Friday, June 13, 2014

मामला कब ठंडा होगा?



पिछले इतवार की बात है। रात के करीब साढ़े ग्यारह पौने बारह बज रहे होंगे। हम लोग अपने घर में सोने की तैयारी में थे। तभी मेरे ढाई साल की बेटी ने पानी मांगा और मेरे पत्नी रसोई की तरफ पानी लेने बढ़ी। मैं बेडरूम में ही अपनी बेटी के साथ था। तभी मेरे पत्नी ने ज़ोर ज़ोर से आवाज़ दी -
"अभिषेक ! अभिषेक !"
आवाज़ ऐसी कि ज़ोर की भी और धीरी भी। कुछ ऐसी कि जब इंसान चाहता तो है ज़ोर से बोलना लेकिन कोई दूसरा ना सुन ले इस कर थोड़ी दबा कर भी बोलता है। चूंकी मैं बेडरूम में था मैंने वहीं से पूछा -
"क्या हुआ?"
उसने पलट कर बोला - "जल्दी आओ"।
मैं जल्दी से हॉल में पहुंचा। उसने कहा - "सुनो"।
हम लोग अपने हॉल में दीवार से सटे सोफ़े के नजदीक आ गए। दीवार पर बनी एक खिड़की से बाहर झाँकने लगे। बाहर शोर शराबे की आवाज़। कुछ औरतें शायद रो रहीं थीं। आदमियों की भी आवाज़। कुछ स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहा था बस हो हो हा हा की तरह का कुछ शोर सुनाई दे रहा था। मैंने तुरंत अपने घर की तरफ देखा। हॉल की लाइट बंद थी। बेडरूम की लाइट भी बंद थी। बेडरूम में जो अटैच बाथरूम था उसकी बत्ती ज़रूर जल रही थी। मैंने तुरंत दौड़ कर बाथरूम की लाइट बंद की। मैं जिस इलाके में रहता हूँ वहाँ हिन्दू मुस्लिम दोनों रहते हैं। रहते क्या हैं काफी अच्छे से रहते हैं। आस पास दुकाने भी हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की हैं। एक बाजू वाले पड़ोसी हिन्दू और दूसरे वाले मुस्लिम हैं। मेरे तो मकान मालिक भी एक मुस्लिम हैं। बाकी कोई विचार मेरे दिमाग में नहीं आया। अभी चंद रोज़ पहले ही एक मुस्लिम को पुणे में जिस तरह दाढ़ी बढ़ाने और टोपी पहनने की वजह से मार दिया गया था वही घटना मेरे दिमाग में सबसे पहले आई। लगा कि यहाँ भी तो कुछ हो नहीं गया। हालांकि बैंगलोर में इसकी उम्मीद ना के बराबर थी लेकिन फिर पुणे में भी तो उनके मोहल्ले वाले यही कह रहे थे कि वहाँ भी सब सामान्य हुआ करता था। लोग अच्छे से रहते थे। वो लड़का भी सॉफ्टवेअर इंजीनियर था। बाहर से आए लोगों ने किया जो किया और वो भी फेसबुक की किसी सामाग्री को ले कर के जिसके बारे में बाद में बताया गया कि वो फ़र्ज़ी थी। हालांकि बाहर के शोर में किसी तरह की कोई नारेबाजी नहीं थी लेकिन शायद दिमाग में नारेबाजी उठ खड़ी हुई थी। गौर से सुना कि कहीं कोई हर हर महादेव या जय श्रीराम या अल्लाह हो अकबर के नारे तो नहीं। नहीं, ऐसे कोई नारे नहीं थे। फिर भी मैंने अपनी पत्नी से कहा -
"पीछे की तरफ जाओ। आना (मेरी बेटी) को भी साथ ले जाओ। बिलकुल आवाज़ ना करना। रसोई की लाइट भी बंद कर दो।"
वो मेरी बात मानते हुए पीछे की ओर चल पड़ी बच्ची के साथ। मैं धीरे से दरवाजे पर आया। बिलकुल धीरे, बगैर किसी आवाज़ के दरवाजा खोला। हमारे घर में दरवाजे के बाहर एक चैनल है जिसे सुरक्षा की दृष्टी से मकान मालिक ने बनाया था। उसमें रात में हम लोग ताला डाल के सोते हैं। मैंने चैनल का ताला नहीं खोला। तभी मेन गेट से पार मेरी निगाह एक आदमी पर पड़ी । वो आराम से टहलता हुआ चला जा रहा था। तब मुझे समझ आया कि कोई 'वैसी' बात नहीं है। मैंने चैनल खोला फिर मेन गेट। बाहर आया, देखा - पड़ोस के आगे वाले अपार्टमेंट में शायद किसी की अचानक तबीयत खराब हो गई थी और उसी वजह से हो हल्ला मचा था। उनकी ही पत्नी या बच्चे रो रहे थे और आदमी लोग गाड़ी निकाल के उन्हें अस्पताल ले जा रहे थे।

कुछ समय बाद में जब मैं वापस घर आया और अपनी पत्नी और बच्ची के साथ बैठा था तो महसूस किया उस दहशत को जिसमें थोड़ी देर पहले क़ैद था। बाद में एक दफा उन लोगों का भी खयाल आया जिनके घर के बाहर कोई भीड़ सच में आई थी। हम सभी लोगों में असुरक्षा कितनी ज़्यादा भीतर तक पैठ चुकी है। काफी देर तक हम लोग यही चर्चा करते रहे। दूसरे दिन समाचारों में पता चला कि पुणे में मुसलमानों ने दाढ़ी हटा ली है और टोपी भी कुछ दिनों के लिए नहीं पहनने का फैसला किया है। तब तक जब तक मामला ठंडा ना हो जाये। आखिर ये मामला कब ठंडा होगा?

12 comments:

  1. हम सब अगर चाहें तो मामला एक पल मे ठंडा हो सकता है ।

    सादर

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    1. सही कहा आपने लेकिन बहुत से लोग मामले को ठंडा होने देना नहीं चाहते।

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  2. कल 15/जून/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. धन्यवाद यशवन्त जी

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन विश्व रक्तदान दिवस - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. यशवंत की बात से सहामत हूँ । हमारे ही हाथ में तो है ।

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    1. बात तो बिलकुल सही कही यशवंत जी ने. लेकिन बंग भंग से लेकर आज तक हमेशा और अक्सर ही सियासत ही बरगलाती रही है लोगों को.

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    2. लोग कब सही सोचते हैं कहाँ पता चलता है । बस अपने फायदे की बात पर सब एक हो जाते हैं नाम देश प्रेम का दे दिया जाता है :)

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  5. सचमुच एक विचित्र सी दहशत में जीने लगे हैं हम। इसे हमें ही मिटाना होगा, नहीं तो जाने कितने बुरे हालात हो सकते हैं, जिसकी कल्पना मात्र भी कंपा देने वाली है। बढ़िया लिखा है आपने। समाज में बदलाव के लिए ऐसे विचार जरूरी हैं।

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  6. kya sirf rajniti ka hi dosh hai .. kya apna koi dosh ya galti nahin.. hamaari apni samajh ka fer ..???

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  7. नफरत और संदेह से मुहब्बतें ख़त्म होती जा रही है! :-(

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