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Sunday, May 1, 2022

बक्सा (कहानी)



मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा कि तुम मम्मी से नहीं मिल सकीं. पता है, ये कोई तीन साल पहले की बात है. हालांकि इसकी शुरुआत उससे भी पहले हो चुकी थी. मुझे याद है वो अक्सर अपनी चीज़ों को इधर-उधर रखकर भूल जाती थीं. ये ख़ासकर उनके चश्मे के साथ होता था. हम सभी के साथ इस तरह की चीज़ें होती रहती हैं, इसलिए मैंने भी कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया. और वैसे देखा जाए तो उनकी उमर भी हो रही थी. सोचा कि उमर का भी कुछ असर तो दिखेगा ही. 


एक बार वो किचन से निकलकर अपने कमरे की ओर जा रही थीं कि अचानक चलते-चलते रुक गयीं. मैं अपने कमरे में बैठा अख़बार पढ़ रहा था. मेरे कमरे से बीच वाला बारामदा दिखाई देता है. अख़बार पढ़ते-पढ़ते मैंने पन्ना पलटने के लिए अपनी नज़रें हटाईं तो मुझे वो बीच बारामदे में खड़ी नज़र आईं. घुंघराले सफ़ेद बालों के नीचे उनके चश्मे और उनसे झांकती हुईं भावशून्य आँखें. मुझे लगा कहीं उन्हें चक्कर तो नहीं आ रहे. मैं अपना अख़बार रखकर बारामदे की ओर बढ़ा. मैंने पूछा, "क्या हुआ मम्मी"? उन्होनें आवाज़ की तरफ अपना सिर घुमाया. मुझे एकटक देखती रहीं. मैंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए दोबारा पूछा, "क्या हुआ"? उन्होनें ठिठकर कहा, "अरे कुछ नहीं! मैं किचन से वापस लौट रही थी तो ऐसा लगा कि अपने कमरे का रास्ता भूल गयी हूँ". उस वक़्त भी मुझे ख़ास कुछ अहसास नहीं हुआ. मैंने कहा, "कोई बात नहीं! हो जाता है कभी-कभी". उसके बाद उन्होनें जो कहा उसने मुझे हिलाकर रख दिया. उन्होनें कहा, "हाँ, हो जाता है कभी-कभी. लेक़िन किस तरफ़ है मेरा कमरा? मुझे अभी भी याद नहीं आ रहा". उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद कोई बड़ी बात है. 


शाम को ऑफ़िस से लौटकर मैं उन्हें डॉक्टर के पास ले गया. अगले कई दिनों तक उनकी तमाम जांचें चलती रहीं. आख़िरकार एक दिन डॉक्टर ने बताया कि उनके दिमाग़ की कोशिकाएं ख़तम हो रही हैं. उन्होनें समझाया, "हमारे दिमाग़ को चलाने की ज़िम्मेदारी जिन कोशिकाओं की होती है उन्हें न्यूरॉन कहते हैं. दिमाग़ में न्यूरॉन्स का एक बहुत पेचीदा जाल होता है. दिमाग़ जब काम करता है तो ये न्यूरॉन्स एक दूसरे को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती हैं. जिस तरह बिजली के तारों के ऊपर रबर की एक इंसुलेटर कोटिंग होती है, उसी तरह न्यूरॉन को सिग्नल भेजने वाली कोशिकाओं पर भी एक कोटिंग होती है जिन्हे मायलिन कहते हैं. आपकी मम्मी के दिमाग़ में न्यूरॉन और मायलिन दोनों घट रही हैं. इसका सीधा असर उनकी याद्दाश्त पर तो पड़ेगा ही, लेक़िन इसका असर उनके चलने-फिरने की या छोटे-छोटे काम करने की क़ाबिलियत पर भी पड़ेगा. जहां की कोशिकाएं मर चुकी हैं, वे यादें पूरी तरह ख़त्म हो जाएँगी, लेक़िन जहां की कमज़ोर हैं, वो बातें इन्हें थोड़ी-थोड़ी याद रहेंगी. धीरे-धीरे इनका स्वभाव हो सकता है चिड़चिड़ा या अनप्रेडिक्टिबल हो जाए, या रेंडमली कोई पुरानी बात याद आ जाए और वो रोने लगें, या कोई और अनप्रेडिक्टिबल व्यवहार करें. बेहतर होगा कि आप इनके लिए एक नर्स का बंदोबस्त कर लें ताक़ि आपके दफ़्तर जाने के बाद भी कोई देखभाल के लिए इनके पास रहे". 


मैंने पास के एक नर्सिंग होम में बात करके एक नर्स का इंतेज़ाम कर लिया. नर्स रोज़ सुबह मेरे ऑफ़िस जाने के पहले आ जाती और शाम को मेरे लौटने के बाद ही वापस जाती. एक दिन मैं अपने कलीग के साथ ऑफ़िस में लंच कर रहा था. मेरे मोबाइल पर नर्स का कॉल आया. उसने कहा, "हैलो सर! आंटी बहुत हाइपर हो रही हैं. किसी बक्से के बारे में पूछ रही हैं. सारे कमरों में इधर-उधर जा रही हैं बार-बार. कह रही हैं कि बक्सा चोरी हो गया. मेरा सामान रखा था उसमें. अभी मैंने समझा-बुझा कर बैठाया है कि आपके बेटे को पता है बक्से के बारे में. मैं उन्हें फ़ोन दे रही हूँ. आप कुछ समझा देना. शाम तक तो शायद भूल जाएंगी". फिर उसने मम्मी को फ़ोन देते हुए कहा, "आंटी, कैलाश का फ़ोन है. आपसे बात करना है". अगली आवाज़ मम्मी की थी, "कैलाश! वो बक्सा रखा था ना भगवान् वाले कमरे के बाहर! वो कहाँ चला गया? सब जगह देखा, कहीं नहीं है". मैंने उन्हें याद दिलाने की क़ोशिश की, "मम्मी! अपन ने वो बक्सा बेच दिया था दस साल पहले". मम्मी ने कहा, "नहीं! मैंने नहीं बेचा बक्सा! मेरा सामान था उसमें". मैंने कहा, "कुछ सामान मेरी अलमारी में है, कुछ दीवान में है. मैं शाम को लौटकर देख दूंगा. अभी आप आराम करो".


शाम को लौटते वक़्त डॉक्टर से मशविरा करने गया तो उन्होंने कहा, "इस तरह के अल्ज़ाइमर में कभी-कभी अग्रेशन या गुस्से के लक्षण होते हैं. नींद की कमी, गैस या कभी-कभी तो मामूली भूख-प्यास जैसे डिस्कम्फर्ट की वजह से भी ऐसा हो सकता है. घर का एकाएक अजनबी-सा लगने लगना, या हो सकता है अकेलापन ही लग रहा हो! ऐसे वक़्त दिमाग़ स्ट्रेस रिलीज़ करने के लिए सहज ही अतीत में कम्फर्ट ढूंढने लगता है और ना मिलने पर कभी-कभी अग्रेशन दिखाई देता है. ध्यान रखें कि उनकी बातों को ख़ारिज न करें. अगर उन्हें लगेगा कि उन्हें कोई सीरियसली नहीं ले रहा तो वो और ज़िद्दी होने लगेंगी. ध्यान भटकाने की कोशिश करें. फैक्ट्स के बजाय उनकी फ़ीलिंग्स पर फ़ोकस करें.".


डॉक्टर से मिलकर सीधा घर की और रवाना हो गया. रास्ते भर एक ही बात मेरे दिमाग़ में चलती रही, "फैक्ट्स के बजाय फ़ीलिंग्स पर फ़ोकस करें". गाड़ी खड़ी करके, बग़ैर जूते-मोज़े उतारे सीधा मम्मी को देखने उनके कमरे में पहुँच गया. बाहर सूरज अस्त हो रहा था. भीतर खिड़की के परदे गिरे हुए थे. कमरे की लाइट बंद थी, केवल कोने में रखा एक लैम्प अपनी हल्की पीली रोशनी बिखेर रहा था. मम्मी अपने बिस्तर पर सो रही थीं. उन्होंने पीले रंग की एक चादर गले तक ओढ़ राखी थी. छत पर दो की धीमी रफ़्तार में पंखा घूम रहा था. पलंग के बाजू में एक कुर्सी पर नर्स बैठी अपना मोबाइल चला रही थी. मैं मम्मी के बाजू में जाकर बैठ गया. मुझे देखकर नर्स ने अपना मोबाइल लॉक कर लिया और मेरी ओर मुख़ातिब हुई, "आपके फ़ोन के बाद भी बहुत ग़ुस्सा हुईं. मैंने समझा बुझा कर किसी तरह रिलेक्सेंट दिया. उसके बाद थोड़ी देर में सो गईं". मेरी नज़र उनके सिरहाने पड़ी. एक फ़ोटो-फ्रेम रखा हुआ था. फ्रेम के भीतर मेरे बचपन की फोटो थी. नर्स ने कहा, "अपना सामान ढूंढने आपके कमरे गई थीं. वहां से उठा ले आई थीं. जब सो गईं तो मैंने उन्हीं के सिरहाने रख दी". मैंने नर्स को थैंक्स कहा और अपने कमरे में आ गया. 


उस रात मैं बहुत देर तक अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा. उस बक्से के बारे में सुनकर बहुत-से पुराने बिम्ब आँखों के सामने तैरने लगे. वो एक लोहे का बड़ा और गहरा बक्सा था. उसे मेरे दादाजी ने अपने रिटायरमेंट के समय बनवाया था. उसके नीचे लोहे के दो मज़बूत गुटखे लगे थे जिससे वो ज़मीन से कुछ इंच ऊपर रहता था. सामने दो कुंदे थे जिन्हें बंद करके ताला लगाया जा सकता था. दोनों बाजू दो पतले-पतले हैंडल थे, उसे उठाकर शिफ़्ट करने के लिए. पूरे बक्से में वो दो हैंडल ही थे जिन्हें काले रंग से पेंट किया गया था, बाक़ी पूरा बक्से का रंग लोहिया ही था. उसके पल्ले में भीतर की ओर लोहे की दो पतली ज़ंजीरें लगी थीं ताक़ि खोलने पर पल्ला पीछे की ओर न चला जाए. पल्ले में ही भीतर एक लोहे का जेबनुमा खाना भी बना हुआ था जिसमें सालों तक मम्मी-पापा की शादी का कार्ड रखा रहता था, लाल रंग का. क़रीब तेरह साल पहले वो बक्सा मम्मी ने हमारी हेल्पर को बेच दिया था. उसका पति एक ठेला लेकर आया और चालीस साल तक हमारे घर में रहने के बाद वो बक्सा एक मामूली से लकड़ी के ठेले पर चला गया. 


कुछ दिनों बाद एक रोज़ सुबह-सुबह मैं अपने कमरे में ऑफ़िस के लिए तैयार हो रहा था. नर्स ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते हुए कहा, "आपको आंटी बुला रही हैं". मैं तैयार होकर मम्मी के कमरे में पहुंचा. नर्स कोने में रखी टेबल पर दवाइयों के डिब्बे टटोल रही थी. मम्मी सिरहाने एक खड़ा तकिया लगा कर अपने पलंग पर बैठी हुई थीं. उन्होंने कमर तक चादर ओढ़ रखी थी. उनके एक हाथ में वही फ़ोटो फ़्रेम था जो वो कुछ दिन पहले मेरे कमरे से उठा लाई थीं. मैं पलंग के बाजू में रखी कुर्सी पर बैठ गया. उनकी नज़रें तस्वीर पर ही जमी रहीं. मैंने कहा, "मम्मी! आपने बुलाया था"? उन्होनें बग़ैर मेरी ओर देखे बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "तुम्हें नहीं, कैलाश को बुलाया था". मैंने अपने हाथ को आहिस्ता उनके दूसरे हाथ के ऊपर रख दिया और धीमी आवाज़ में कहा, "मैं कैलाश हूँ मम्मी". मम्मी ने नज़रें मेरी ओर उठाईं. उन्होंने चश्मे नहीं पहने थे. उन आखों को मैंने बचपन से देखा था, कत्थई रंग की बड़ी-बड़ी आँखें और उन बड़ी-बड़ी आँखों के ऊपर बड़ी-बड़ी पलकें. उनके इर्द-गिर्द अब झुर्रियां घिरने लगी थीं. ऐसा लगता था थकावट की वजह से उन्हें अपनी पलकें खोलने में भी कोशिश लगती थी और इसलिए वो उन्हें आधा ही खोलती थीं. उन्होंने अपनी नज़रें दोबारा हाथ में रखी तस्वीर की तरफ घुमा लीं. खिड़की का पर्दा खुला था. धूप की एक पतली लक़ीर उनके हाथ में रखी तस्वीर के ऊपर पड़ रही थी. वो तस्वीर को एकटक देखती रहीं. उन्होंने दोबारा मेरी ओर देखा. हालांकि डॉक्टर ने मुझे बताया था कि उनकी याद्दाश्त पर असर होगा लेक़िन कभी सोचा नहीं था कि मुझे ही न पहचानेंगी. उनकी आँखें मेरी आँखों के भीतर तस्वीर वाले कैलाश को ढूंढ रही थीं. उस बच्चे को जो एक छोटे से घर में किचन के सामने रखे बक्से पर बैठकर खाना खाता है जब उसकी मम्मी मिट्टी के तेल वाले एक स्टोव पर खाना बनाती है. जब वो कालिख़ खुरचने के लिए पिन उठाती है तो बच्चा कूदकर आता है कि मम्मी मैं करूँगा. वो पिन बच्चे को दे देती है, बच्चा उसे स्टोव में घुसेड़ता है और स्टोव अपनी धूधू की आवाज़ को तेज़ कर देता है. मेरे मन में ख़याल आया कि अगर मुझे नहीं पहचाना तो मैं उस तस्वीर वाले कैलाश को कहाँ से लाऊंगा? अगर मेरे मम्मी कहकर आवाज़ देने पर उन्होंने मेरी ओर देखना बंद कर दिया तो कैसे उन्हें यक़ीन दिलाऊंगा? लग रहा था हम दोनों एक-दूसरे को एक-दूसरे की आँखों में तलाश कर रहे थे. मुझे उनकी आँखों के कोने से एक बूँद उभरती दिखी. उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और कहा, "कैलाश! ऑफ़िस से आ गया बेटा"? मैंने उनके हाथों को उठाया और चूमते हुए कहा, "नहीं मम्मी! अभी ऑफ़िस जा रहा हूँ. सुबह के नौ बज रहे हैं". उन्होंने खिड़की से बाहर देखा और फिर सिर झुका लिया. दो बूँदें उनकी आँखों से निकलकर धूप के चकत्ते में ढुलक गईं. मैं कुर्सी से उठकर बिस्तर के किनारे बैठ गया और उन्हें गले लगा लिया. वो थोड़ी देर शांत चिपकी बैठी रहीं फिर अचानक फ़फ़ककर रोने लगीं. मैं उनकी पीठ पर हाथ फेरकर उन्हें चुप कराने लगा. हम दोनों बहुत देर तक ऐसे ही बैठे रहे.


एक रोज़ मैं किचन में ऑमलेट बना रहा था. वो एक इतवार की सुबह थी. मम्मी ने मुझे आवाज़ लगाई. मैं उनके कमरे में पहुंचा. उन्होंने दोबारा वही सवाल किया, "वो बक्सा कहाँ है जो भगवान् वाले कमरे के बाहर रखा था"? मुझे डॉक्टर की बात याद आई, "फ़ैक्ट्स पर नहीं फ़ीलिंग्स पर फ़ोकस करें". मैंने जवाब दिया, "मेरा एक दोस्त ले गया था, उसको शिफ्टिंग करने के लिए चाहिए था. कल-परसों तक वापस कर देगा". उन्होंने कहा, "उसमें मेरा सामान था. कहाँ है"? मैंने कहा, "सामान तो सारा यहीं रखा है. कुछ मेरी अलमारी में है, कुछ दीवान में. आप अलमारी देख लो पहले अगर मिल जाए नहीं तो मैं दीवान खोल दूंगा". मम्मी अगले आधे घंटे मेरी अलमारी टटोलती रहीं. फिर बोलीं, "नहीं मिल रहा. दीवान खोल दे". मैंने पूछा, "क्या सामान है"? उन्होंने कहा, "अरे, है मेरा कुछ सामान. तू बस दीवान खोल दे". मैंने दीवान खोल दिया. अगले एक घंटे तक दीवान टटोलती रहीं. मैं अपने कमरे में नाश्ता करने चला गया. लौटकर देखा तो दीवान खुला पड़ा था और मम्मी अपने पलंग पर लेटी थीं.


मैं नहीं चाहता था कि एक बक्से को लेकर में उनको बार-बार स्ट्रेस हो. दस साल पहले जो हेल्पर हमारे यहां काम करती थी वो अब पता नहीं कहाँ होगी. मैंने लोहार से वैसा ही एक दूसरा बक्सा बनवाने की सोची. दो दिन बाद नया बक्सा भगवान् वाले कमरे के बाहर रख दिया. पुराने समय की तरह ही उसमें कुछ गद्दे-रज़ाई और पुराने फ़ोटो एल्बम वग़ैरह डाल दिए.


एक दिन मुझे दोबारा ऑफ़िस में नर्स का फ़ोन आया, "आंटी को फिर आज पैनिक अटैक आया था. बक्से का सारा सामान उथल-पुथल कर दिया. कह रही थीं उनका कुछ सामान रखा था बक्से में. नहीं मिल रहा. मैंने पूछा भी कि क्या था सामान तो कुछ नहीं बताया. फ़िलहाल रिलैक्सेंट ले कर सो रही हैं". मैंने नर्स को कहा कि मम्मी का ध्यान रखे और फ़ोन काट दिया. फ़ोन कटने के बाद मैं सोचने लगा कि मम्मी क्या ढूंढ रही हो सकती हैं. हां, उनकी शादी का कार्ड तो रखा हुआ था उसमें. शायद वही ढूंढ रही होंगी. मुझे कार्ड का डिज़ाइन मोटा-मोटी याद था. मैंने ऑफ़िस में ही अपने लैपटॉप पर शादी का कार्ड बनाया. एक मोटे वाले काग़ज़ पर प्रिंटआउट लिया और उसको कार्ड के आकार में काट लिया. शाम को मैंने उसे बक्से के भीतर रख दिया और सोचा कि मम्मी को शायद और परेशानी ना हो. 


शुरुआत में हर घटना हमारे भीतर कुछ नई भावनाएं उकेरती है. लेक़िन फिर उन घटनाओं का बार-बार होते चला जाना, हर बार उन भावनाओं पर मशीनीपन की एक परत चढ़ा देता है. अंत में हम किसी मशीन ही की तरह उनपर अपनी प्रतिक्रियाएं देते चले जाते हैं. कुछ ही समय बाद मम्मी मुझे अक़्सर ही भूल जाया करतीं. मैं अक़्सर ही दूसरा हो जाता जबकि वो पहले को खोजती रहतीं. इसी तरह बक्से के भीतर भी हर कभी कुछ खोजने बैठ जातीं. मेरा अंदाज़ा ग़लत था. वो अपनी शादी का कार्ड नहीं ढूंढ रही थीं. वो क्या खोजती थीं कभी नहीं बताया उन्होंने.


उन्हें गुज़रे आज दो साल हो गए हैं. उनके जाने के बाद भी उनका शादी का कार्ड उसी बक्से में बंद है. एक दिन मैंने अपना फोटो फ्रेम भी उसी बक्से में डाल दिया. अगर मुझे पता होता कि वो बक्से में क्या ढूंढती थीं तो मैं वो भी बक्से में डाल देता.


मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा कि तुम उनसे मिल नहीं सकीं.

Saturday, April 2, 2022

हामिद


रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है. महीने का आख़िरी दिन है. आबिद अपने कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट के भीतर बैठा है. सामने मेज़ पर एक प्रोजेक्टर रखा है. ऊपर एक पंखा बेहिसी से मंडरा रहा है. सामने काले शेड वाला एक पारदर्शी दरवाज़ा है जिससे बाहर गुज़रती दुनियादारी दिख रही है. दरवाज़े के कोने में एक एग्जॉस्ट फैन भीतर की आंच को कम करने की नाक़ाम कोशिश कर रहा है. दायीं ओर एक शेल्फ़ है जिसके एक खाने में FM रेडियो रखा है. उसकी ही आवाज़ है जिसने आबिद को अपने अकेलेपन में ढहने से रोक रखा है. आबिद नज़रें उठा कर पंखे को देखता है. पंखे के झल्लों पर धूल की गहरी परत चढ़ गयी है. रेडियो से एक सर्द आवाज़ उठती है - "मेरा नाम... नीलेश मिस्रा है... और आप सुन रहे हैं... याद शहर...". आबिद कुर्सी से उठ कर रेडियो बंद कर देता है और प्लग निकाल कर उसे मेज़ पर रखे एक बैग में डाल देता है. कमरा एक ख़ामोशी ओढ़ लेता है. आबिद वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ जाता है. एक ठंडी निगाह प्रोजेक्टर पर डालता है. अपने हाथ की आड़ से अपने चेहरे को ढंक कर मेज़ पर गिरा देता है. तीन साल पहले बैंगलोर में अपनी नौकरी छोड़कर वो अपने सपने को जीने आया था. अपना ख़ुद का इंस्टिट्यूट. आज इंस्टिट्यूट का आख़िरी दिन है. तीन साल के उतार-चढ़ाव और फिर उतार के बाद आज उसमें ताला पड़ने वाला है. आबिद अपना आख़िरी बचा-कुचा सामान लेने आया था. यादों के शहर 'याद-शहर' की तरह रूमानी नहीं होते.

आज उसे इंस्टिट्यूट का बक़ाया किराया चुकता करना है. कल तत्काल में बैंगलोर की टिकट करवाना है. कुछ पैसे सदफ़ के हाथों में भी छोड़ने पड़ेंगे. बैंगलोर में PG में ठहरने के लिए भी कुछ पैसे चाहिए होंगे. वो मोबाइल में अपना बैंक अकाउंट टटोलता है. कैलकुलेटर पर कुछ हिसाब बुदबुदाता है. जब हमारे पास पैसे नहीं होते तो हम बार-बार एक ही हिसाब को अलग-अलग क्रम में दोहराते रहते हैं. आबिद मोबाइल को जेब में डालकर बाहर आता है; शटर गिराता है; ताला लगाता है; बैग पीछे टांगता है; और बाइक घुमा कर घर की ओर चल देता है. रीयर व्यू में उसे अपना इंस्टिट्यूट दूर छूटता नज़र आता है. वो पढ़ता है - "Objects in the mirror are closer than they appear". पीछे गुज़रती दुनिया उतनी दूर नहीं होती जितनी दिखाई पड़ती है. 

*****

गली के मुहाने से ही उसे घर के सामने एक काली स्कॉर्पियो नज़र आती है. मोहसिन आया है ईद मिलने. उसके कन्धों में एक थकावट उभरती है, एक भारीपन महसूस होता है. वो झुकने लगते हैं. मोहसिन आबिद का छोटा भाई था. एक वक़्त था जब सबको लगता था कि आबिद एक दिन कुछ बड़ा करेगा. वहीं मोहसिन के बारे में सब समझते थे कि बड़ा होकर अपनी दाल-रोटी ही चला ले वही बहुत होगा. कितनी ही रातें आबिद ने मोहसिन को पढ़ाते गुज़ारी थीं. घर के पीछे के कम्पाउंड में शाम ढले दोनों पतंगे पकड़ते थे और उनके पैरों में धागे बाँध कर हेलीकॉप्टर उड़ाते थे. घर के आंगन में वन-टिप-वन-हैण्ड खेलते थे. कूलर की हवा खिड़की की ओर करके अपने कमरे में सिगरेट पीते थे. रमज़ान की रातों में चुपके-से साइकिल पर शाहजहांनाबाद भाग जाते थे. रबड़ी-जलेबी और शर्बतों के स्टॉल, पान-सिगरेट के खोमचे, क़व्वालियों के मंच और उस चहल-पहल में इधर-उधर घूमते-भटकते आबिद-मोहसिन. दोनों के बीच दो ही साल का फ़ासला था. मोहसिन के लिए आज भी उतना ही था. आबिद के लिए दिनों-दिन बढ़ता जाता था. असफलताएं जब आती हैं तो तमाम कुंठाओं को चारों ओर से ढकेलती आती हैं. आज मोहसिन कितने ही रुपये ज़कात को नज़र कर देता है. क़ुर्बानी भी साल-दर-साल मोटी-से-मोटी होती जाती थी. वहीं दूसरी ओर काली स्कॉर्पियो देख कर आबिद को पहला ख़्याल यही आया कि महमूद को ईदी भी देनी पड़ेगी. महमूद मोहसिन का बेटा था. हामिद से कोई तीन महीने छोटा. हामिद आबिद का बेटा था.

आबिद स्कॉर्पियो के पीछे अपनी बाइक खड़ी करता है. हामिद और महमूद के रोने चिल्लाने की आवाज़ें आ रही हैं. मोहसिन, शमा और सदफ़ उन्हें शांत करा रही हैं.

मोहसिन - "महमूद! हामिद भाई आपसे बड़े हैं ना! शेयर कर के खेलते हैं. अच्छा चलो दोनों बारी-बारी उड़ाओ"

सदफ़ - "हामिद झगड़ा नहीं करना है! नहीं तो अभी बंद कर दूंगी कमरे में! सारी ईद निकल जाएगी!"

शमा - "महमूद! रिमोट हामिद भाई को दो!"

आबिद कमरे में दाख़िल होता है. शमा ने महमूद को पकड़ रखा है और सदफ़ ने हामिद को. ज़मीन पर एक ड्रोन खिलौना पड़ा है. मेज़ पर एक iPad रखा है जिसमें ड्रोन की तस्वीरें स्ट्रीम हो रही हैं. महमूद के हाथ में एक रिमोट है. मोहसिन आबिद को देखकर बाहें खोलता हुआ आगे बढ़ता है. उसने एक काली शर्ट पहन रखी है जिसके बटन उसके बढ़ते पेट से टूटते-टूटते लगते हैं. हमेशा की तरह घनी मूछें और हल्की दाढ़ी. हमेशा एयर कंडीशंड माहौल में रहने से चेहरे पर भी एक चमक आ गयी है. उसने बालों में बरगंडी कलर लगवाया है. मूंछ को भी डाय किया है. परफ़्यूम की भीनी-भीनी ख़ुशबू. आबिद कभी परफ़्यूम या डीयो नहीं लगता था. उसे अपने शरीर से पसीने की महक उठती लगती है. 

मोहसिन - "ईद मुबारक़ भाई! ईद मुबारक़!"

आबिद - "मुबारक़! मुबारक़!"

शमा भी मोहसिन के पीछे पीछे आती है - "ईद मुबारक़ भाईजान!"

"बहुत बहुत मुबारक़! और! सब ख़ैरियत!"

"दुआ है!"

तभी महमूद आबिद के पास आता है और उसके पैरों से लिपट जाता है - "ईद मुबालक चाचू!"

आबिद - "भोत भोत मुबालक बेटा जी!"

महमूद - "ईदी! ईदी!"

आबिद - "अच्छा! अच्छा!"

आबिद एक नज़र सदफ़ की ओर उठाता है. दोनों की नज़रें मिलती हैं. आबिद नज़रें हटाकर जेब से पर्स निकालता है. एक 500 का नोट निकाल कर महमूद की हथेली पर रखता है और अपना गाल आगे बढ़ाता हुआ कहता है - "औल अब हमाली ईदी!"  महमूद उसके गाल पर एक पप्पी देकर भागने लगता है. आबिद उसे पकड़ने की झूठमूठ कोशिश करता है - "अरे! अरे! भागता कहाँ है बदमाश छोकरे!" महमूद भाग जाता है. दोनों भाई सोफ़े पर बैठ जाते हैं.

मोहसिन - "इंस्टिट्यूट से आ रहे हैं?"

आबिद - "हाँ यार आज आख़िरी दिन था. कुछ सामान पड़ा था वहाँ तो ईदगाह से सीधा वहीं निकल लिया."

"बैंगलोर जा रहे हैं?"

"हाँ यार! यहां तो तुम देख ही रहे हो!"

"कब निकल रहे हैं?"

"बस यार! अब निकलते ही हैं. कल ही तत्काल में ट्राई करने की सोच रहा हूँ."

"मैं नूरे को भेज दूँ? वो काउंटर से निकलवा लाएगा! ऑनलाइन का ऐसे भी कोई भरोसा नहीं!"

"अरे कोई ना! आजकल तो आराम से हो जाता है! उन लोगों ने अपनी वेबसाइट भी नई बनवा ली है. हो जाएगा."

तभी पीछे से महमूद और हामिद के झगड़े की आवाज़ें आती हैं - "मेला है!"; "मुझे चाहिए!"; "मेला है!"; "मुझे चाहिए!". हामिद महमूद के हाथ से खिलौना छुड़ाने की कोशिश कर रहा है. महमूद खिलौने वाला हाथ पीठ के पीछे किये हामिद से उसे बचाने की कोशिश कर रहा है. हामिद महमूद की पीठ की ओर जाने की कोशिश करता है. महमूद तेज़ी से मुड़ता है और खिलौना हामिद के सिर पर दे मारता है. हामिद ज़ोर से रोने लगता है. शमा और सदफ़ दोनों को अलग करने दौड़ती हैं.

शमा - "महमूद! क्या बदतमीज़ी है ये! आज घर चलो तुम! बताती हूँ तुमको! सारी ईद न निकाली तो कहना!"

सदफ़ - "अरे जाने दो शमा! बच्चे हैं!"

शमा - "बच्चे-बच्चे कर-कर के ही तो ये गुर निकल आए हैं! आज बताती हूँ तुमको!"

महमूद ज़ोर से चिल्लाता है - "मेला है!"

शमा एक चांटा जड़ देती है उसके गाल पर. ड्रोन ज़मीन पर गिर जाता है. 

"बहुत मेरा मेरा सूझ रहा है तुमको! हज़ार बार समझाया मिलके खेलो! समझ नहीं आती!"

उधर हामिद रो-रो कर दोहरा हुआ जा रहा है. आबिद आगे बढ़ कर सदफ़ की गोद से उसे ले लेता है - "आलेलेलेलेले! क्या हुआ मेले बच्चे को!"

हामिद रोते हुए जवाब देता है - "मुझे चाहिए". उसकी उंगली ज़मीन पर पड़े ड्रोन की ओर निशाना बनाती है. आबिद उसके पीठ पर हाथ फेरता है - "अच्छा ठीक है! पापा शाम को ले के आएंगे. अब चुप हो जाओ चलो!" सदफ़ आबिद को देखती है. इतने में मोहसिन भी महमूद को समझाने लगता है - "महमूद! आप ये वाला हामिद भाई को दे दो! अपन घर जाते वक़्त नया वाला ले लेंगे आपके लिए! हैं! नया वाला!"

महमूद - "नहीं! ये मेला है!"

आबिद - "अरे बच्चे हैं! इतनी आसानी से थोड़े ही छोड़ेंगे. हाहा!"

मोहसिन - "अरे! इनके पास ढेर खिलौने हैं लेकिन जी ही नहीं अघाता!"

आबिद - "अरे उमर है खेलने की! फिर का बुढ्ढे होके खेलेंगे! इसे तो मैं ला दूंगा शाम को! क्यूँ! ठीक है ना बेटा जी!"

*****
मोहसिन, शमा और महमूद जा चुके हैं. हामिद आज बहुत रोया ख़ासकर तब जब महमूद अपना खिलौना लेकर अपनी गाड़ी में बैठ गया. आबिद हामिद को गोद में लिए कमरे में इधर-उधर टहल रहा है. उसकी पीठ पर थपकियाँ देकर उसे सुलाने की कोशिश कर रहा है - "आओ तुम्हें चाँद पे ले जाएँ... प्यार भरे सपने सजाएं... छोटा-सा बंगला बनाएं... एक नई दुनिया सजाएं... होओओओ...". धीरे-धीरे हामिद की पलकें भारी होने लगती हैं और आहिस्ते-आहिस्ते वो नींद की दुनिया में खो जाता है. आबिद उसे बहुत सावधानी से कंधे से उतार कर बिस्तर पर लिटा देता है और एक चादर ओढ़ा देता है. सदफ़ बिस्तर के बाजू में रखी कुर्सी पर बैठ जाती है. हामिद के सोते ही कमरे में एक ख़ामोशी तैरने लगती है. सदफ़ आबिद की ओर 500 का नोट बढ़ाती है - "मोहसिन ने आबिद को दिए थे". आबिद नोट को अपने हाथ में ले लेता है. सदफ़ हामिद की मुंदी पलकों को देख रही है. एक हाथ से उसके सिर को सहलाने लगती है. आबिद गर्दन झुकाये नोट को देख रहा है. दोनों जानते हैं - 'महमूद बच्चा है. बच्चे अपनी चीज़ों को लेकर थोड़े possessive होते हैं. बच्चों की बातों को क्या दिल से लगाना.' लेक़िन आबिद को भीतर ही भीतर कुछ अखर रहा है. आज अगर उसकी नौकरी होती तो क्या ईद इस तरह आती और चली जाती! उसने अपने सपने की ख़ातिर अपने बच्चे को एक अदद बचपन से वंचित कर दिया था. 

आबिद उठता है. नोट को अपने पर्स में डालता है और बाहर की ओर चल देता है. सदफ़ हामिद को ही देखती रहती है. थोड़ी देर में बाइक स्टार्ट होने की आवाज़ उसके कानों में पड़ती है.

*****

चिलचिलाती धूप में उसकी बाइक पीप-पीप और पोंप-पोंप की आवाज़ों के बीच सड़कों के स्पीड-ब्रेकरों और सिग्नलों को पार करती हुई चली जा रही है. हेलमेट के भीतर पसीना उसके माथे से चलकर उसकी नाक से होता हुआ उसके होंठों पर चढ़ा आ रहा है. बीच-बीच में वो एक हाथ से उसे पोंछता है और अपनी ज़ुबान पर नमक को महसूस करता है. गाड़ियों की चिल्ल-पों से परे उसे नेपथ्य से एक आवाज़ सुनाई देती है - "महमूद! आप ये वाला हामिद भाई को दे दो! अपन घर जाते वक़्त नया वाला ले लेंगे आपके लिए! हैं! नया वाला!".

वो प्रेस्टीज मॉल के सामने पार्किंग में बाइक खड़ी करता है. मॉल हमेशा की तरह जगमगा रहा था. Main entrance से भीतर घुसते ही ठीक सामने एक कार बीचों-बीच खड़ी है. पीछे की तरफ दो-एक स्टॉल लगे हैं. कार के इर्द-ग़िर्द लोग चहलक़दमी कर रहे हैं. कुछ लोग सेल्फ़ियां ले रहे हैं. दीवारों से बड़े-बड़े पोस्टर लगे टंगे हैं जिनमें ईद के लिए शेरवानियाँ पहने मॉडल खड़े हैं. सबके चेहरों पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कानें. एक बड़ी-सी स्क्रीन पर इश्तेहार चल रहे हैं. बीच-बीच में उसपर भी ईद की बधाइयां चमकती हैं. आबिद दूसरे माले पर जाने के लिए एस्केलेटर की ओर रुख़ करता है. एस्केलेटर के सामने एक कॉफ़ी शॉप जहां लोग अपने लैपटॉप और टेबलेट्स को रखे कुछ बहुत महत्वपूर्ण काम करते प्रतीत हो रहे हैं. उसके इस बाजू एक केक-शॉप है. कॉफ़ी और बेकरी की ख़ुश्बुएं आपस में मिल कर माहौल को काफ़ी पारलौकिक बना रही हैं. आबिद एस्केलेटर पर क़दम रखता है. मोबाइल पर एक बार फिर कैलकुलेटर खुल जाता है. तमाम संख्याएं संभावनाओं से निकल-निकल कर कीपैड पर अवतरित होने लगती हैं. दूसरी मंज़िल आ गयी. मोबाइल दोबारा लॉक हो जाता है. हिसाब अधूरा छूट जाता है. अभाव में हिसाब कभी पूरे नहीं होते.

आबिद एस्केलेटर से उतर कर एक रेलिंग से सट कर खड़ा है. दूर एक टॉय शॉप है. ऊपर LED लाइटों से लिखा है - "Toy World", खिलौनों की दुनिया. बाजू में एक बाउन्सी कैसल है. हवा से फुलाया हुआ एक क़िलेनुमा गुब्बारा जिसपर बच्चे कूद रहे हैं. बाहर उनके मां-बाप झाँक-झाँक कर उन्हें देख रहे हैं. कोई फ़ोटो खींच रहा है, कोई वीडियो बना रहा है तो कोई बार-बार तसल्ली कर रहा है कि बच्चा कहीं इधर-उधर तो नहीं चला गया. बाहर एक बैनर टंगा है - "50 रुपये/20 मिनट". वहीं वन-व्हील वाले एक चक्के पर बच्चों को 100-100 रुपये में राउंड लगवा रहे हैं. कुछ बच्चे ड्रैगन के मुंह वाली टॉय ट्रेन में सवारी कर रहे हैं - "50 रुपये में 1 चक्कर"

"महमूद! आप ये वाला हामिद भाई को दे दो! अपन घर जाते वक़्त नया वाला ले लेंगे आपके लिए! हैं! नया वाला!"
वो टॉय वर्ल्ड की ओर चल देता है. टॉय वर्ल्ड अपने नाम के मुताबिक़ सच में एक दुनिया ही थी. सबसे आगे सॉफ्ट टॉयज़. छोटे, बड़े, कुछ वॉल्ट डिज़्नी की दुनिया से आए हुए, कुछ जापानी एनिमे की दुनिया से तो कुछ ऐसे ही सदाबहार - कुत्ता, बिल्ली, भालू. रंग-बिरंगे, चितकबरे, बटनों की आँखों में काली डोलती बुंदी से देखते हुए. उनके आगे कॅरक्टर टॉयज़. स्टार वार्स, ट्रांसफॉर्मर्स, टॉय-स्टोरी, डोरेमोन और छोटा भीम तक. चारों ओर उनके पोस्टर लटके हुए अपनी पोस्टरी आँखों के टशन से बच्चों को बुलाते हुए. उनके आगे बोर्ड गेम्स, पज़ल्स और फिर हाई-टेक सेक्शन. आबिद उस सेक्शन में रुक जाता है. एक आदमी रिमोट पकड़े ड्रोन उड़ा के दिखा रहा है. सामने एक स्क्रीन है जिसमें ड्रोन-कैमरे की लाइव स्ट्रीमिंग चल रही है. ड्रोन पूरे सेक्शन में इधर-उधर उड़ रहा है. आबिद स्क्रीन के सामने खड़ा हो जाता है. उसे अपनी तस्वीर स्क्रीन पर दिखाई पड़ती है. पसीना सूखने से उसके बाल चिपक गए हैं और उसकी शर्ट पर सफ़ेद दाग़ पड़ गए हैं. वो अपने हाथों से अपने चिपके बालों को ढीला करता है. ड्रोन उड़कर पीछे से उसकी तस्वीर दिखाने लगता है. उसके कॉलर से धागे निकलने लगे थे. उसने शेल्फ़ पर से एक ड्रोन खिलौना उठाया. उसे अनुमान से काफ़ी हल्का लगा. उसने डिब्बे को घुमा कर देखा - 4999 रुपये. उसने सिर उठाकर आजू-बाजू देखा. रिमोट वाला आदमी उसकी ओर देख रहा था. उसने डिब्बा दोबारा शेल्फ में रख दिया और जेब से मोबाइल निकालकर उसमें उंगलिया चलाने लगा. हवा में तैरता ड्रोन एक बार फिर उसके सामने आया. इस बार उसे स्क्रीन में ढीले-चिपके बालों वाला एक भावशून्य आदमी दिखा जिसके मोबाइल में कैलकुलेटर खुला था. आबिद ने उसे देखते ही अपना मोबाइल लॉक किया और रिमोट वाले आदमी की ओर देखा. दोनों की नज़रें मिलीं और स्क्रीन पर अगले सेक्शन का चित्र उभरा - "क्लासिक ऑटोमेटा", चाभी वाले खिलौने. उसे अपने पैरों में एक कंपन महसूस हुई और दिल में एक ग्लानि. उसने एक बार फिर रिमोट वाले आदमी को देखा. रिमोट वाले आदमी ने धीमे-से पलकें मूंदते हुए 'हां' में सिर झुकाया. आबिद उस सेक्शन की ओर चल दिया. उसे अपने पैर काफ़ी भारी महसूस हो रहे थे.

चाभी वाले खिलौनों के सेक्शन में काउंटर पर ही एक घेरा बना था. बाज क़िस्म के खिलौने उस घेरे में खेलकूद कर रहे थे. एक दूसरा आदमी खिलौनों में चाभी लगाता और उन्हें उस घेरे में रख छोड़ता. एक बन्दर हाथों में मंजीरे बजाता और कुलाटी लगाता. एक ट्रेन अपनी पटरियों पर इधर से उधर जाती. कुछ कारें इधर-इधर भागतीं और फिर घेरे की मेड़ पर अपने सिर को पटकतीं. हामिद की नज़र शेल्फ पर रखे एक हवाईजहाज़ पर पड़ी. उसने उसे उठाया और पलटाकर देखा - 49 रुपये. उसके मन में एक टीस उठी. 

"अच्छा ठीक है! पापा शाम को ले के आएंगे. अब चुप हो जाओ चलो!" 

वो कैश काउंटर पर 50 का एक नोट निकालता है और हवाईजहाज़ लेकर उस दुनिया से बाहर आता है. एक बार पीछे मुड़कर देखता है. रिमोट वाला आदमी उसे देखकर मुस्कुराता है. बदले में वो भी मुस्कुरा देता है. एस्केलेटर से नीचे उतरते वक़्त उसके दिल में कोई हिसाब नहीं चल रहा. सामने कुछ बच्चे आइसक्रीम खा रहे हैं. वो सीधे मेनगेट से बाहर की ओर निकल जाता है. बाहर तेज़ धूप में आते ही उसे राहत महसूस होती है. वो अपनी बाइक पर बैठकर हेलमेट पहनता है. उसके ढीले हुए बाल फिर से चिपकने लगते हैं. 

"अगर महमूद अपना खिलौना हामिद को दे देता तो भी क्या उसे ग्लानि होती?"

वो अपना रुख़ घर की ओर करता है.

*****

आबिद दरवाज़े के बाहर बाइक खड़ी करता है. हामिद जाग चुका था. उसकी और सदफ़ की आवाज़ें बाहर तक आ रहीं थीं. वो शायद उसको खाना खिला रही थी. आबिद बाहर के कमरे में आता है और डिब्बे से हवाईजहाज़ को निकालता है. अब वो हामिद के कमरे के दरवाज़े की आड़ में खड़ा है. उसे अपने घुटनों में जकड़न महसूस हो रही है.

"अच्छा ठीक है! पापा शाम को ले के आएंगे. अब चुप हो जाओ चलो!"

उसने कुछ वादा किया था. कहीं ये चाभी वाला खिलौना देखकर वो रोने ना लगे. कहीं वो इसे फेंक ही न दे. उसे अंदर से आवाज़ आई - "मम्मा! पापा कहाँ गए?"

"पापा आपके लिए कुछ सरप्राइज़ लेने गए है!"

आबिद सुन रहा है. वो अपने हाथों में रखे सरप्राइज़ को देखता है. उसके गले में कुछ उठता है. वो ऊपर की ओर देखता है और कुछ बुदबुदाता है. शायद हामिद के लिए किसी दुआ की मनोकामना. वो हवाईजहाज़ को भीतर की ओर धकेल देता है. हवाईजहाज़ चिर्र-चिर्र रेंगता हामिद के पास पहुँच जाता है - "पापा आ गए! पापा!"

आबिद दरवाज़े से निकलता है - "ये हवाईजहाज़ किछ पायलेट का है? हैं! हैं!"

"मेला"

हामिद हवाईजहाज़ उठा लेता है और अपना हाथ हवा में उठाकर दौड़ने लगता है - "छुईंईंईं..... छुईंईंईं.....". वो अपनी उड़ान में अपने मां-बाप की तमाम ग्लानियों और कुंठाओं को दूर ले जा रहा है. आबिद और सदफ़ एक बचपन के आश्रय में पनाह पाने के लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ रहे हैं. 

Saturday, March 28, 2020

मूर्ख बंदर - पंचतंत्र

एक राजा को एक बंदर इतना अच्छा लगा कि उसने अपनी हिफाज़त के लिए अपने सैनिकों को हटाकर उसे तैनात करवा लिया।एक दिन सोते वक़्त एक मक्खी राजा के ऊपर आ कर बैठ गई।
चौकीदार बंदर ने राजा की तलवार उठा कर मक्खी पर हमला कर दिया।
मक्खी उड़ गई।
राजा मर गया।
किसी ने कहा कि बंदर के intentions अच्छे थे, बस execution में कसर रह गई।


Thursday, March 5, 2020

गुल्लक




गली के मुहाने से मुड़ते हुए एक बारगी वो पहचान ही नहीं पाया कि ये वही गली है। उसने मुड़कर पीछे देखा। दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था। पुलिस की गश्त का सायरन दूर किसी और सड़क पर बज रहा था। मेन रोड पर आड़ा पड़ा पीला बैरिकेट, सड़कों पर बिखरे पत्थर और काँच के टुकड़े, और उन सबके बीच घुप्प अंधेरे के लिए नाकाफ़ी से खड़े बेजान पीली रोशनी के खंबे। शाम से ही कर्फ़्यू लगा हुआ था - शूट एट साइट के ऑर्डर्स थे! वो गली की तरफ दोबारा मुड़ा। दोनों बाजू बने मकानों की कतारों पर नज़र डाली। दीवारों पर धुएँ की कालिखें। चारों तरफ़ धुएँ के बादल जिसमें ये पता लगाना तक मुश्किल था कि वो किस घर से उठ रहा था। गली का रास्ता मलबे से पूरी तरह पट चुका था। ईंट, पत्थर, शीशे, लोहे के टूटे दरवाज़े, टीन की छतें, टायर, लोहे के सरिये, टूटी कुर्सियाँ, टेबलें, ज़िंदगियाँ!

दीवार से सटे अंधेरे में दबे पाँव वो आगे बढ़ता चला गया। बीच-बीच में उसका पैर मलबे के किसी डिब्बे या टीन पर पड़ जाता। एक आवाज़ होती और वो वहीं ठहरकर खुद को बिना हिले-डुले अंधेरे में छुपाने की कोशिश करता। जब यक़ीन हो जाता कि कोई नहीं है तब दोबारा आगे बढ़ता। एक के बाद एक अंधेरे मकान। कुछ ख़ाली थे और बाक़ी अपनी लाइटों और खिड़कियों को बंद किए भीतर से कुंडे हुए। अंधकार जब किसी आबादी की नियति बन जाता है तो क्या जीवित क्या मृत वो सभी के हिस्से आता है।

वो चलते-चलते एक मकान के सामने आ कर रुक गया। भीतर से धुआँ अभी भी उठ रहा था। उसने मुड़कर गली के दोनों किनारे देखे और भीतर घर में घुस गया। घुप्प अंधेरा! कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। उसने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाई, एक मुरझाई सी रोशनी में घर की कालिखों को टटोला और टॉर्च को दीवार में बने एक आले में रख दी। जगह-जगह राख़ के ढेर और उनके बीच से उठता धुआँ! काँच के टुकड़े चारों तरफ बिखरे पड़े थे। फर्नीचर जल चुका था। पंखों के झल्ले मुड़ गए थे। बाहर के कमरे के बीचों-बीच तीन गैस सिलेन्डर पड़े थे। दो खड़े, एक आड़ा। खिड़कियाँ सारी जल चुकीं थीं। टॉर्च लिए-लिए वो एक आईने के सामने आया। अपनी हथेली से उसकी कालिख हटाई। आईने में एक चेहरा उठा। वो थोड़ी देर उसे देखता रहा। फिर उसने अपनी टॉर्च उठाई और भीतर के दरवाज़े की ओर चल दिया। दरवाज़े के बीचों-बीच पहुँच कर वो ठहर गया। उसने अपनी एड़ियाँ उठाई और वजन पंजो पर लेते हुए एक हाथ से दरवाज़े के ऊपर बने आले में कुछ टटोला। एक लोहे के गरम डिब्बे पर उसका हाथ पड़ा। उसने उसे खींचा लेकिन गरम होने की वजह से वो उसे पकड़ नहीं पाया। डिब्बा नीचे गिर गया। ज़ोर की आवाज़ हुई। उसने फर्श पर टॉर्च घुमाई। वो एक गुल्लक थी। उसने अपने जेब से एक रुमाल निकाला और उसे पोंछा। उसकी आँखों से दो आँसू गरम राख़ के ढेर पर पड़े और ग़ायब हो गए।

ये उसका घर था!

एक दिन एक भीड़ आई और उससे उसका सब कुछ छीन कर ले गई।उसका घर, उसकी ज़िंदगी, उसका बच्चा।

वो दोबारा लौटा था। रात के अंधेरे में। कुछ ढूँढने की ख़ातिर।

सब कुछ खत्म हो जाने के बाद...आख़िरी निशानी की एक छोटी-सी तमन्ना की ख़ातिर।

Sunday, January 26, 2020

नेताजी




वे कोई बहुत बड़े नेता नहीं थे। अपने मोहल्ले में ही ज़्यादातर नेतागिरी चलती रहती थी। और नेतागिरी भी क्या! छुटभैयापन कहिए। पढ़ाई उन्होनें बीच में ही छोड़ दी थी तो कानून की ज़्यादा समझ थी ही नहीं। उनकी युगदृष्टि में नेता होने का अर्थ दबंग से अधिक नहीं था। प्रजातन्त्र में विधायिका की ज़िम्मेदारी के बारे में उन्होनें कभी कोई चिंतन नहीं किया था। वे चुनाव-प्रचारों पर मरे-मिटे जाते थे। उनके लिए नेतागिरी की सफलता तो तभी थी जब विपक्षी उम्मेदवार की ज़मानत ज़ब्त हो जाए। उन्होनें पार्षदी का चुनाव भी ऐसे लड़ा था जैसे कोई प्रधानमंत्री का चुनाव हो।

मोहल्ले की चौपाल पर भाषण देने के लिए भी वो कई-कई बार रिहर्सल करते। मोहल्ले की मस्जिद के मौलवी से ऊर्दू मिश्रित हिन्दी में मैटर तैयार करवाते। भाषण के बीच-बीच में शेर-ओ-शायरी के भी छींटे होते ताकि लोग बिलकुल भी ऊब महसूस ना कर सकें। उनके पार्षदी के चुनावी भाषण में भी देश की सीमा पर लड़ रहे जवानों का ज़िक्र होता, पाकिस्तान का ज़िक्र होता। अगर कोई ऑफ-स्टेज उनकी हिपोक्रिसी की ओर ध्यान दिलाता तो वे कहते कि भैये! चुनाव लड़ना, भाषण देना एक आर्ट है और हर आर्ट का एक शिल्प होता है और हर शिल्प के अपने एलेमेंस्ट्स (elements) होते हैं। जैसे बिरयानी में बग़ैर दम के कोई दम नहीं रहता, वैसे ही पाकिस्तान के बिना चुनावी भाषण का भी दम निकल जाता है।

ख़ैर! नेताजी पार्शदी का चुनाव जीत गए, लेकिन उसके बाद उन्हें समझ आया कि केवल छिटपुट-छिटपुट पाकिस्तान-पाकिस्तान करने से कुछ नहीं होगा! थोड़ा अग्रेशन लाना होगा। उन्होनें प्रदेश की राजधानी के दफ़्तर में आवागमन बढ़ाया। जब भी राजधानी में किसी पुस्तक-विमोचन का विरोध करना हो, कोई बंद ओरगानाइज़ करवाना हो या कोई पुतला जलाना हो नेताजी ओवरनाइट ट्रेन से राजधानी पहुँच जाते। प्रदेश-अध्यक्ष जी के भाषणों को वे बार-बार सुना करते। अपने भाषणों की रचना पर भी विशेष ध्यान देते। देश के ताज़ा मुद्दों पर एक दो भाषण तो हमेशा ही रेडी रखते। अपने भाषण के मैटर के लिए अध्यक्ष जी के तमाम भाषण और साक्षात्कार चाट डालते। लेकिन एक पार्षद चाहकर भी कितने ही भाषण दे पाता।

एक दिन उन्होनें एक नई स्ट्रेटजी के तहत लोकल न्यूज़ चैनल को एक मूर्खतापूर्ण बयान दे ही डाला। सोशल मीडिया में लोग खिल्ली उड़ाने लगे, उनके नाम पर चुटकुले और मीम्स (memes) बनने लगे। विपक्ष ने उनको प्रॉक्सी ले कर उनकी पार्टी को मूर्खों की पार्टी घोषित करने का ट्विटर-आंदोलन छेड़ दिया। कुछ कार्टून आर्टिस्टों ने तो ऐसे कार्टून बनाए जिनमें नेताजी और अध्यक्ष जी दोनों को एक ही फ्रेम में डाल दिया। नेताजी तो ख़ैर एक मामूली पार्षद थे, असल खिल्ली तो अध्यक्ष जी की उड़ रही थी।

और इस तरह नेताजी अध्यक्ष जी की नज़रों में आ ही गए। अध्यक्ष जी ने जब अख़बारी कार्टून और सोशल मीडिया मीम्स देखे तो चंद गुर्गे लगा दिये नेताजी के मूर्खतापूर्ण बयान को डिफेंड करने के लिए। यही मौका था कि जब पार्टी के आईटी सेल में नेताजी के चर्चे होने लगे। नेताजी ने तत्काल एक ओजस्वी वीडियो बनाया जिसमें पाकिस्तान को प्रॉक्सी लेकर मुसलमानों को दिल खोल कर गालियां दीं। नेताजी सोशल मीडिया में छाने लग गए। सेनसेशनल बनते ही नेताजी की महत्त्वाकांक्षाएँ कुलांचें मारने लग गईं। विधान सभा चुनाव आए, टिकट वितरण हुआ लेकिन तब पार्षद जी को उनकी औक़ात दिखा दी गई।

नेताजी टिकट ना मिल पाने से निराश तो ज़रूर हुए लेकिन अगले ही दिन विपक्षी ख़ेमे में चले गए। विपक्षी ख़ेमा पिछले कई चुनावों से ये सीट हार रहा था। कोई भी स्थापित कार्यकर्ता इस सीट पर लड़ना नहीं चाहता था। नेताजी को टिकट तो आसानी से मिल गया। लेकिन विपक्षी खेमा अपने आपको सेकुलर-सेकुलर चिल्लाता था। नेताजी ना तो सीमा के सैनिकों की दुहाई दे पा रहे थी, ना पाकिस्तान को प्रॉक्सी लेकर हिन्दू-मुसलमान ही कर पा रहे थे। उनकी बोली में कहें तो उनकी बिरयानी में दम चढ़ ही नहीं पा रहा था। विपक्षी उम्मीदवार ने दिल खोलकर पाकिस्तान-पाकिस्तान किया और नेताजी को पाकिस्तानी एजेंट तक बता डाला।

नेताजी की ज़मानत ज़ब्त हो गई।

Friday, June 28, 2019

नानी




धड़ाक! रोज़ की तरह आज सुबह भी अख़बार इसी आवाज़ के साथ मेरे दरवाज़े से टकराया। अख़बार के एडिटोरियल पन्ने पर छपे अपने लेख को देखकर लगा कि वक़्त के तालाब में एक लहर मुझसे आ टकराई है। इतने दिन इस क़दर मसरूफ़ रही कि तुम्हें कुछ बताने का वक़्त ही नहीं मिला। आज छपे इस लेख की कहानी शुरू हुई थी पिछले महीने। एक उमस भरी भारी सुबह जब मैं प्रवीण के साथ घर वापस लौटी थी। ज़िंदगी की वो पहली रात थी जो मैंने जेल में काटी थी। प्रवीण रात भर जेल के बाहर ही रहा। गाड़ी उसने ठीक मेन गेट के सामने ही रोकी। मेन गेट की डलिया में दूध के पैकेट पड़े थे। गेट के भीतर सुबह का अखबार। आँगन की लाइट जल रही थी। पानी की टंकी ओवेरफ़्लो हो रही थी। गाड़ी से उतरते ही सबसे पहले मेरे दिमाग में अख़बारी दुनियादारी घूमने लगी। मैं सोचने लगी कि इसमें मेरे बारे में क्या छपा होगा! तभी मेरे निगाह बालकनी की मुंडेर पर बैठे एक नीलकंठ पर पड़ी। मुझे नानी की याद आ गई। वो कहती थी कि नीलकंठ शंकर भगवान का प्रतीक है। जब भी वो दिखे उसके हाथ जोड़ो। सहसा मुझे लगा कि क्या मैं प्रतीकों में यक़ीन करने लगी हूँ! या फिर ये एक भारी मन की सनक से ज़्यादा कुछ नहीं था। प्रवीण लगातार बोलता ही जा रहा था। लगता था कि उसने अपने मुंह को किसी मटके में बंद कर लिया था और मेरे भारी मन पर चढ़ा कोई भारी भरकम डिफ़्लेक्टर उसकी मटमैली तरंगों को पृष्ठभूमि में भेजता जा रहा था। वो कहता जा रहा था कि परेशान होने की कोई बात नहीं है। हम लोग हार नहीं मानेंगे। अभी और भी बहुत कुछ करना है। और उसने ये भी बताया कि उसने शाम को कोई मीटिंग भी रखी है।

जीवन में कभी जेल भी जाना पड़ेगा, ऐसा ख़याल कभी सपने में भी नहीं आया था। माध्यम-वर्गीय परवरिश में जेल की अवधारणा के साथ एक अपराध की अवधारणा भी जोड़ दी जाती है। लेकिन परवरिश ख़त्म होने के बाद दुनियादारी आते आते आती है। समझ आता है कि एक चीज़ अपराध है और एक चीज़ जेल। और कई बार तो इन दोनों का आपस में कोई तआल्लुक भी नहीं होता। अपराधी अगर एक अरबपति घोटालेबाज़ हो तो वो विदेश जा सकता है और शान-ओ-शौकत से रह सकता है। सरकार के मंत्री खुद उन्हें सी-ऑफ करने एयरपोर्ट तक जा सकते हैं। अपराधी अगर कोई राजनेता हो तो हो सकता है कि वो आपको सदन के भीतर गरीबी और भुखमरी पर चिंता व्यक्त करता मिल जाये। और अगर जो अपराधी कोई मल्टी-बिलियन कॉर्पोरेट घराना हुआ, तब तो सरकार ख़ुद अपनी पूरी सैनिक ताक़त अपनी ही अवाम से उनके जंगल और उनका पानी छीनने के लिए झोंक सकती है। राजद्रोह जैसे क़ानून से सरकारें अपने खिलाफ उठती आवाज़ को दबा भी सकतीं हैं और आवाज़ उठाने वाला तुरंत ही एक अपराधी घोषित हो जाता है। मानहानि के क़ानून से उद्योगपति अपने खिलाफ उठती उँगलियों को अपने ही स्तर पर मरोड़ सकते हैं। और तंत्र के इस तरकश का ब्रम्हास्त्र – अदालत की अवमानना का क़ानून। अदालतें अपनी आलोचना को जैसे चाहें वैसे कुचल सकतीं हैं। उसके फ़ैसलों की समीक्षा में सिर्फ उसकी तारीफ के क़सीदे पढे जा सकते हैं। जो आलोचना है भी तो बहुत ज़रूरी है कि कौन कर रहा है ये आलोचना! कहीं कोई ऐसा तो नहीं जो मज़लूमों के हक़ में कुछ रहा हो जो कॉर्पोरेट के खिलाफ जा रहा हो। कहीं कोई ऐसा तो नहीं जिसके पास अपना ख़ुद का एक दर्शक/पाठक वर्ग हो! रात भर मैं जेल में यही सब सोचती रही। और अपने उस लेख के बारे में भी सोचने लगी जो मेरे दराज़ में पड़ा प्रिंट में जाने का इंतज़ार कर रहा था। मुझे मालूम था कि इस एक रात की क़ैद का तमाशा मुझे डराने के लिए रचा गया था। मैं वाक़ई डर गई थी।

जब मैं प्रवीण की गाड़ी से उतर रही थी, तब हमारे बाजू से एक सफ़ेद रंग की सिडैन गाड़ी गुज़री। उसकी आधी खुली खिड़की से एक धुन सुनाई दी। धुन बेहद हल्की थी और सिर्फ चंद सेकंडों तक ही वो सुनाई दी। ऐसा लगा कि वो धुन मेरे अतीत से आ रही हो। मुझे पक्का यकीन था कि बचपन में नानी के घर में इस धुन का गाना मैंने सुना था। गाड़ी दूर जा रही थी और मेरे इंद्रियाँ उस धुन का पीछा करने की कोशिश कर रहीं थीं। गाड़ी का ओझल होना जैसे एक अपशगुन सा लगा। लगा कि वो तरंगें मेरे भीतर से कुछ ले कर चली गईं। भारी मन की एक और सनक? धुन के ओझल होते ही प्रवीण की मटमैली दलीलें दोबारा फ़ोरग्राउंड पर मचलने लगीं। मैंने उसकी जवाबी कारवाही की दलीलों को बीच में ही काटते हुए पूछ – तुम्हें ये धुन याद है? किस गाने की है?’
- धुन? कौन-सी धुन?’
- अच्छा अभी मुझे अकेला छोड़ दो। मुझे कुछ वक़्त चाहिए ख़ुद को बटोरने का। मैं तुमको फोन करूंगी
प्रवीण चला गया। और मैं ताला खोलकर भीतर आ गई। सबसे पहले मेरी नज़र मेज़ पर रखी पानी की बोतल पर पड़ी। पहले नीलकंठ, फिर वो धुन और अब ये बोतल! ये तीसरी दफ़ा मुझे नानी की याद आई थी। पापा के गुज़र जाने के बाद मम्मी मुझे नानी-घर ले गई थी। तब मेरे उमर कोई नौ-दस बरस रही होगी। उस दोपहर को मुझे पापा की बहुत याद आ रही थी। नानी ने मुझे एक काँच की बोतल दी। मैंने पापा को एक चिट्ठी लिखी और उस बोतल में बंद कर दी। फिर हमने उसे पीछे बहती नदी की लहरों पर बहा दिया। नानी ने बताया कि ये लहरें इस दुनिया और उस दुनिया को जोड़ती हैं। जब भी कोई त्योहार होता है तो अंत में सारे देवी-देवता इन्हीं लहरों पर विसर्जित किए जाते हैं अपनी दुनिया में वापस जाने के लिए। जब कोई मनोकामना मांगनी होती है तो उसके निमित्त एक दीपक जलाकर इन्हीं लहरों पर विसर्जित करना होता है। मरने के बाद अस्थियों को भी इन्हीं लहरों पर बहाया जाता है उस दुनिया में भेजने के लिए। नानी कहती थी कि समय का बहाव भी एक बहती नदी की तरह है। और कई बार हमारे किए गए कामों से जो तरंगें बिछतीं हैं वो वापस हम से ही आ टकरातीं हैं। उस दिन बहती बोतल को देखकर लगा कि जो मैं कर सकती थी, मैंने कर दिया। उसके बाद शायद दोबारा पापा को चिट्ठी लिखने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई। लेकिन उस भारी सुबह मेज़ पर रखी बोतल से शायद कोई तरंग उठी और मुझसे आ टकराई। मन में एक सनक ने करवट ली। मुझे नानी घर जाना है।

मैंने अपना बैग तैयार करना शुरू किया। प्रवीण को मैसेज कर दिया कि मैं बाहर जा रही हूँ। आगे क्या करना है लौट कर बताऊँगी। उसने मेरे नए लेख के बारे में पूछा कि प्रिंट में दिया कि नहीं। मैंने कहा – वापस आ कर भेजूँगी। मैंने अपने मेज़ की दराज़ खोली। मेरा अमूर्त्य डर स्थूल रूप में साक्षात मेरे ही लेख के रूप में सामने था। कहते हैं कि संस्थान घुटने तोड़ देते हैं और उस भारी सुबह मेटाफर ने अपना आभासी रूप तोड़ दिया था। अपने घुटने मुझे वाक़ई लड़खड़ाते लगे। अब मैं दोबारा खड़ी हो पाऊँगी या नहीं, चल पाऊँगी या नहीं, ये फैसला मुझे करना था।

बस में मुझे एक खिड़की वाली सीट मिल गई। बहुत देर तक पीछे भागते गाँव देखती रही। उन्हें देखते-देखते उन गांवों की याद ताज़ा हो आई, जहां ये सारा सिलसिला शुरू हुआ था। आँखों में तैरने लगे दूर-दूर तक खाली गांवों के दृश्य। कानों में पानी की लहरों की तरंगें टकराने लगीं। नज़र आए खाली पड़े मकान, जिनमें बसे लोग तब जा चुके थे। खाली मकानों के बाहर छोटे-छोटे काठ के खूँटे जो अपने मवेशियों के बगैर सूने खड़े थे। सुनसान मंदिर और उनके ऊपर फड़फड़ाते सुनसान से लाल झंडे। उन मंदिरों में अपनी जलसमाधि का इंतज़ार करती हुईं सुनसान मूर्तियाँ। बांध के फाटक खुल चुके थे। पानी की लहरें इधर-उधर भटकतीं अपना रास्ता खोज रहीं थीं। लहरें! उस दुनिया से इस दुनिया में आतीं हुईं! और इस दुनिया से एक और किसी (नई?, बेहतर?) दुनिया में जाती हुईं। अफवाह फैलाई गई थी कि विकास को उन्हीं लहरों पर सवार होकर इस दुनिया में आना था। इस नव-आगंतुक यजमान के स्वागत के लिए एक सिंहासन सजाया जाना था जिसकी कीमत एक आबादी राष्ट्र-हित के लिए सिर्फ अदृश्य होकर ही चुका सकती थी। अदालती फरमान हुआ था – अपनी ज़िंदगियाँ बटोरो और अपनी इतिहास-गाथाओ, अपनी लोक-कथाओं के मलबे को अपने मवेशियों की पीठ पर लादो और गायब हो जाओ या फिर किसी बोतल में एक चिट्ठी की शक़्ल में सिमट कर बैठ जाओ और विकास की लहरों पर सवार होकर कहीं (कहाँ?) चले जाओ। जो गायब होने का फरमान हुआ तो गायब होना ही पड़ेगा। जो नहीं हुए तो माननीय अदालत की तौहीन! एक बेदख़ल आबादी पर अवमानना का मुक़द्दमा!

वही दिन था जब मेरा वो लेख छपा था जिस पर अदालत बहादुर ने स्वतः संज्ञान लेकर मुझ पर माननीय अदालत की अवमानना का तमगा लगा दिया। तमाम सबूतों और गवाहों के मद्देनज़र ये अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि ताज़ीरातेहिंद दफ़ा रफा-दफ़ा के तहत मुलजिमा को एक दिन की क़ैद-ए-बामशक़्क़त और दो हज़ार रुपयों का जुर्माना भरने का हुक़्म देती है। हुक़्म की तआमील हो। क्या आवाम और अदालत की मर्यादा में छतीस का आंकड़ा है? क्या एक की कीमत पर ही दूसरे की रक्षा हो सकती है?

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वो एक और गुमसुम सुबह थी जब मैं बस से उतरी। वहाँ की सुबह उतनी भारी नहीं लग रही थी। लगता था रात में बारिश हुई थी। बस-स्टैंड पर जगह-जगह पानी के चहबच्चे बिखरे पड़े थे। रोशनी धुली हुई थी। बसें शांत उनींदी सी खड़ीं थीं मानो अभी सो कर न उठीं हों। चाय की दुकानों से उठती भाप और धू-धू की आवाज़, काँच के गिलासों की खनक, अख़बार क़रीने से अलग-अलग करतीं गाडियाँ, ताज़ा सब्ज़ियों की बोरियों की उठा-पटक और उनके बीच लोगों की एक-दूसरे की माँ-बहन करतीं गालियां। पिछली बार जब उस बस-स्टैंड को देखा था तब मैं बारह-तेरह साल की थी। तेईस साल बाद किसी को क़ायदे से कैसा दिखना चाहिए? तेईस साल और बूढ़ा? लेकिन पिछली बार वो कैसा दिखता था मुझे याद नहीं था। मैंने चारों ओर ग़ौर से देखा कि शायद कुछ जाना-पहचाना नज़र आ जाये। मैंने एक ऑटो लिया और पीताम्बर की बावड़ी की ओर चल दी।

नानी अकेली रहती थी। मामा बाजू वाले मकान में रहते थे। वो एक दो-मंज़िला कच्चा मकान था जो तेईस साल पहले शहर से बाहर था और आज भी कमोबेश बाहर ही था। लगता था जैसे चारों ओर फैलते शहर ने उस एक रास्ते फैलने से इंकार कर दिया हो। मकान अब पहले से थोड़ा जर्जर हो चुका था। दरवाज़ा अटका हुआ था। मैं उसे खोल कर भीतर आ गई। पीछे की ओर लगे नींबू के झाड़ों की महक ने मेरा स्वागत किया। हैंडपंप के गीले लोहे और गोबर की लिपाई पर गिरे पानी की महक भी उस महक में शामिल हो गई। मैं सीढ़ी चढ़ते हुए ऊपर आ गई। घर थोड़ा-बहुत बदल चुका था और थोड़ा-बहुत वैसा ही था। मुझे उसकी छत भी थोड़ी नीची लगी। लकड़ी के पार्टिशन से बनी रसोई, बाहर टीन के पतरे के शेड, ऊपर कवेलू की छत। चूल्हा फूंकने की फुंकनी। कोने में बने लकड़ी के ऊंचे तखत पर बिस्तरों का ढेर, तखत के बाजू में प्याज़ के बोरे। लकड़ी की दीवार पर टंगी तसवीरों से झाँकते पुरखे और देवी-देवता। पार्टिशन पर टंगा एक आईना, बाजू में रखी कंघियाँ, तेल के खाली-भरे डिब्बे, बोरोप्लस की आधी पिचकी ट्यूब। एक लकड़ी का झूला और बाजू में लकड़ी की एक आराम कुर्सी।

नानी घर पर नहीं थी। मैं आराम कुर्सी पर बैठ गई। आँख बंद करते ही मैं सोचने लगी कि मैं यहाँ क्यों आई हूँ। एक नीलकंठ, एक धुन, एक बोतल और एक सनक! क्या मैं अपनी दुनियावी सच्चाईयों से भाग रही हूँ? क्या हमारे कारनामें वाक़ई कोई लहर बनाते हैं? क्या वो लहरें कभी हमसे आकर टकरातीं हैं? उन लहरों के उस छोर क्या है? इन लहरों का पीछा करते-करते कितने लोग बीच ही में डूब जाते हैं? यही सोचते-सोचते मैंने अपना लेख बैग से निकाला। मैं सोचने लगी कि अगर मैं नानी-घर ना आती तो प्रवीण और बाक़ी लोग आगे की कारवाही की बात करते। इस लेख को भए छपने भेजने को कहते। और मैं शायद सबके सामने एक डरपोक, एक छद्म एक्टिविस्ट साबित होती। क्या मैंने अपने लिए कोई नकली भूमिका गढ़ ली है? एक मुखौटा? मैं यही सब सोच रही थी कि तभी दरवाज़े पर आहट हुई। शायद नानी आ गईं थीं।

- अरे! तुम आ गईं?’ नानी दरवाज़े से भीतर आती हुई बोली। मैं खड़े होकर गले मिलती, इससे पहले उन्होनें मेरे मायूस चेहरे को देख लिया था। उन्हें मेरे जेल की ख़बर भी पता थी। मैं उनसे गले मिलने ही वाली थी तभी उनके मोबाइल की घंटी बज उठी। उनकी रिंगटोन में वही धुन सेट थी जो उस भारी सुबह मुझे सुनाई दी थी। उस वक़्त मुझे लगा कि एक लहर वाक़ई मुझसे आ टकराई है। मुझे लगने लगा कि मैं ठीक वहीं हूँ जहां उस वक़्त मुझे होना चाहिए। सारा धुंध छंट चुका था। मोबाइल रखकर उन्होनें मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और बोलीं – चल! अब यहाँ आ गई है ना! सब ठीक हो जाएया! और मैंने कहा – ‘जानती हूँ नानी! इसीलिए तो आपके पास आई हूँ

Saturday, December 15, 2018

गुच्छा




दशहरे का रावण धधक रहा था। चारों तरफ भीड़-भाड़। चारों तरफ खुशियां। लोग रावण को जलता देख रहे थे। लाउड स्पीकर पर रावण के कराहने की आवाजें चल रहीं थीं। मेले में एक ओर खाने-पीने के स्टॉल लगे थे, जहां लोग पाव-भाजी, चाट-फुलकी, आइसक्रीम का मज़ा ले रहे थे। वहीं दूसरी ओर बच्चों के गोल-गोल झूले, जहां से उठतीं उनके हंसने, रोने और चिल्लाने की आवाज़ें लाउड-स्पीकर की आवाज़ों से टकरा कर बिखर रहीं थीं। चकरी वाला अपनी चकरियों के हुनर से बच्चों को लुभा रहा था। Satan के लाइट वाले सींग लगाए एक दूसरा लड़का टिमटिमाते खिलौने बेच रहा था। टिर्र-टिर्र करता एक और आदमी अपनी आँखों में गुब्बारे लिए छोटे बच्चों को टूँगा रहा था। आसमान से उतरते बौने पैराशूट, उनमें डोलते बौने अमरीकी सैनिक और उनकी बौनी LMG माहौल को काफी प्रतीकात्मक बना रहीं थीं। जगह-जगह तैनात पुलिस वाले पान-गुटखे की पीकें थूक रहे थे, गपशप कर रहे थे और माँ-बहन की गालियां बक रहे थे।

उसने अपनी जेब से मली तमाकू की एक पुड़िया निकाली और एक फांक लेकर एक फाइबर की कुर्सी में बैठ गया। पीछे सटी दुकानों में लोगों को कहते सुना- 'इस बार का रावण पिछली बार से छोटा है'। अतीत की सबसे खास बात ये है कि वो खुद को हमेशा वर्तमान से बेहतर और गौरवशाली होने का वहम बनाए रखता है। हालांकि रावण तो उसे भी छोटा लग रहा था। उसे याद था कि सात-आठ साल पहले रावण जलाते समय हादसा हो गया था। उस हादसे में सुक्कू सतराम की मौत भी हो गई थी। वो उसके परिचितों में था। उसे याद था कि अगले दिन अख़बार में एक छोटे से कॉलम में उस हादसे की खबर छपी थी। सुक्कू सतराम का नाम नहीं दिया था, बस लिखा था- 'एक आदमी की मृत्यु'। अपने किसी परिचित के एक संख्या में सिमट जाने का अनुभव उसने पहली बार किया था। थोड़ा अजीब लगा था उसे। जो लोग ज़िंदा रहते कभी ज़्यादा जगह नहीं घेर पाते, मरने के बाद संख्याओं में सिकुड़ते जाते हैं। दो आदमी मरे, चार घायल, तीन शहीद, 15 ढेर। क्या रावण के कद का बड़ा होना सुखद है? क्या वाक़ई राम के लिए?

उस हादसे के बाद हर साल रावण की लंबाई घटने लगी। विचारों की इन्हीं गलियों में भटकता वो अपने बचपन के बारे में सोचने लगा। तब लाउड-स्पीकर वगैरह नहीं होते थे मेले में। वो लोग राम-लीला मैदान के पीछे के ग्राउंड में क्रिकेट खेलते थे। उसकी बैटिंग तब पूरे ज़िले में मशहूर थी। ये उसका क़स्बा था। जब वो यहाँ आया था तब दो या तीन साल का था। इस क़स्बे से इतर उसकी कोई याद नहीं है। आज पैंसठ सालों बाद वो दादा और नाना बन चुका था। 

फाइबर की कुर्सी समेत सारा मेला एक पृष्ठभूमि में सिमट गया। अतीत के लम्हें विचारों की गलियों से निकल कर मेले के कैनवस पर फोर-ग्राउंड में उछल-कूद करने लगे। जो वक़्त उसने यहाँ गुज़ारा था वो उस कैनवस पर आ कर रंग भरने लगा। उसकी शादी... उसकी पहली तनख्वाह... उसके बच्चों का इस दुनिया में आना... और फिर उनकी शादियाँ... और फिर उनके बच्चे जिन्हें गोदी में लेकर वो बाज़ार जाया करता था... जो बाद में उसके स्कूटर के आगे खड़े हो कर इसी मेले में आया करते थे। उसके माँ-बाप का रुख़सत होना। सब कुछ यहीं था। सभी उसे यहाँ पंडित-जी के सम्बोधन से बुलाया करते। उसे लगने लगा कि उसने एक अच्छी ही ज़िंदगी बिताई है।

वो कुर्सी से उठा और घर के लिए चल पड़ा। तभी उसे लगा कि भीड़ में उसकी जेब से कुछ गिर गया है। उसने ग़ौर से नीचे देखा लेकिन कहीं कुछ नज़र नहीं आया। उसने अपनी जेबें टटोलीं। जेब में उसकी चाबियों का गुच्छा नहीं था। उसने दोबारा नीचे देखा लेकिन गुच्छा नहीं दिखा। उसने सोचा कि चलो डुप्लिकेट चाबी वाले को बुला लेंगे और वो भीड़ से बाहर की ओर निकल पड़ा।

भीड़ से बाहर निकलते ही उसे एहसास हुआ कि अचानक सब कुछ शांत हो गया है। उसने पलटकर देखा तो उसे सब कुछ बदला-बदला सा लगा। खाने-पीने के स्टॉल दूसरे थे। झूले, गुब्बारे, खिलौने सब बदल चुके थे। आसमान से अमरीकी सैनिकों की बमबारी भी नदारद थी। उसने भीड़ को ज़ूम कर के देखा। उसे कोई भी चेहरा पहचाना हुआ सा नहीं लगा। वो चेहरे भी जब उसकी ओर देखते, अजनबी नज़रों से ही देखते। तभी उसकी नज़र पड़ी कि पार्किंग वाली जगह पर अब पार्किंग नहीं रही। मेन-गेट का नाक-नक़्श भी थोड़ा जुदा सा लगा। वो हिम्मत कर के मेन-गेट तक गया लेकिन बाहर की सड़क वो नहीं थी जिसे वो पहचानता था। सहसा उसे ख़याल आया कि वो दरअसल एक सपने के भीतर क़ैद है। उसे ये ख़याल भी आया कि चाबियों का गुच्छा गुम गया है और उस गुच्छे के गुम होने की वजह से ही उसके सपने में सब कुछ बदल गया है। उसने सपने में ही ये निष्कर्ष निकाला कि अगर वो गुच्छा उसे वापस मिल जाए तो सब कुछ पहले की ही तरह हो जाएगा। उसका अपना - जाना-पहचाना।

वो दोबारा उस अजनबी भीड़ की तरफ गया और घुटनों के बल बैठ कर अपना गुच्छा ढूँढने लगा। उसने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाये वो अपने लम्हों को इस तरह खोने नहीं देगा। ख़ाक छानते-छानते उसके घुटनों में रगड़ लग रही थी और उसे लगा कि शायद कुछ ख़ून भी बहने लगा हो। उसकी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी। घुटनों पर ही बैठे-बैठे उसने अपना सिर ऊपर की ओर घुमाया। उसने देखा कि भीड़ के सारे लोग एक घेरा बना कर उसे ही घूर रहे थे। उसी घेरे में उसे उसकी पत्नी भी नज़र आई। उसकी आँखों में एक शिकायत दिखाई दी। सालों पहले किसी छोटी-सी बात पर अपना रौब दिखाने के लिए जब उसने सभी के सामने अपनी पत्नी को पीटा था, उस बेइज्ज़ती की शिकायत। उसकी हिम्मत टूटने लगी। वो नज़रें झुका कर दोबारा मिट्टी टटोलने लगा। इस बार वो कुछ ढूंढ भी नहीं रहा था। उसे लगा कि शायद उसका वो गुच्छा अब उसे दोबारा कभी ना मिले। वो गुच्छा जिसमें उसने अपने मनचाहे लम्हों को चुन-चुन कर इकट्ठा किया था और उसे एक खुशनुमा ज़िंदगी का वहम दिया था। उसने सोचा कि अगर वो चाहे तो ज़ोर से अपने शरीर को झँझोड़ कर अभी इस सपने को तोड़ सकता है। उसने दोबारा चेहरा उठा कर देखा। गौरवशाली अतीत अब जा चुका था। उसकी पत्नी अब वहाँ नहीं थी।

तभी उसने फैसला किया कि वो मैदान से बाहर जा कर इन अजनबी गलियों में अपने नए मकां को ढूँढेगा। लम्हों का एक और नया गुच्छा बनाएगा। शायद एक गौरवशाली भविष्य। ये सोच कर जैसे ही वो उठा उसे मेन-गेट पर उसकी पत्नी दिखाई दी जो उसका इंतज़ार कर रही थी।

Monday, December 3, 2018

धुआँ




उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। अभी वो अपने बिस्तर से उठा भी नहीं था कि पहली बार मोबाइल की घंटी बजी। इत्तेला रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। पापा जिस ट्रेन से सफर कर रहे थे उसका एक डिब्बा गोधरा में जला दिया गया था। उसी ट्रेन से उसको और मम्मी को भी जाना था। लेकिन उसकी तबियत ख़राब हो जाने की वजह से वो और मम्मी नहीं जा पाए। उस पहली घंटी के बाद तो घण्टियों का तांता लग गया। कभी कॉल वाली बड़ी घंटी और ना उठाने पर SMS की छोटी घंटी। मम्मी भी तब उसकी दवाई लेने मेडिकल स्टोर तक गईं थीं।

खबर मिलते ही उसने टीवी चालू किया।  डिब्बे में लगी आग की लपटों को अपनी आँखों में बटोरे एक एंकर स्क्रीन पर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था। उसने पापा का फोन भी मिलाया लेकिन उस रूट की सभी लाइने व्यस्त थीं। बीच-बीच में वो SMS के इनबॉक्स में जा कर शुभचिंतकों की प्रार्थनाओं को बटोर लेता। उसे हैरानी भी थी कि पापा के इतने सारे हितैषी रातों-रात कहाँ से आ गए। उन्होनें कभी किसी से अपने सम्बन्धों को मधुर रहने दिया हो। सोसाइटी हो या रिश्तेदारी, सभी जगह उनकी रौबदार सरकारी नौकरी की अकड़ ने दूसरों को हमेशा कमतर ही आँका। उसे तो बीच-बीच में इन हितैषियों की प्रार्थनाओं पर शक भी होता था।

आग की लपटों और उससे उपजे धुएँ के साथ काली धूसर आशंकाएँ भी उमड़ रहीं थी जिनका समय के आयाम में फैलना अभी बाक़ी था। लेकिन टीवी स्क्रीन से उठती इंसानी गोश्त की बदबू को उसने सूंघ लिया था। उस धुएँ और आशंकाओं के डर ने उसकी रगों की पटरियों पर दौड़ते सियाह ख़ून की रफ़्तार को और तेज़ कर दिया था। चंद ही मिनटों में उसने ख़ुद को सुलगते हुए एक डिब्बे में क़ैद पाया। उसने देखा कि धुएँ की तैरती अमूर्त्य रेखाओं के बीच ढेर सारी आकृतियाँ अलग-अलग कोनों में भाग रहीं हैं। धू-धू करती किसी सनातन आवाज़ की पृष्ठभूमि के बीच चीखती उन आकृतियों ने तभी अक्षरों, हलंतों, नुक्तों और मात्राओं का रूप ले लिया। देखते ही देखते उन काली पहचानों ने अपनी-अपनी वैयक्तिकता खो दी और उनके बीच से एक नया manifestation उभरा। लिखा था 'ब्रेकिंग न्यूज़'। उस नए साकार manifestation के पीछे एक विडियो फुटेज लूप में डाल दी गई थी। उसे यक़ीन था कि ये फुटेज कालांतर तक अब यूं ही चलती रहेगी।

तभी नेपथ्य से एक आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ ने दावा किया कि वो एक संवाददाता है। लूप वाली विडियो फुटेज को ऊपर की बर्थ पर फेंक दिया गया लेकिन डिब्बे में बनी खिड़की से उसे देखा जा सकता था। लगता था कि देश के collective conscience की याद्दाश्त पर किसी को भरोसा नहीं था। बाकी के कम्पार्टमेंट में दिखाई दिया टीआरपी की आंच में झुलसता वही एंकर। एयर कंडीशन न्यूज़-रूम में सुलगता एंकर पूरी शिद्दत से सामूहिक चेतना को यकीन दिला देना चाहता था। उसे ये नहीं पता था कि यक़ीन दिलाना किस बात का है, लेकिन गले की उफनती नसों से वो नेपथ्य के संवाददाता को खरोंचने में लगा था। कुछ भी exclusive ना मिल पाने पर टीआरपी की आंच और तेज़ हो जाती जिससे नसें और भींच जातीं, आवाज़ और तेज़ हो जाती।

वो उस manifestation से, उस टीआरपी की आंच से और नेपथ्य की उस आकाशवाणी से भाग कर दोबारा अपने collective conscience के दड़बे में आने के लिए छटपटाने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी बंद हो गई, अनंतकालीन विडियो फुटेज वाली खिड़की भी गायब हो गई, और काले उदास ब्रेकिंग न्यूज़ के manifestation की जगह अवतरित हुआ स्वर्ग से उतरे रंगों का एक चमचमाता स्वप्नलोक - एक कमर्शियल ब्रेक। वो जल्दी से हाँफता हुआ उस जलते हुए डिब्बे से बाहर आ गया।

उसने एक बार फिर पापा का फोन मिलाया और SMS के इनबॉक्स में एक बार फिर गोता लगा कर चंद प्रार्थनाओं को बटोरा। जब आशंकाएँ अपनी चरम तक पहुँच जातीं हैं तो इंसानी दिमाग को एक धोखा होने लगता है। एक वहम - उम्मीद का वहम। पापा का रिज़र्वेशन उस डिब्बे में थोड़े ही था जिसमें आग लगी है! वहम को काटता एक दूसरा वहम - 'Us versus Them' की तरह। लेकिन अगर अब दंगे भड़क उठे तो?

तभी सारे बाज़ारवादी रंग अचानक गायब हो गए। ब्रेक ख़त्म होते ही उदास रंग वाला नया प्रोडक्ट स्क्रीन पर दोबारा launch हुआ। वही एंकर दोबारा स्क्रीन पर लौटा।

इस बार उसकी नसें उतनी भींचीं नहीं लग रहीं थीं। उसने थोड़ा मिनरल वॉटर भी पी लिया था। आते ही उसने सबसे पहले वही शाश्वत वीडियो फुटेज चलाई। पिछली बार की तरह कुछ exclusive ना मिल पाने की झुंझलाहट अब उसके चेहरे पर नहीं थी। एंकर ने स्क्रीन से अपने हाथ बाहर निकाले और उसे उसके गिरेबान से पकड़ कर दोबारा उस झुलसते डिब्बे में खैंच लिया। डिब्बे की ये आग अब कभी भी नहीं बुझने वाली थी, वो समझ चुका था। गिद्ध के समान दूरदृष्टि रखने वाले एक्स्पर्ट्स का एक पैनल स्क्रीन पर अवतरित हुआ। टीआरपी के लिए अदने से संवाददाता पर निर्भरता ख़त्म हुई। सभी एक्स्पर्ट्स को एक-एक खिड़की वाली सीट दे दी गई थी। सारे एक्स्पर्ट्स बारी-बारी अपने-अपने पिंजरे खोलते और अपने-अपने तोते से सलाह-मशविरा करके भविष्यवाणी करते। उनकी सधी-सपाट आवाज़ें उसकी रीढ़ में कंपन पैदा कर रहीं थी। एक नई आग लगाई जा रही थी। उसे लगा कि उसकी सांस भीतर नहीं आ रही है। डर के मारे उसने अपनी आँखें और कान बंद कर लिए। दूर से एक धीमी आवाज़ सुनाई दी। शायद उसके भीतर ही से - 'शाहादत ज़ाया नहीं जाएगी'। तभी एक और ब्रेक आया और अपने आप को अपनी ही बैठक के सोफ़े पर बैठा पाया।

पापा का नंबर दोबारा डायल किया। उस रूट की सभी लाइनें अभी तक व्यस्त थीं। तभी स्क्रीन पर किसी बीमा कंपनी के विज्ञापन के तले एक पट्टी ने गुज़रना शुरू किया। सेंसेक्स 10 अंकों की मामूली बढ़त के साथ खुला। सभी कंपनियों के शेयरों की कीमतें ट्रेन के डिब्बों की तरह धड़धड़ाते गुज़र गईं। उनके पीछे इंसानी ज़िंदगी की कीमत बताते चंद हेल्पलाइन नंबर भी भागे जा रहे थे। इससे पहले कि एंकर दोबारा आ कर उसे उसके सोफ़े से खैंच ले जाए उसने उन भागते नंबरों की एक छाप मोबाइल स्क्रीन पर चिपका कर फोन मिलाया। नंबर इंगेज जा रहा था। वो दोबारा डायल करता कि ब्रेक ख़त्म हो गया और उसका सोफ़ा एक साइड लोअर बर्थ में बदल गया। वो खिड़की से बाहर नीचे की ओर देखने लगा। बाज़ार के भावों की लिस्ट गुज़र रही थी। इसके बाद शायद घायलों या मरने वालों की भी कोई लिस्ट गुज़रे। उसे खयाल आया कि रिज़र्वेशन तो उसका और मम्मी का भी था। उन दोनों के मौजूद ना होने पर अगर उन लोगों का नाम मरने वालों की लिस्ट में डाल दिया गया तो?

तभी मोबाइल की घंटी बजी और स्क्रीन पर पापा का नाम लिखा आया। साथ में दरवाजे की भी घंटी बजी। वो दरवाजा खोल कर अपनी मम्मी को देखना चाहता था। फोन उठा कर पापा से बात करना चाहता था। लेकिन तभी उसके चारों ओर धुएँ का एक गुबार उठा। उसकी आँखेँ जलने लगीं। उसने महसूस किया कि फोन और दरवाजे की घंटी धीमी होती जा रही है। वो कहीं दूर... बहुत दूर निकल आया है। कुछ आवाजें तेज़ होती जा रहीं हैं - 'ज़ाया नहीं जाएगी! ज़ाया नहीं जाएगी! ज़ाया नहीं जाएगी!' उसने एक जुलूस को उमड़ते देखा। अनंत तक फैला जुलूस। धुआँ, जुलूस, नारे। बस! अचानक उसने पाया कि वो भी जुलूस के साथ मुट्ठी भींचे चला जा रहा है। एंकर हंस रहा है। तोते चिल्ला रहे हैं। धुआँ गहरा रहा है। धुएँ के पार, सुदूर कहीं, उसे मम्मी-पापा के धुँधलाते चेहरे दिखाई दिये। पूरी ताक़त से अपने आँख-कान बंद कर लिए और एक बार फिर कमर्शियल ब्रेक का इंतज़ार करने लगा - अपनी दुनिया में वापस लौटने के लिए।

विडियो फुटेज लूप में लगातार चलती जा रही थी।


Friday, April 14, 2017

पंखुड़ी




कई बार अतीत बीत कर भी नहीं बीतता और वर्तमान आकर भी नहीं आता। आज साल भर बाद भी उस घर के बीते हुए लम्हें सीत के उभरे नक्शों की शक्ल में उसकी दीवारों से चिपके टंगें थे। उन दीवारों के दायरे में क़ैद धुएँ के गुबार, बरसाती मौसम के बदबूदार चिपचिपे कपड़े, दीवान की चादर पर चिपकी चिकत्ती सब मिलकर अतीत के उन नक्शों से यादों की चूती पपड़ियों को रोज़ देखा करते। बरसात में उस घर का अतीत और भी चिपचिपा हो गया था। छत से लटके उस पंखे की तरह जो धुएँ की कालिख को अपनी पंखुड़ी से चिपकाए रोज़ बेहिसी से उसके ऊपर मंडराया करता। कमरे में रखे उस फर्नीचर की तरह जो अपने भीतर की कुरेदती दीमक को अपनी आत्मा से चिपकाए इंतज़ार में खड़ा रहता ऐसे ही किसी एक दिन भुरभुरा के गिर पड़ने के लिए। उसी भुरभुराते सोफ़े पर बैठा वो सोचा करता कि सुलगती सिगरेट शायद भीतर जाकर सीत की चिपचिपी दरारों, उनमें उभरे नक्शों और उनसे चूती अतीत की पपड़ियों को भरेगी, लेकिन वो सिगरेट महज़ उसके सामने शून्य में तैरती एक एशट्रे ही भर पाती।

एक और शून्य भी था उस घर में। एक और एशट्रे भी... जिसमें सुधा अपनी आत्मा पर चिपके अपने अपराध-बोध की राख़ जमा करती। न बीरेन की दरारें ही भरतीं थीं, न सुधा का अपराध-बोध ही खुरचता था। जब वो बाहर दीमक लगे सोफ़े में भुरभुराता बैठा रहता, वो भीतर अपने पलंग पर लेटे, दवाइयों के कडवेपन को अपने ज़ेहन से चिपकाए, उम्मीदों की बत्ती बंद किए, अतीत के झीने रोशनदान से रिसते शून्य में तैरती पड़ी रहती। सिरहाने एक ढंका गिलास रखा रहता जिसके पानी में घुले गुनाह उसके भीतर तैरते कडवेपन को और भी भीतर तक ठेल देते। आँखों ने काफी पहले रोशनी बर्दाश्त करना छोड़ दिया था। दोनों कमरों के बीच का एक साझा अतीत भी था जो साल भर पहले अपने धड़े से दो फाँकों में बंट चुका था। जब अतीत बंटता है तो उसके तमाम किरदार गौण हो जाते हैं... शून्य की तरह... कभी झीने रोशनदान से रिसते हुए, कभी एशट्रे में अपनी भुरभुरी कालिख जमा करते हुए। रोशनदान और एशट्रे के बीच एक काला गुबार भी जमा हो चुका था... जो न फटता था, न ख़त्म होता था। उतना ही ताज़ा बना रहता, उतना ही सख्त। साल भर हुए दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी। उनकी बेटी पंखुड़ी की आज पहली बरसी थी।

क्या कोई भी चीज़ हमेशा एक सी रहती है?... रह सकती है? न बीरेन और सुधा की ज़िंदगियाँ हमेशा से ऐसी थीं ना इस घर की दीवारें। कहते हैं कि ज़िंदगी में खुशियों के दाखिल होने के अनगिनत रास्ते होते हैं। उस दिन वो एक ख़बर की शक्ल अख़्तियार कर अस्पताल के उस लेबर रूम से बाहर आई थी

- बधाई हो! लड़की हुई है!

थोड़ी ही देर में वो खुशी लेबर रूम से निकल कर वार्ड में शिफ्ट हो गई। उस खुशी का नाम उन्होनें पहले ही सोच रखा था

- पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा न!
- अगर लड़की हुई तो
- लड़की ही होगी
- तुम्हें कैसे मालूम?
- मेरे गट फीलिंग कहती है
- अच्छा!
- हाँ!

अब ये बातें भी तमाम दूसरी बातों की तरह उन नक्शों की उभरी पपड़ियों से चिपकी हैं जो कभी-कभी छिटक कर बंद आँखों के पीछे तैरती यादों, मलालों और गुनाहों की ग्रंथियों में भी उतर जाती हैं। और तब एक बार फिर मन के किसी कोने में वो दिन दोबारा गुज़रने लगता है। जब बीरेन ने सुधा को 'थैंक यू' कहा था। बदले में सुधा सिर्फ मुसकुराई थी। उस वक़्त पंखुड़ी अस्पताल के सफ़ेद पालने में लेटी अपनी नाज़ुक पलकें उठाए क्षितिज से किसी शून्य में निहार रही थी। लगता था जैसे ज़िंदगी के लम्हें उसी शून्य से रिसते हुए उसके पास चले आएंगे। फिर नर्स का आना और पंखुड़ी के दूध का वक़्त हो जाना और बीरेन का बाहर रखी फाइबर की कुर्सियों में शिफ्ट हो जाना। सब कुछ उसी तरह हर रोज़ बीतता चला जाता है। फिर नर्स का घबराहट में बाहर निकलना और फ्लोर पर बने स्टाफ रूम की तरफ भागना और इंटरकॉम पर एक नंबर डायल करना भी हर रोज़ उसी कसक के साथ बीतता चला जाता है।

- सर! वार्ड नंबर 13 में इमरजेंसी है।
- अभी जिस बच्ची की डिलिवरी हुई है, उसकी चमड़ी नीली पड़ रही है!
- हाँ! चमड़ी पर दाने भी निकल रहे हैं। होंठ काले पड़ गए हैं।
- दूध नहीं पिला पा रहे। मुंह से झाग निकल रहा है।

बाहर के कमरे में रखे सोफ़े पर पड़ा वो अपनी खुशियों को भुरभुराता हर रोज़, बार-बार महसूस करता है। बार-बार दिखता है उसे पैथोलॉजी का वो लड़का और पंखुड़ी की नसों में धँसती वो सुई, उसके भीतर का रिसता काला ख़ून... धुएँ के किसी गुबार की तरह... काला... बंद दरवाजों, खिड़कियों और दीवारों के दायरे में क़ैद अंधेरे की तरह... काला... आत्मा में धँसते कड़वेपन की तरह... काला... तैरते... ढंके... गुनाहों की तरह... काला।

और फिर...

- सर! बच्ची की तबीयत अचानक बिगड़ गई है।
- डॉक्टर आ रहे हैं। कुछ टेस्ट करने पड़ेंगे।
- ख़ून में कोई इन्फेक्शन लगता है।

और फिर...

- पैथोलॉजी से लड़का आ रहा है ब्लड सैंपल के लिए।
- ब्लड ग्रुप पता लगते ही आप ब्लड का बंदोबस्त करने की कोशिश कीजिये।
- रिसेप्शन से ब्लड-बैंकों के नंबर मिल जाएंगे।

और फिर...

- देखिये! बच्ची के लिवर में इन्फ़ैकशन है।
- ख़ून में ज़हर फैल रहा है। ब्लड-ट्रांसफ़्यूज़न करना पड़ेगा।
- अभी ICU में शिफ़्ट करते हैं। ऊपर से ऑक्सीज़न भी देना पड़ेगा।

उसकी आँखों में तब दो चमकती बूंदें तैरने लगीं थीं और तब वो उन्हें गिरने से रोकने की कोशिश कर रहा था। तब... जब सब कुछ धुंधला और आभासी हुआ जा रहा था और सुधा उसी पलंग पर लेटी थी। उसकी बंद आँखों के पोरों से झड़ते अपराध-बोध सब्ज़ तकिये के किसी शून्य में रिसते जा रहे थे और वो ख़ुद एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में ब्लड-बैंकों के नंबरों का पर्चा लिए पिंडलियों में उठती सिहरनों को चिपकाए खड़ा था। तब... जब यादों की किसी अंधेरी दीवार से एक पपड़ी भुरभुरा के उखड़ गई थी। हाँ!... ठीक उसी वक़्त पहली बार उसे अपने और सुधा के बीच हुई नाड़ी के ख़ून वाली बात याद आई। पिंडलियों की सिहरन अचानक तेज़ हो गई और अपना संतुलन भी उसे बिगड़ता-सा लगा। धुंधली तैरती नज़रों से उसने सुधा की ओर देखा। वो भी उसे उस सब्ज़ तकिये के रास्ते उस शून्य में रिसती हुई सी प्रतीत हुई। सब कुछ धुंधला और आभासी-सा हुआ जा रहा था।

अगले दिन तक पंखुड़ी पूरी तरह मुरझा चुकी थी। उसकी चमड़ी पूरी तरह काली पड़ चुकी थी। एक मखमल का कपड़ा लाया गया था। पंखुड़ी को उसमें समेटा गया था। तब वो बार-बार ICU के शीशे के पास जाया करता। अपनी धुंधलाती पंखुड़ी को झुलसते हुए देखता और उसके ताप को अपनी आत्मा पर चढ़ता महसूस किया करता। आज साल भर बाद भी वो कपड़ा उनके बीच साझी एक अलमारी के एक अंधेरे खंड में रखा था। सुबह से आज दो बार वो उस कपड़े को अलमारी से निकाल कर उसमें अपनी पंखुड़ी की महक को महसूस करने की कोशिश कर चुका था। कभी पालथी मारकर उस कपड़े को अपनी गोद में रखता और कभी हताशा में तैरते आंसुओं को कमीज़ से पोंछता कि खारा पानी उस खुशबू को कहीं धुंधला न दे। पंखुड़ी उस ICU की आभासी दुनिया से कभी बाहर न आ सकी। बाहर के इसी कमरे में उसे रखा गया था। एक दिया जलाया गया था। गंगाजल भी छिड़का गया था। नहलाया भी गया था। नए कपड़े भी पहनाए गए थे। और फिर आया था वो सफ़ेद कपड़ा जिसमें उसे लपेटा गया था। सोने के सिक्के के साथ तुलसी उसने उसके मुंह में रखी थी। श्मशान के उस गड्ढे में अपने इन्हीं हाथों से उसे लिटाया था। एक मुट्ठी मिट्टी उसने उसके सफ़ेद कपड़ों पर उड़ेली थी। फिर धीरे-धीरे अंधेरे ने उस गड्ढे को लील लिया था। गरुड पुराण के ख़त्म होते तक उस अंधेरे ने उसे, सुधा को और इस घर को भी उसी गड्ढे में लील लिया था। अब जब भी वो अपने चारों तरफ देखता तो उसे वही अंधेरा अपने इर्द-गिर्द महसूस होता। फिर जब वो तैरती एशट्रे देखता तो एक और सिगरेट जला लेता। झक से उजाला तो ज़रूर होता लेकिन धुएँ का एक उठता गुबार उस उजाले को जल्द ही लील लेता... उसी अंधेरे गड्ढे की तरफ। 

तभी उसे भीतर के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आई। वो भीतर की ओर दौड़ा। सुधा कमरे के फर्श पर पड़ी थी। सिरहाने रखा गिलास भी वहीं बाजू में पड़ा था। भीतर भरे सारे गुनाह फर्श पर फैल चुके थे। अकड़े हाथ, आकडे पैर। भींचे हुए दाँत। कांपता शरीर। आँखें अब भी रोशनदान की ही ओर। उसने देखा कि सुधा के मुंह से कोई कड़वा झाग निकल रहा था। उसकी नज़रें उस रिसते झाग पर केन्द्रित हो गईं और तब उसके भीतर की दीवार से कोई पपड़ी भुरभुरा कर गिरी। उसे एक बच्ची की याद आई जिसके झुलसते होंठों से उसने एक बार इसी तरह का कड़वा झाग निकलते देखा था।

- पता है! मेरे अजमेर वाली बुआ कह रही थी कि अगर बच्चे के पैदा होते ही उसके होंठों पर नाड़ी का ख़ून लगा दो तो होंठ एक दम गुलाब की पंखुड़ी की तरह लाल हो जाते हैं
- भूल के भी ऐसा मत करना।
- अरे! मैं थोड़ी कुछ करे दे रही हूँ। मैं तो बस ऐसे ही बता रही हूँ।
- तो मत बताओ।
- अच्छा! ठीक है! नहीं बताती। गुस्सा क्यों होते हो? वैसे... पंखुड़ी नाम अच्छा रहेगा ना!
- अगर लड़की हुई तो
- लड़की ही होगी
- तुम्हें कैसे मालूम?

- मेरे गट फीलिंग कहती है


बीरेन अचानक ही शांत हो गया। अपने पैर उसने पीछे खींचे। पीठ घुमाई और अपने दीमक लगे सोफ़े पर वापस आकर बैठ गया। मखमल दोबारा अपनी गोद में रखा। सिगरेट सुलगाई। एक लंबा कश खींचा। सोफ़े पर अपना सिर टिकाया और आँखें बंद कर लीं। तभी... उसे लगा... कोई कड़वापन उसके भीतर भी धँसता जा रहा है।