Thursday, April 16, 2026
जब भी जज़्बात के इज़हार हुआ करते थे
Friday, June 20, 2025
अब रोज़ तमाशा मैं नया देख रहा हूँ
Monday, May 12, 2025
कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में (ग़ज़ल)
कोई मंज़िल न निशाँ है मुझ में
इक सफ़र ही तो बस रवाँ है मुझ में
शोर बाहर का थमा तो समझ आया
भीतर भी इक शहर है यहाँ मुझ में
फिर आएगी बारिश, चली जाएगी
बुझ न पाएगा वो धुआँ है मुझ में
ढूँढता रहा जिसे मैं यूं तमाम उम्र
कहीं और नहीं वो यहाँ है मुझ में
छोड़ दिया तूने जिसे पीछे कहीं
वो लम्हा एक अब तक जवाँ है मुझ में
जाना था मैंने जिसे अपना कभी
वो शख़्स भी अब लेकिन कहाँ है मुझ में
Thursday, March 27, 2025
ग़ैर-मौजूदगी
अब बस ढोता हूँ तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी को
एक बोझे की मानिंद—
बोझा जिसे किसी ने एक हुक में पिरोकर
मेरी चमड़ी के ठीक नीचे टाँक दिया हो।
सांस दर सांस
तुम्हारे कर्ज़ में डूबता जाता हूँ,
हर कदम पर उठती है आहट
कहती है— “तुम क्यों? मैं क्यों नहीं?”
मेरा आधा जिस्म चलता है यहाँ-वहाँ,
ज़िंदा आदमियों, जानवरों और पेड़ों के बीच,
और आधा दफ़न है तुम्हारी चुप्पी में।
हर गुज़रता दिन मेरे कान में फुसफुसाता है,
याद दिलाता है— तुम नहीं हो।
मैं बुदबुदाता हूँ,
माफ़ी मांगता हूँ
अपने सीने में अब तक थड़-थड़ बजती धड़कन के लिए।
हर सपना तुम्हारी नींद में एक सेंध-सा लगता है,
जैसे तुम्हारे आँखें मूँदते ही
चुरा लाया था मैं तुम्हारा सारा जमा ख़ज़ाना,
और अब उसी में से
रोज़ निकाल कर एक-एक सिक्का
चुका रहा हूँ दाम—
सूरज का, सुबह का, सांस का।
हर सुबह उधारी की,
हर मुस्कान चोरी की।
तुम्हारा नाम उठाए,
परछाई ओढ़े,
बस खड़ा हूँ
एक मुसाफ़िर की तरह,
जो सफ़र में कहीं पीछे छूट गया है,
कि जिसके पैरों में बंधी हैं
ज़ंजीरें तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी की।
Monday, December 16, 2024
पुराने मोड़ से रस्ते नए निकल जाते हैं
Friday, January 26, 2024
यूं सफ़र-ए-हयात का अंजाम लिख दिया
Wednesday, August 5, 2020
जो उट्ठेंगे तेरी महफिल से, कहाँ जाएंगे
जहां गुमशुदा हर शख़्स गया, वहाँ जाएंगे
हम जब लेके अपनी हथेली पे जां जाएंगे
क्या छुपा सकेंगे कभी मेरे गुनाह मुझसे
ये आईने कब इतने मेहरबां जाएंगे
नफ़रतों के किस्सों से अब गिला क्या रक्खें
जब मोहब्बतों के किस्से यूं ख़ामख़ा जाएंगे
वो फिर पूछेगा हिफ़ाज़त-ए-ख़ुदा को जाओगे
ख़ुदा के वास्ते अबकी मत कहना हाँ जाएंगे
Tuesday, May 26, 2020
तस्वीरें पलटना भी बहाना हो गया
आईने में चेहरा अब पुराना हो गया
टूटे ख़्वाबों को दफ़्न कर दिया जब से
ज़िंदगी का सफ़र भी सुहाना हो गया
कब तलक राह देखे कोई अच्छे दिनों की
छोड़ो कि अब मंज़र वो पुराना हो गया
भूखे पेटों के लिए सिर्फ़ गर्व की ही नेमतें
हाकिम का रोज़ का फ़साना हो गया
मैंने तो जो कहा बस सच ही कहा था
हरेक उठती उंगली का निशाना हो गया
Tuesday, February 18, 2020
एक शाम का गुमनाम होना अभी बाक़ी था
एक मोहब्बत का अंजाम होना अभी बाक़ी था
बड़े एहतिमाम से हर शाम जलाते थे चराग़
उम्मीदों का नाक़ाम होना अभी बाक़ी था
वो लेते ही न थे हमारे तजरबों से सबक़
तनहाइयों का हर शाम होना अभी बाक़ी था
ढूँढता फिरता था म'आनी अपने वजूद के
तेरा नाम हमनाम होना अभी बाक़ी था
मेरे अफसानों में निशां ढूंढेगा अपने कोई
आख़िरी ये भी एक काम होना अभी बाक़ी था
Thursday, September 12, 2019
ख़ुश-आमदीद आब-ओ-हवा बताते रहे
सनक को भी बादशाह की अदा बताते रहे
अंतिम तिनके के भी हाथ से छूटने तलक
वो ख़ुद को हमारा ना-ख़ुदा बताते रहे
वो जानते थे हमारे जुनून-ए-इश्क़ की इंतेहा
बस आँखों में आखें डाल बेवफ़ा बताते रहे
लफ़्ज़ों का हमारे यूं गला घोंटने के बाद
हमारे अंधे हो जाने के बहुत पहले ही वो
रात को दिन औ' शाम को सुबहा बताते रहे
देखा था उस शख़्स को कभी पत्थर की शक़्ल में
बताने वाले हालांकि उसे ख़ुदा बताते रहे
Thursday, January 17, 2019
बग़ावत का ग़ुरूर किरदार की नादानी है
ये उसकी नहीं किस्सागो की कहानी है
कोई तो मसीहा गुज़रा होगा ज़रूर इस रस्ते
लहू की बू ये फ़ज़ा में जानी पहचानी है
तुम जिसे कहते हो पानी पे खींची लकीर
मेरी फरियाद पे हुए इंसाफ की निशानी है
वो पूछते हैं कि बस्ती लुटी तो लुटी कैसे
हरेक दास्ताँ भीतर उम्मीद समेटे बैठी है
ज़िन्दगी क्या फ़क़त उम्मीद की कहानी है
Friday, January 11, 2019
जाम हो, शराब हो, पर ख़ुमारी न हो
ज़िक्र हो ज़ख़्मों का, तिरी शुमारी न हो
मिट्टी के भाव न बिके ज़िंदगी तिरा खज़ाना
अधूरी हसरतों का गर कारोबारी न हो
बड़ी मासूमियत से तिरे दर पे आए हैं हाकिम
अब ऐलान-ए-नाइंसाफी में इंतिज़ारी न हो
थक गई है अवाम भी वोटों की डुगडुगी से
ऐ ख़ुदा कभी तो तमाशे में मदारी न हो
जो मंदिर-मस्जिद करने की बीमारी न हो
Tuesday, January 8, 2019
वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता
वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता
किसी साये का अपना कोई बाक़ी निशां नहीं रहता
यूं तो वो क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद है
जिस भी गली मैं देखूँ, केवल वहाँ नहीं रहता
मुद्दतें गुज़रीं, अब किससे मिलने आए हो
वो शख्स कोई और था, अब यहाँ नहीं रहता
तलाशते अपनी ज़मीन को यां पहुंच तो गए लेकिन
मालूम न था शहर में अब आसमां नहीं रहता
कोई राज़ तब जाकर मुक़म्मल होता है जब
उसका दुनिया में अंतिम भी राज़दां नही रहता
जो तन्हा छोड़ दो तो वो भी खंडहर हो जाएगा
अपने बाशिंद से जुदा तो कोई मकां नहीं रहता
Tuesday, December 18, 2018
अक्सर आ जाता है, माज़ी से हाल में
अक्सर आ जाता है, माज़ी से हाल में
गुनाह रहता नहीं ठहरकर, क़ैद-ए-ख़याल में
पूछता है सवाल, लहज़े में जवाब के
कैसे दूँ जवाब, लहज़ा-ए-सवाल में
थोड़ा और इंतज़ार, कि तस्वीर बदल जाये
काटी है जिंदगी बस इसी बवाल में
डूबा था उस वक़्त, इंतक़ाम के सुकून में
डूबा हूँ इस वक़्त, उसी के मलाल में
सब रंग मिल कर बदरंग हो गए
फिर आई डेमोक्रेसी, फटे हाल में
















