Thursday, April 9, 2026

स्पंज युग



किसी तेज़ धार से नहीं,

ये सब हवा के गाढ़े होने से शुरू होता है।

एक धीमा, चिपचिपा रस

बर्फ़ की चोटियों से उतरकर,

नमक-भरे किनारों तक रिसता चला आता है।

अक्षर, जीभ को छूने से पहले ही

जबड़ों में सड़ने लगते हैं।


हम कभी अपनी आवाज़ें लाल बलुए पत्थरों पर उछालते थे,

और देखते थे

कि वे लाखों बेपरवाह पतंगों में बिखर जाती थीं—

मॉनसून की हवाओं में उलझी हुईं,

ऊंची, बेसुरी, और ख़ूबसूरती से बेक़ाबू।


लेकिन फिर, उन्होंने पत्थरों की जगह स्पंज रख दिया।

अब दीवारें चीख़ को पी जाती हैं,

फुसफुसाहट को निगल जाती हैं।

गलियों में अब कहीं कोई गूँज नहीं बची,

बस एक सपाट, दम घोंटती थाप।


मैं बाज़ार में एक कवि को देखता हूं;

वो गाने के लिए अपना मुंह खोलता है,

पर उसके होंठों से झरती है सफ़ेद राख।


सड़क पर टंगी बत्तियां टिमटिमाती हैं,

लंबी परछाइयों के साथ साज़िश करती हुईं।

वे हमारी तरंगों के नुकीले किनारों को कतरती जाती हैं,

जब तक कि हम,

केवल सीधी-साधी समांतर रेखाओं में

गुनगुनाने की हिम्मत न करें।

करोड़ों वाद्यों की जुगलबंदी,

धीरे-धीरे, बारीक़ी से,

एक ही लकवेग्रस्त स्वर पर कसी जा रही है।


हम वर्णमाला को निगलने की कला में निपुण हो रहे हैं।

हम अपनी संज्ञाओं और विशेषणों को

अपने आंगन में दफ़ना रहे हैं।

मिट्टी को थपथपाकर समतल कर रहे हैं,

ताकि किसी को पता न चले

कि सवाल कहां दफ़न हैं।


हमारी कलमों की स्याही जमती जाती है,

एक उलटे लटके प्रश्नवाचक चिह्न की फांसी पर शोक मनाती हुई,

और भीतर से, कान के परदों को चकनाचूर करती हुई।


***

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