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Tuesday, January 1, 2019

Books read in 2018


Books read in 2018 with my ratings for them are as follows:


1 The Post Office Rabindranath Tagore 2
2 It Stephen King 1
3 Mirza Ghalib Vishwanath 1
4 India Since Independance Bipan Chandra 6
5 Geetanjali (Hindi Translation) Rabindranath Tagore 1
6 The Theory Of Everything Stephen Hawking 6
7 Nyay Ka Ganit Arundhati Roy 6
8 Dyodhi Gulzar 6
9 Sanskritik Patrakarita:sakshatkar Par Aadharit Sannate Meinchamakti Awazen Ajit Rai 6
10 The Small Town Sea Anees Salim 6
11 Andha Yug Dharmveer Bharti 6
12 Childhood Days Satyajeet Ray 4
13 Duniya Jise Kahte Hain Nida Fazli 5
14 Bahujan Sahitya Ki Prastaavana Pramod Ranjan, Ivon Koska 5
15 Aaj ke Prasidh Shayar - Ahmad Faraz Ahmad Faraz 4
16 And Then One Day: A Memoir Naseeruddin Shah 6
17 Amrita Pritam - Meri Priya Kahaniyaan Amrita Pritam 3
18 Kamayani Mool Path Evam Teeka Vishwambhar Manav 3
19 Gyarahvin-A ke Ladke Gaurav Solanki 4
20 Baniya Bahu Mahashweta Devi 6
21 Sapiens: A Brief History of Humankind Yuval Noah Harari 6
22 Daal Par Khili Titli Ashok Chakradhar 5
23 Rashmirathi Ramdhari Singh Dinkar 6
24 Geeta Sanchayan Veerendra Sharma 1
25 Dushkar Mahashweta Devi 5
26 Homo Deus: A Brief History of Tomorrow Yuval Noah Harari 6
27 Urvashi Ramdhari Singh Dinkar 4
28 Sampradayik Rajniti Tathya Evam Mithak Ram Puniyani 1
29 Writing Into The Dark Dean Wesley Smith 5
30 Swami Vivekananda - The Living Vedanta Chaturvedi Badrinath 5
31 The Ministry Of Utmost Happiness Arundhati Roy 6
32 The Diary Of A Young Girl Anne Frank 6
33 An Ordinary Person’s Guide To Empire Arundhati Roy 6
34 Shaharyar Suno Shaharyar 4
35 Achut Kaun Aur Kaise? B. R. Ambedkar 6
36 Animal Farm George Orwell 6
37 Obesity Code Jason Fung 6
38 Dongri Se Dubai Tak S. Hussain Zaidi 6
39 Gaban Munshi Premchand 5
40 Einstein Mohan Maharishi 5


Rating Criteria


1 Left Midway
2 Poor
3 Average
4 Partly Good OR Language
5 Good
6 Must Read

Happy New Year!!

Sunday, December 31, 2017

Books read in 2017

Books read in 2017 with ratings. Books read 40. 2018's target is 56 books.


Vaidik Sanskriti
Govind Chandra Pandey
1
This is Not the End of the Book
Umberto Eco
5
An Era of Darkness
Shashi Tharoor
5
Rashmirathi
Ramdhari Singh Dinkar
5
Nari Tum Ananya Ho
Jaishree Goswami Mahant
4
Aahat Desh
Arundhati Roy
5
The Complete Long Stories of Sherlock Holmes
Sir Arthur Conan Doyle
5
The Mistress of Honour
Bhaavna Arora
2
Tamanna Tum Ab Kahan Ho
Nidheesh Tyagi
4
Aadi aur Ant
S. C. Shrivastava
1
India's Struggle for Independence
Bipan Chandra
5
Midnight's Children
Salman Rushdie
5
Durabhi Sandhi
Manu Sharma
5
The Name of the Rose
Umberto Eco
1
A Brief History of Time
Stephen Hawking
5
1962 The War That Wasn't
Shiv Kunal Verma
1
Teen Sau Ramayan
A. K. Ramanujan
5
Satanic Verses
Salman Rushdie
4
1984
George Orwell
5
Kamayani
Jaishankar Prasad
1
Aksharon Ke Saaye
Amrita Preetam
5
Theek Tumhare Peechhe
Manav Kaul
5
Mahishasur ek Jannayak
Pramod Ranjan
4
Gujarat Files
Rana Ayyub
5
Maut ka Rahasya
Param Anand
4
Andha Yug
Dharmveer Bharti
5
Unlucky 13
James Patterson
2
Raag Darbari
Shrilal Shukl
4
Raat Pashmine Ki
Gulzar
5
To Kill A Mockingbird
Harper Lee
5
The Diary Of A Young Girl
Anne Frank
5
Unity of Life and Other Essays
Chaturvedi Badrinath
5
Circle of Five
Jan Raymond
3
Baap Re Baap
Pradeep Chaubey
2
Abutar Kabutar
Uday Prakah
5
Naye Yug Mein Shatru
Mangalesh Dabral
4
Maila Aanchal
Fanishwarnath Renu
5
Laugh with Laxman
RK Laxman
5
Sahitya Ke Naye Prashn
Prabhakar Shrotriya
3
Mamooli Cheezon Ka Devta
Arundhati Roy
5

Sunday, January 1, 2017

Books read in 2016

Last year I read 43 books. Below are those books. Starred are recommended ones. The target for 2017 is of 60 books. Lets see how the year goes. Here goes the list:

1
Ba-Bye
Krishn Bihari
2
Madhushala
Bachchan
*
3
Mere Manch Ki Sargam
Piyush Mishra
4
Gunahon Ka Devta
Dharmveer Bharti
5
Kitne Pakistan
Kamaleshwar
*
6
Kathghare Mein Loktantra
Arundhati Roy
*
7
Kai Chand The Sar-e-Aasman
Shamsurrahman Farooqi
8
Ek Sahityik Ke Prempatra
Pushpa Bharti
9
Death Under the Deodars
Ruskin Bond
10
Relativity: The Special and the General Theory
Albert Einstien
11
Loser Kahin Ka
Pankan Dubey
12
The Glass Castle
Jeanette Walls
*
13
Metamorphosis
Franz Kafka
14
Khushwantnama (Mere Jeevan ke Sabak)
Khushwant Singh
15
Carol
Patricia Highsmith
16
Hum Tum aur who Truck
Mo Yan
17
Immortals of Meluha
Amish Tripathi
*
18
Secret of the Nagas
Amish Tripathi
19
The Oath of Vayuputras
Amish Tripathi
20
Narad Ki Bhavishyawani
Manu Sharma
21
The Home and the World
Tagore
*
22
Wings of Fire
APJ Kalam
23
Mrs Funnybones
Twinkle Khanna
24
The Rozabal Line
Ashwin Sanghi
25
2014: The Election that changes India
Rajdeep Sardesai
*
26
Cobalt Blue
Sachin Kundalkar
27
This Unquiet Land
Barkha Dutt
*
28
Forbidden Desires
Madhuri Banerjee
29
Breakthrough
Michael C. Grumley
*
30
Khali Naam Gulab Ka
Umberto Eco
31
Unity of Life and other essays
Tulsi Badrinath
32
Matchbox
Ashapurna Debi
33
Munnu: A Boy from Kashmir
Malik Sajad
*
34
The Brothers Bihari
Sankarshan Thakur
*
35
The Hour Before Dawn
Ajaz Ashraf
*
36
The Tunnel of Time
RK Laxman
37
Schitzophrenia
Diwakar Chaudhri
38
Station Eleven
Emily St. John Mandel
*
39
The Mystery of Munroe Island
Satyajit Ray
*
40
Ghaas Ka Pul
Ravindra Verma
41
NYPD Red 3
James Patterson
42
Conversation with Wahida Rehman
Nasreen Munni Kabir
*
43
Aadha Gaon
Rahi Masoom Raza



Saturday, December 24, 2016

किताबें जनवरी की

सितंबर में 'The Home and the World' के बाद दफ़्तर के काम में दिन कुछ यूं मसरूफ़ हुए कि पढ़ने का वक़्त निकालना मुश्किल होने लगा. फिर इधर फ़ैमिली को भी सिंगापुर शिफ्ट करने की जुगत थी जिसने लम्हों की खुरचन भी समेट डाली. दो महीने बाद दिसंबर में चार किताबों का लक्ष्य अंततः रखा:
1. बा-बॉय (कृष्ण बिहारी)
2. मधुशाला (हरिवंश राय 'बच्चन')
3. Death under the Deodars (रस्किन बॉन्ड)
4. कठघरे में लोकतंत्र (अरुंधति रॉय)

सभी किताबें अच्छी लगीं. अगले महीने यानी जनवरी के लिए पांच किताबें चुनी हैं:
1. वैदिक संस्कृति (गोविन्द चंद्र पांडेय )
2. This is not the end of the book (Umberto Eco)
3. An Era of Darkness: The British Empire in India (Shashi Tharoor)
4. रश्मिरथि (रामधारी सिंह 'दिनकर')
5. नारी तुम अनन्या हो (जयश्री गोस्वामी महंत)

Sunday, September 11, 2016

द होम एंड द वर्ल्ड


सितंबर महीने की पहली किताब थी - रबिन्द्रनाथ टैगोर की लिखी 'द होम एंड द वर्ल्ड'। यूं तो टैगोर का नाम सभी ने सुना है। गीतांजली के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था। उनका लिखा गीत 'जन गण मन' हमारा राष्ट्रगान बना और उन्हीं का लिखा एक और गीत 'आमार शोनार बांग्ला' पाकिस्तान के विभाजन के बाद बने नए देश बांग्लादेश का भी राष्ट्रगान बना। शायद टैगोर एकमात्र ऐसे कवि होंगे जिनके लिखे गीत एक नहीं बल्कि दो देशों के राष्ट्रगान बने। उन्होनें अपने लिखे गीतों को संगीत-बद्ध किया और इस संगीत को हम सभी रबिन्द्र-संगीत के नाम से जानते हैं। उन्होनें कोलकाता से 160 किलोमीटर पर एक छोटा-सा क़स्बा बसाया - 'शांति निकेतन' जो आज 'विश्व-भारती विश्वविद्यालय' के रूप में मौजूद है। मशहूर अर्थशास्त्री 'अमर्त्य सेन' शांति निकेतन के एक स्कूल से पढे हैं और आगे चलकर विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। 

टैगोर के बारे में मैंने सबसे पहले अनन्या बाजपेयी की लिखी Righteous Republic में पढ़ा था। अमूमन हमारे महापुरुषों के बारे में जो किताबें हमारे इर्द-गिर्द पढ़ने को मिलतीं हैं, उनके जीवन की घटनाओं तक सीमित रह जातीं हैं। अनन्या बाजपेयी की किताब इस मामले में अलग थी कि इसमें इन विराट-व्यक्तित्वों की विचार-प्रणाली की पड़ताल को आधार बनाया गया था। अंबेडकर जैसे थे वैसे वे क्यों थे? गांधी, नेहरू और टैगोर जैसे थे वैसे क्यों थे? महीनों बाद एक सफर के दौरान रेल्वे-प्लैटफ़ार्म के एक स्टॉल से 'टैगोर की प्रसिद्ध कहानियाँ' नाम की एक किताब खरीदी। उनकी लिखावट का मैं पहली ही बार में कायल हो गया। एक बार तो बंगाली सीखने का भी ख़याल आया टैगोर को ओरिजिनल में पढ़ने के लिए। लेकिन फिर मैं ट्रांसलेटेड वर्ज़न्स पर सेटल हो गया। 

टैगोर कभी भी राष्ट्रवादी नहीं थे। उनके हमेशा गांधी से वैचारिक मतभेद रहे। 'द होम एंड द वर्ल्ड' उपन्यास की जो पृष्ठभूमि है वो तात्कालीन बंगाल की है जब स्वदेसी आंदोलन चल रहा था। इस किताब को पढ़ते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसमें जो माहौल दिखाया गया है ये उपन्यास लिखे जाते समय वर्तमान था। इतिहास की सरकारी किताबों में इन आंदोलनों का जो पहलू मिलता है वह ये कि लोग समूहों में इकट्ठे हो कर अपनी विदेशी-वस्तुओं को आग के हवाले कर दिया करते थे। इन किताबों में उन घटनाओं को जिस भी तरह महिमामंडन किया जाये लेकिन इस उपन्यास में उस राजनीति का माइक्रो-लेवल पर एक्ज़ीक्यूशन दिखाया है। राष्ट्रवाद के उन्माद में तमाम छोटे-छोटे दल बन गए थे जो लोगों से उनका सामान छीन-छीन कर जला दिया करते थे। दरअसल ये कुछ उसी तरह था जैसे आज के समय में तमाम राजनीतिक दल बंद का आयोजन करते हैं। बंद की घोषणा राजनीतिक पार्टियां करतीं हैं और फिर उन्हीं के समर्थक सड़कों पर उतर कर, बाज़ारों में घूम-घूम कर तमाम दुकानों को बंद करवाते हैं। अगर आप एक दुकानदार हैं तो आप उस बंद आयोजन के समय अपनी दुकान बंद न करने का जोखिम नहीं ले सकते भले ही आप बंद आयोजन करवाने वाले दल की विचारधारा से सहमत हों या ना हों। 'द होम एंड द वर्ल्ड' हमारे दिमागों में एक छवि गढ़ चुके उस आंदोलन का एक दूसरा पहलू पेश करती है और बहुत हद तक कामयाब भी होती है। देश की वर्तमान राजनीति में भी हम अपने ही समाज की इस प्रकृति को पहचान सकते हैं। गायों की सेवा करना या किसी भी प्राणी की सेवा करना, उनका ध्यान रखना, उनको खाने को देना ये सब अच्छा है लेकिन गौरक्षा के नाम पर जब उन्माद होता है तो अखलाक की हत्या हो जाती है। हमारी नीति-सूक्तियों में एक बात कही गई है - 'अति सर्वत्र वर्जयते' (किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं होती)। टैगोर राष्ट्रवाद के खिलाफ थे। क्योंकि उनके अनुसार राष्ट्रवाद नई पीढ़ी की सोच को एक collective में, एक समूह में बदल दे रहा था जिसमें सबसे पहले व्यक्ति विशेष की सोच पर लगाम लगाई जाती है और collective सोच से भिन्न नज़रिया रखने पर आपको गद्दार करार दिया जाता है। ये collective सोच बढ़ते-बढ़ते अपनी सीमाओं का इस तरह विस्तार करती है कि उसी collective में मौजूद individuals की या इकाइयों की सीमाओं के भीतर अतिक्रमण हो जाता है। तब एक समय आता है कि कलेक्टिव पवित्र बन जाता है, हर बुराई से ऊपर उठ जाता है, और इस तरह किसी भी तरह की आलोचना से भी। उस वक़्त collective कुछ भी कर सकता है। हमारे समय में भी इस बात को कई राजनीतिक दल समझ रहे हैं और अपनी राजनीतिक अभिलाषाओं को धर्म, राष्ट्रवाद और गाय के लबादे में ओढ़ के एक collective बनाने की तैयारी कर रहे हैं। गणतन्त्र की इकाई एक नागरिक होता है। उस इकाई को खत्म कर समर्थकों का एक हुजूम, एक collective तैयार किया जा रहा है। नेता चाहे जो करे नागरिक अब कभी फेसबुक पर, कभी ट्विटर पर, कभी किसी आर्टिकल के कमेन्ट सेक्शन में अपने नेता के समर्थन में नारे लगाता मिल जाता है। दरअसल नागरिक को अब नागरिक रहने ही नहीं दिया जा रहा है। उसे समर्थक बनाना ही उद्देश्य है। और जब तक आप collective के दड़बे में बैठे भेड़-बकरियों की तरह नहीं हो जाते ये प्रक्रिया जारी रहेगी। कभी धर्म का एक दड़बा होगा जिसमें एक मस्जिद गिरा दी जाएगी और देश की भेड़-बकरियाँ अपनी ही संस्कृति के तार-तार होने का जश्न मनाएंगी। कभी एक जाति का दड़बा होगा जिसमें कोई वेमुला अपना वजूद रस्सी पर टांग के चला जाये और भेड़-बकरियाँ इस बात पर नारेबाजी करें कि वो दलित था कि नहीं। कभी कोई पांसरे गोली खाता है, कभी कोई अखलाक मरता है। टैगोर का पक्ष ये था कि भारत की समस्याओं का राजनीतिक समाधान नहीं है। दरअसल मुद्दा सरकार है ही नहीं मुद्दा समाज है। हमें निरक्षरता, अज्ञानता, जातिवाद, सांप्रदायिकता, दलित उत्पीड़न, नारी उत्पीड़न जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए ना कि इसे सरकार बदलने में बर्बाद करनी चाहिए। देश की पहचान उसकी सीमाओं से नहीं उसके लोगों से होती है। अगर लोग अज्ञानता में जीने को अभिशप्त हैं तो किसकी सरकार है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो अंग्रेजों ने हमारे साथ किया क्या हम कुछ-कुछ वैसा ही कश्मीर के साथ नहीं कर रहे? इरोम शर्मीला के साथ जो हो रहा है क्या वो सही है? क्या हम अपने आदिवासियों के साथ वही नहीं कर रहे जो अंग्रेजों ने कभी किया था? क्या गांवों में सूखा होने पर सरकार कर्जा माफ कर रही है? उनकी मदद कर रही है? नहीं! किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं। क्या अंतर हुआ अंग्रेजों के जाने से अगर आज भी हमारे गावों की हालत लगान के गाँव की तरह है जो सूखे के बावजूद लगान से मुक्त नहीं हो पा रहा था? दरअसल बात ये कभी थी ही नहीं कि किसकी सरकार हो, मुद्दा है कि कैसी सरकार हो और कैसा समाज हो। नेहरू इस बात को समझते थे लेकिन अफसोस उनके बाद कोई दूसरा नेहरू न हो पाया। 

इस किताब को आप Amazon से खरीद सकते हैं।

इस किताब पर सत्यजीत रे ने एक फिल्म भी बनाई थी - 'घरे बाइरे'। ये फिल्म youtube पर इंग्लिश सबटाइटल्स के साथ मिल जाएगी।



Sunday, September 4, 2016

द ग्लास कैसल



अगस्त महीने की आखिरी किताब थी जीनेट वॉल्स की लिखी 'द ग्लास कैसल'। जीनेट वॉल्स एक अमरीकी जर्नलिस्ट हैं और ये उनका लिखा संस्मरण है। एक किताब जो उनके और उनके पिता के रिश्ते के बीच कुछ तलाश करती हुई सीधे दिल में उतरती है और कुछ हद तक उसे तोड़ भी देती है।

इंसान एक परिस्थितिजन्य पुतला है। उसका व्यक्तित्व परिस्थितियों के आसरे परत दर परत बनता चला जाता है। जब हम किसी इंसान से मिलते हैं तो दरअसल हम उसकी ज़िंदगी की तमाम परिस्थितियों से उपजे पूर्वाग्रहों, विचारों, फलसफ़ों, मान्यताओं और नैतिकताओं के समग्र से साक्षात्कार कर रहे होते हैं। जब ये किरदार आपस में एक दूसरे से मिलते हैं तो अपनी-अपनी परतों में कुछ जोड़ते, कुछ घटाते चलते हैं। कई बार अपनी ज़िंदगियों में पीछे मुड़कर देखने पर लग सकता है कि बहुत कुछ बदल सकता था अगर 'उस' मोड पर 'वो' फैसला न लिया होता या 'वो' फैसला ले लिया होता। कुछ सपने मलाल बन के रह जाते हैं और उनमें से कुछ मलाल गुजरते वक़्त के साथ कसक बन के सिर उठाते हैं, टीस पैदा करते हैं।

जीनेट वॉल्स का बचपन मुफ़लिसी में गुज़रा। उनके पिता एक जीनियस थे। गणित, फ़िज़िक्स और लिटरेचर में प्रकांड। अपनी बेटी से बहुत प्यार करने वाले। लेकिन इन सब बातों के साथ ही साथ एक शराबी भी। उनकी माँ जो एक लिटरेचर में रुचि रखने वाली, पेंटिंग करने वाली, आज़ाद ख़यालों वाली, खुले आसमान में उड़ने वाली चिड़िया है वो किसी भी तरह के नियमों में नहीं बंध सकती। नतीजा ये हुआ कि बच्चों को खुद ही अपना और एक दूसरे का ध्यान रखना अपनी उम्र में बहुत पहले ही सीख लेना पड़ा। माँ-बाप दोनों की रुचि पढ़ने में होने की वजह से उनके बच्चों को भी शुरूआत से ही लाइब्रेरी की आदत लग गई। लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनती गईं कि बच्चे बेहतर ज़िंदगी के लिए खुद सोचने लग गए और आगे चल कर एक बेहतर ज़िंदगी बना भी सके। वॉल्स के पिता का किरदार किसी फैंटेसी-सा लगता है और पढ़ने वाले के मन में किसी पेंडुलम सा एक फ़िलॉसफ़र से लेकर एक गुड-फॉर-नथिंग के बीच के आयाम में डोलता रहता है। उम्र के अंतिम पड़ाव में जब एक बाप अपने आप से पूछता है कि क्या मैंने अपनी बेटी के लिए कुछ किया है? क्या मैंने उसे सिर्फ निराश किया है? इसका जवाब वो खुद भी जानता है पर शायद किसी उम्मीद में बेटी से भी पूछता है। बेटी भी झूठ नहीं बोलना चाहती और बात टल जाती है। क्या वाक़ई टल पातीं हैं ऐसी बातें? पिता अपनी बेटी को बचपन से ही एक काँच के महल का सपना दिखाता था जिसे वो एक दिन उसके लिए बनाएगा। दोनों घंटों बैठकर उसकी बहुत-सी प्लानिंग करते, खूब सारे नक्शे बनाते, छत पर सोलर एनर्जी पैनल के लिए भी खूब कैल्कुलेशन करते। वही बाप जब मृत्यु शय्या पर लेटे हुए बेटी से कहता है कि मैं तुम्हारे लिए ग्लास कैसल नहीं बना पाया, तब बेटी कहती है - "कोई बात नहीं! लेकिन हमने उसकी प्लानिंग करने में एक शानदार समय गुज़ारा।" तब कहीं इस बात का एहसास होता है कि ज़िंदगी मंज़िल नहीं सफर की खूबसूरती के बारे में है।

एक मर्तबा क्रिसमस पर पैसे न होने पर पिता अपनी बेटी को शहर से दूर ले कर गया और आसमान में उसके साथ निहारते हुए उससे कहा - 'अपना पसंदीदा सितारा चुन लो। इस बार क्रिसमस में तुम्हें तुम्हारा मनपसंद तारा मिलेगा'। जब बेटी ने उससे कहा कि आप किसी को तारा नहीं दे सकते क्योंकि उनका कोई मालिक नहीं है। तब पिता ने कहा - 'उनका कोई मालिक अब तक नहीं है और इसीलिए सिर्फ आपको अपना दावा ठोंकना है, ठीक वैसे ही जैसे क्रिस्टोफ़र कोलम्बस ने अमेरिका पर ठोंका था।' बेटी ने चमकता हुआ वीनस चुन लिया। पिता के मरने के बाद जब कभी बेटी अपनी निजी ज़िंदगी में उदास होती तो शहर की बत्तियों की पहुँच से बाहर निकल आती और अपनी गाड़ी को सड़क के किसी किनारे रोक कर वीनस को ताका करती।

कुछ किताबें अच्छी होतीं है, कुछ बेहद अच्छी लेकिन कुछ किताबें आपको रुला देतीं हैं और उन किताबों के बारे में आप कुछ कह नहीं पाते क्योंकि उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है। 'द ग्लास कैसल' ऐसी ही एक किताब है जो आपको कभी आपको गुदगुदाती है, कभी रुलाती भी है, कभी दिल भी तोड़ती है लेकिन अंत में आपको speechless कर के छोडती है। 

इस किताब को आप Amazon से खरीद सकते हैं।

Sunday, August 28, 2016

किताबें सितंबर की

अगस्त के लिए चार किताबों का लक्ष्य था और ये किताबें सोचीं थीं:
1. Metamorphosis (फ्रैंज काफ्का)
2. गुनाहों का देवता (धर्मवीर भारती)
3. मेरे मंच की सरगम (पीयूष मिश्रा)
4. Home and the World (रबिन्द्रनाथ टैगोर)

इनमें से 'मेरे मंच की सरगम' और 'Home and the World' की delivery ही नहीं हो पाई। इसलिए इन दो किताबों की जगह ली ट्विंकल खन्ना की 'मिसेज़ फनीबोन्स' और जीनेट वॉल्स की 'द ग्लास कैसल' ने। अभी 'द ग्लास कैसल' पढ़ रहा हूँ और जल्द ही अनुभव साझा करूंगा। 

सितंबर का टार्गेट भी चार किताबों का है और जो किताबें चुनी हैं वे हैं:

1. Home and the World (रबिन्द्रनाथ टैगोर)


2. मेरे मंच की सरगम (पीयूष मिश्रा)


3. मधुशाला (हरिवंश राय 'बच्चन')


4. ब-बाय (कृष्ण बिहारी)


Saturday, August 20, 2016

गुनाहों का देवता


अगस्त महीने की तीसरी किताब थी - गुनाहों का देवता। किताब के लेखक हैं धर्मवीर भारती। बहुत कुछ सुना था इस किताब के बारे में। इस किताब को मेरे जान-पहचान के बहुत लोगों ने recommend भी किया था। ये हिन्दी रोमैंटिक उपन्यासों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय उपन्यासों में एक है। इसके कई भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं, सौ से ज़्यादा संस्करण निकल चुके हैं और आज भी युवा वर्ग में हिन्दी प्रशंसकों की ये पसंदीदा किताबों में एक है। इस उपन्यास में प्रेम का एक बलिदानी रूप लेखक ने खींचा है और वो कितना सही, कितना गलत है इसे open-ended रख छोड़ा है। ख़ैर, इस उपन्यास के इतने लोकप्रिय होने के बारे में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय है।

इस उपन्यास का पहला संस्करण 1949 में छपा था। तब देश का माहौल कुछ दूसरा था। उस समय की जो युवा पीढ़ी थी उसके चारों तरफ त्याग, बलिदान और आदर्श के लिए प्रेरणास्रोत बने क्रांतिकारी थे। उसी समय नई-नई आज़ादी मिली थी। दूसरे विश्वयुद्ध के ख़त्म होने और हिटलर के पतन के बाद जो दुनिया एक नए शीत-युद्ध की तरफ बढ़ रही थी वो दो धड़ों में बंट चुकी थी। एक तरफ अमरीका का घोर पूंजीवाद था जो ताज़ा-ताज़ा हिरोशिमा-नागासाकी पर बम गिरा चुका था और दूसरी तरफ था समाजवाद। भारत ने हाल ही में 200 साल के क्रोनी कैपिटलिज़्म से मुक्ति पाई थी। ऐसे में समाजवाद एक नैचुरल रोमांटिक थॉट था। भारत के शीर्ष नेता नेहरू, जो दुनिया के बड़े डेमोक्रैट्स में गिने जाते थे, खुद समाजवादी थे। भारती का ये उपन्यास ऐसे ही दौर में युवा पीढ़ी के भीतर का द्वंद्व है जिसे एक प्रेम कहानी की शक्ल में खींचा गया है। 

कोई इंसान अपने कर्मों से महान बनता है लेकिन यदि कर्मों का प्रयोजन ही सिर्फ महानता को प्राप्त कर लेना हो जाये तो परिभाषा का एक नया संकट पैदा हो जाता है। महानता की परिभाषा का। कहानी का मुख्य किरदार है चंदर जिसकी परवरिश इलाहाबाद के शुक्ला जी के घर में होती है जो शिक्षा विभाग में बड़े अधिकारी हैं। उनकी एक लड़की है सुधा। चंदर और सुधा में एक अनकहा प्रेम है। शुक्ला जी के चंदर के ऊपर बहुत अहसान हैं। एक दिन शुक्ला जी चंदर को बुलाते हैं और उसे अपनी नई किताब के बारे में बतलाते हैं। किताब में भारत की जाति व्यवस्था की पुरज़ोर पैरवी की गई है। चंदर और सुधा की जाति एक नहीं है। और एक समय आता है जब वो शुक्ला जी के अहसानों के लिए अपने प्यार को बलिदान कर देता है। त्याग और बलिदान के आदर्शों पर चलने वाले के लिए ये बात बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि त्याग और बलिदान का उद्देश्य क्या है। गांधी ने त्याग किया अंग्रेजों का मनोबल तोड़ने के लिए। भगत सिंह ने बलिदान दिया देश में आज़ादी के जज़्बे को जगाने के लिए। वो दौर जब नेहरू और अंबेडकर हिन्दू कोड बिल की तैयारी कर रहे थे, एक त्याग जिसके अंतस में जाति-व्यवस्था के लिए रजामंदी छुपी है। उस त्याग के ऊपर एक लेप लगाया गया शुक्ला जी के अहसानों का। फिर एक और कवर चढ़ाया गया प्लेटोनिक लव का जिसमें दैहिक संबंध के बिना अपने प्रेम का चरम रूप दो प्रेमी दिखाना चाहते हैं। और इस प्लाटोनिक लव के नाम पर नायक का खुद को देवता समझ लेना उसे अंत आते-आते तक गुनाहों का देवता बना देता है। लिखावट में बहुत पैनापन है। भारती कहानी में मेटाफोर गढ़ने और मेटाफोर में कहानी गढ़ने में उस्ताद नज़र आते हैं। आपको उनकी लिखावट को between the lines भी interpret करते चलना होता है। मसलन कई जगह फूलों का ज़िक्र है कि फूल सिर्फ पौधे में लगे रहें तो सुंदर हैं और अगर किसी ने उन्हें तोड़ के बालों में लगा लिया तो वो 'उपयोग' की श्रेणी में आ गया। प्यार और सेक्स के बीच संबंध क्या है? क्या शादी के पहले सेक्स करना पाप है? यथार्थ में घट रहे प्रेम को अनदेखा कर आदर्शवादी और आज्ञाकारी बने रहना इस उपन्यास के तमाम पात्रों की चारित्रिक विवशता नज़र आती है। अंत में सुधा को फूल तोड़ कर पूजा में चढ़ाते दिखाया गया है। उपन्यास में उस समय के शहरी मध्यम वर्ग की उदासीनता भी नज़र आती है। एक ऐसा मध्यम वर्ग जो आज़ादी के बाद एक आदर्श समाज की परिकल्पना तो करता है पर उसके सामाजिक जीवन में कोई बदलाव नहीं चाहता क्योंकि वो खुद जाति-व्यवस्था में कुछ ऊंचे पायदान पर है। शुक्ला जी उसी मध्यम वर्ग के प्रतीक हैं। एक ऐसा मध्यम वर्ग जो अपने गाँव को बहुत पहले छोड़ चुका है, अपनी जड़ों से कट चुका है और अब उन्हें सीमेंट, टाइल्स और कांक्रीट के नीचे तलाश कर रहा है। जब गाँव की एक लड़की जिसका नाम बिनती है चंदर से कहती है कि गाँव में तो शादी के पहले भी सेक्स हो जाता है और वहाँ पर ये इतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना आप लोगों ने इसे शहर में बना दिया है। शहरी मध्यम वर्ग के लिए ये outrageous है, क्योंकि उसकी जड़ें, जो दरअसल काल्पनिक हैं, वो तो ऐसी हो ही नहीं सकतीं। 

कुल मिला के एक बहुत बढ़िया उपन्यास है। एक ऐसा उपन्यास जो ख़त्म हो जाने के बाद आपके भीतर कहीं दोबारा शुरू होता है। 

इस उपन्यास को आप Amazon से खरीद सकते हैं।

Friday, August 12, 2016

मिसेज़ फनीबोन्स



अगस्त महीने की दूसरी किताब थी - "मिसेज़ फनीबोन्स"। किताब की लेखिका हैं ट्विंकल खन्ना। ट्विंकल खन्ना, जिन्हें ज़्यादातर लोग कई रूप में जानते हैं - राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की बेटी, अक्षय कुमार की बीवी और एक फ्लॉप एक्ट्रेस। लेकिन इनके अलावा इनकी एक शख्सियत और है। ये बात अक्सर मध्यम वर्गीय लोगों में ईर्ष्या उपजाती है कि सम्पन्न वर्ग के पास अपने पसंदीदा करियर के तमाम विकल्प मौजूद हमेशा ही रहते हैं। अगर एक में असफल हो जाओ तो दूसरे में हाथ आजमाओ। ये बात किसी हद तक सही होते हुए भी प्रतिभा का पर्याय तो नहीं बन सकती। ट्विंकल खन्ना अपने एक्टिंग करियर में असफल होने के बाद इंटीरियर डिसाइनर बन गईं और उसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया में एक कॉलम भी लिखने लग गईं। आप भले ही राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन के वंशज हों पर यदि प्रतिभा नहीं है तो पब्लिक पसंद नहीं करेगी। आप भले ही बिना किसी अनुभव के अभिनेता या कॉलम्निस्ट या लेखक बन जाएँ पर आपको दर्शक या पाठक तभी पसंद करेंगे जब आपके अभिनय या आपकी लेखनी में दम होगा। इधर कई लेखक अपनी किताब सेल्फ-पब्लिश करवा रहे हैं पर जब तक पढ़ने वाले को आप बांध नहीं पाओगे, आपको पाठक मिल ही नहीं पाएंगे।

'मिसेज़ फनीबोन्स' एक दमदार किताब है। पूरी किताब में ट्विंकल खन्ना का सेंस ऑफ ह्यूमर बेहद शानदार लगा है। किताब के द्वारा वो एक ऐसी महिला के रूप में सामने आतीं हैं जिनका दिमाग बिलकुल सही जगह पर है। ट्विंकल की लिखावट पर मोनी मोहसीन की 'द डायरी ऑफ अ सोशल बटरफ्लाय' का असर स्पष्ट रूप से समझ आता है। लेकिन प्रेरणा लेने और कॉपी करने में अंतर होता है। ट्विंकल ने कई जगहों से प्रेरणा ली है लेकिन अपने मूल को उन प्रेरणाओं की सहाता से बेहतर ही बनाया है। प्रेरणा का मकसद भी दरअसल यही होता है। एक जगह तो menstruation पर उन्होनें लिखा है जिसकी भूमिका standup comedian अदिति मित्तल के इसी विषय पर बनाए गए एक जोक से ली है। वैसे भी बॉलीवुड वाले थोड़ा बहुत कॉपी कर भी लें तो पब्लिक उन्हें माफ कर देती है, और ट्विंकल ने तो फिर भी अपनी मौलिकता बरकरार रखी है।

बहुत पहले शफ़ी इनामदार और राकेश बेदी का एक कॉमेडी शो टीवी पर आया करता था - 'ये जो है ज़िंदगी' जिसमें ज़िंदगी की छोटी-छोटी घटनाओं पर observational कॉमेडी की जाती थी। जसपाल भट्टी का एक शो था 'फ्लॉप शो', वो भी observational humor पर ही आधारित था। हाल के कोमेडियन्स में राजू श्रीवास्तव और बिसवा कल्यान का बेहद शानदार observation है। ट्विंकल की शैली भी observational humor के ही इर्द-गिर्द घूमती है। जो घटनाएँ हमारे सभी के जीवन में घटती हैं उन छोटी-छोटी बातों को बहुत बढ़िया तरीके से उन्होनें लिखा है। एक जगह एक थर्मामीटर के बारे में लिखा है जो सिर्फ सेल्सियस में बुखार बताता था और तब उन्हें मिला विक्स कंपनी का एक डिजिटल थर्मामीटर जो उन्हें इतना पसंद आया कि लगा कि अब और किस किसका temperature ले लूँ? उन्होनें menstruation से ले कर मदर-इन-लॉं तक के बारे में लिखा है, वालेंटाइन डे से ले कर करवाचौथ तक के बारे में लिखा है। डोमेस्टिक हेल्प्स से ले कर पड़ोसियों के बारे में भी, pets से ले कर perverts के बारे में भी, अपने बच्चों के बारे में भी और उनके डाइपर्स के बारे में भी। ये सब ऐसी बातें हैं जो हम सभी की ज़िंदगियों में होती रहती हैं। ट्विंकल की सबसे अच्छी बात ये है कि वो खुद के ऊपर हंसने का माद्दा रखतीं हैं। अपने नाम के बारे में भी मज़ाक करतीं हैं और अपनी एक्टिंग के हुनर का खुद मज़ाक उड़ाती हैं। अपने एथीस्ट बिलीफ से लेकर अपने अरेस्ट वॉरेंट का भी मज़ाक बनातीं हैं। शुरुआत में भले किताब सोशल बटरफ्लाय से influenced लगती है लेकिन धीरे-धीरे ट्विंकल पढ़ने वाले को बांध पाने में न केवल सफल ही रहतीं हैं बल्कि ये एहसास करा पाने भी कि "अरे! ऐसा तो हमारे साथ भी होता है!!".

इन सब हंसी-मज़ाक के बीच कहीं-कहीं उन्होनें आधुनिक प्रगतिशील सोच के साथ थोड़ा-बहुत ज्ञान भी डाल दिया है जो कि किताब की चमक को और उम्दा करता है। एक घटना का ज़िक्र है जब वो जर्मनी के किसी शहर के अस्पताल जातीं हैं तो देखतीं हैं कि जो भी इलाज के लिए आया है, अकेला आया है। भारत में तो अगर कोई अस्पताल जाता है तो बहुत नहीं तो एक-आध बंदा तो साथ होता ही है। इस संदर्भ में लिखा है

Looking at these old people shuffling along by themselves, all I can say is: "We may have potholed roads but at least we have many people willing to travel with us on them".

किताब बहुत ज़बरदस्त है और पढ़ने लायक है। किताब को आप Amazon से खरीद सकते हैं

Monday, August 8, 2016

मेटामोर्फोसिस


किसी भी देश के द्वारा चुनी गई आर्थिक नीतियाँ केवल वहाँ के नागरिकों की सामाजिक और आर्थिक ज़िंदगियों पर ही असर नहीं डालतीं बल्कि उन ज़िंदगियों की पारिवारिक और नैतिक बुनियादें भी तय करतीं हैं। ग्रेगोर साम्सा नाम का एक आदमी एक दिन सुबह-सुबह नींद से जागता है और अपने आप को एक बहुत बड़े कीड़े में बदल चुका हुआ पाता है। कहानी जो शुरुआत में किसी साइन्स फिक्शन की तरह लगती है धीरे-धीरे एक पूंजीवादी देश के पारिवारिक मूल्यों पर चोट करती महागाथा में बदल जाती है। मेटामोर्फोसिस (Metamorphosis)। 1915 में फ्रांज़ काफ्का का जर्मन में लिखा एक लघु उपन्यास जो कि अपनी अनोखी लिखावट की वजह से एक कालजयी रचना बन चुका है। मेटमोर्फोसिस दरअसल एक बायलॉजिकल प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई कीड़ा या मछली अपनी शारीरिक रचना को बनाता है मसलन लार्वा से किसी कीड़े का बनना या कैटरपिलर से किसी तितली का।

अपने ही परिवार के बीच में कोई कैसे alienate हो सकता है! इस बुनियादी सवाल को केंद्र मानकर लेखक ने मुख्य किरदार को एक कीड़ा बना दिया। इस तरह लेखक ने न केवल उसे alienate ही किया बल्कि उसके alienation को अमूर्त्य (abstract) भी कर दिया। ये alienation किसी की विकलांगता की वजह से हो सकता है, लकवे की वजह से, दिमागी स्थिति की वजह से, या फिर बुढ़ापे की वजह से भी हो सकता है। ग्रेगोर एक ट्रैवल सेल्समैन है जिसकी कमाई से पूरा घर चलता है। धीरे-धीरे लोगों को उसकी कमाई की आदत लग जाती है। लोग उसे एक पारिवारिक इंसान की तरह न मानकर उसे एक ATM मशीन समझने लगते हैं। लेकिन वो खुश है। और उसकी खुशी शायद इस बात पर ज़्यादा टिकी है कि वो ज़्यादातर बाहर ही रहता है। कभी-कभार ही घर आता है तो वो इस बदलाव को कभी इतने गौर से नहीं समझ पाया। लेकिन ऐसा व्यक्ति यदि अब अपाहिज हो जाये तो क्या बाक़ी सदस्य उसकी ताउम्र देखभाल कर सकेंगे? और यदि कर भी सकेंगे तो क्या 'अपनेपन' से कर सकेंगे? ये कुछ मानवीय स्वभाव को कुरेदने वाले सवाल हैं।

जलगाँव में रहने वाले दिवाकर चौधरी के बड़े भाई की दिमागी स्थिति कुछ खराब हो गई और एक दिन उन्होनें अपने ही 8 साल के बेटे और अपनी बीवी की हत्या कर दी। बाद में कोर्ट ने उन्हें इलाज के लिए मानसिक चिकित्सालय भेज दिया। दिवाकर ने अपने भाई के साथ अपनी ज़िंदगी के अनुभव को 'स्कीत्ज़ोफ़्रेनिया' में बयान किया है जो कि मेटामोर्फोसिस की कहानी से एकदम उलट है और रिश्तों की गहराइयों का एहसास कराती है। स्कीत्ज़ोफ़्रेनिया की कहानी 1991 के आर्थिक सुधारों के पहले के एक गाँव की कहानी है जबकि मेटामोर्फोसिस प्रथम विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रहे यूरोप के एक पूंजीवादी देश की कहानी है। अभी हाल में अनुराग कश्यप की एक फिल्म आई थी 'Ugly' (अग्ली), जिसमें 2014 का मुंबई दिखाया गया है और एक बच्ची के किडनैप के बैकड्रॉप में जो कहानी बुनी है वो यही बताती है कि इंसान भीतर से इतना सड़ चुका हैं कि इंसानियत में अब फफूंद लग चुकी है। 'लगे रहो मुन्नाभाई' का एक दृश्य है जिसमें एक बूढ़ा पिता, जिसने ताउम्र मेहनत कर के अपने बेटे को पढ़ाया लिखाया, आज खुद उनकी ही दुनिया में फिट नहीं हो पा रहा। ठीक फ्रांज़ काफ्का के ग्रेगोर साम्सा की तरह।

इस लघु उपन्यास को आप Amazon से खरीद सकते हैं।