 
खिलखिलाते हैं 
जब टूटती हैं साँसें 
और बद जाता है दाम 
फिर जब 
चलती है हवा अखाड़े में 
तो मिट जाते हैं 
पैरों, पंजों और एड़ियों के 
निशाँ 
और मिट जाती हैं 
लकीरें भी 

लेकिन एक बार हमने 
बनायी थी इक लकीर 
कबड्डी की नहीं 
सरहदों की लकीर 
उस रोज़ भी 
टूटी थीं साँसें 
लेकिन इस बार 
बहुत सा ख़ून भी 
उमड़ आया था उसमें 
जिसने 
कर दिया था गाढ़ा 
उन लकीरों को 

कुछ सरफ़िरों ने सोचा भी 
कि चलो लाते हैं 
कोई पोछा बड़ा सा 
और मिटा देते हैं 
इन लकीरों को 
पर 
लाल हो गया पोछा भी 
जब पड़ा वो 
उस लकीर पे 
तब 
और भी ताज़ी हो गयीं 
लकीरें 
और भी गाढ़ी हो गयीं 
लकीरें 

Friday, February 20, 2015

मेरे सामने वाली दिल्ली में




मेरे सामने वाली दिल्ली में 
मेरे देश का PM रहता है 
अफ़सोस ये है कि वो हरदम 
बस गुजरात गुजरात रटता है 

MRS Srisena भी चली गयी 
बराक भी आकर चला गया 
जब सूट की controversy बढ़ी  
सारा उद्योग जगत भी उमड़ गया 
अब आया जा के समझ मेरी 
जो दिखता है वो बिकता है 

तीस्ता के पीछे पुलिस पड़ी 
बिहार में मांझी की crisis बढ़ी 
चर्च जलते रहे पूरी दिल्ली में 
पर इनके मुंह से ना पट्टी हटी 
अब छप्पन इंच का सीना भी 
बस कोरा #Jumla लगता है 

Tuesday, February 17, 2015

जहांआरा




खुद की ही इमारत में 
वो क़ैद होकर रह गया
झाँकता अब किस तरफ
बस कसमसाकर रह गया

तराशा था उसने कभी
मुहब्बतों से इक निशां
आखिरी लम्हों में वो खुद
नफ़रतों से ढह गया

पिंजरे में है उसके लेकिन
खिड़की भी एक छोटी सी
खुद की क़बर से खुद की क़बर को
देखता वो रह गया

कभी देखता बेड़ियों को
कभी जहांआरा को
मेरी बेटी मेरी बेटी
कहता ही वो रह गया
ज़िल्लतें सब सह गया

Saturday, February 7, 2015

लो फिर आया केजरीवाला


दिल का हाल कहे दिलवाला 
सीधी सी बात न मिर्च मसाला 
कह के रहेगा कहने वाला 
दिल का हाल कहे दिलवाला 

दोनों हाथों से सब्सिडी दे दी 
ऐसी तैसी सारे बजट की 
खाली होने लगा सारा खज़ाना 
भागना पड़ गया कर के बहाना 
भाग के जब लेकिन वापस आया 
कांग्रेस ने अब की ठेंगा दिखाया 
डेमोक्रेसी का सर्कस है ये 
लो फिर आया केजरीवाला 
कह के रहेगा कहने वाला 
दिल का हाल कहे दिलवाला 

Friday, February 6, 2015

दिल का हाल कहे दिलवाला



दिल का हाल कहे दिलवाला
सीधी सी बात न मिर्च मसाला
कह के रहेगा कहने वाला
दिल का हाल कहे दिलवाला

तेरे को लेने मैं एयरपोर्ट आया
चाय भी अपने हाथों बनाया
लाखों रुपैये के सूट में आया
रेडियो पे मन की बात कराया
वापस जा के भूल गया तू
न्युक्लीअर डील को भूल गया तू
गांधी की मुझको दे दी दुहाई
बराक ये तूने क्या कर डाला
कह के रहेगा कहने वाला
दिल का हाल कहे दिलवाला

डेमोक्रेसी की वाट लग गयी
जनता की सब खाट लग गयी
आधा ले के गया अडानी
बाक़ी आधा गया अम्बानी
अब सुनो ये गड़बड़ झाला
बाँध के पट्टी मुंह पर ताला
वापस घूम के आएगा सब
थोड़ा सा चेक में बाक़ी हवाला
कह के रहेगा कहने वाला
दिल की हाल कहे दिलवाला