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Saturday, March 28, 2020

मूर्ख बंदर - पंचतंत्र

एक राजा को एक बंदर इतना अच्छा लगा कि उसने अपनी हिफाज़त के लिए अपने सैनिकों को हटाकर उसे तैनात करवा लिया।एक दिन सोते वक़्त एक मक्खी राजा के ऊपर आ कर बैठ गई।
चौकीदार बंदर ने राजा की तलवार उठा कर मक्खी पर हमला कर दिया।
मक्खी उड़ गई।
राजा मर गया।
किसी ने कहा कि बंदर के intentions अच्छे थे, बस execution में कसर रह गई।


Sunday, March 12, 2017

विधानसभा चुनाव - नज़रिया




कल पाँच राज्यों में चुनाव के नतीजे आ गए। दिन भर YouTube और Facebook पर ऑनलाइन नतीजे देखते रहे। ये चुनाव भी एक बार फिर डेमोक्रेसी की च्विंगम ही साबित हुए। रस तो कब ही का खत्म हो चुका है बस रबड़ है जब तक चबाते रहो। प्रधानमंत्री एक बार फिर सबसे शक्तिशाली साबित हुए। उनकी जीत के बाद तथाकथित liberals एक बार फिर छाती पीटते हुए नज़र आए। पूरी दुनिया में यही हो रहा है। हर जगह conservatives आगे आ रहे हैं और liberals पीछे जाते जा रहे हैं। हिंदुस्तान में पीछे नहीं बल्कि बाहर ही हो जाएँगे लगता है। लेकिन सवाल है कि हिंदुस्तान में क्या liberals हैं भी? मुझे नहीं लगता। हिन्दुस्तान में सही अर्थों में कोई liberal पार्टी है ही नहीं। 

भारत दरअसल एक वोट-बैंक की राजनीति है, ideologies की नहीं। किसी भी तरह का 'ism' एक विचारधारा होती है लेकिन जब आप वोट-बैंक की बात करते हैं तो कहीं न कहीं आपके लिए विचारधारा गैर ज़रूरी हो जाती है बनिस्बत चुनाव जीतने के। 

तमाम पब्लिक भी बहुत खुश है कि उनकी पसंद की पार्टी जीत गई। जिन्हें खुश होना हों, हो लें, लेकिन खुद से एक सवाल भी करें कि जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के भ्रष्ट है वो दूसरी में जा के दूध का धुला कैसे हो गया? इन नेताओं की दरअसल कोई व्यक्तिगत विचारधारा है ही नहीं। जो व्यक्ति एक पार्टी में रह के धर्मनिरपेक्ष है वही दूसरी में जा के कट्टरपंथी कैसे हो जाएगा? ये सरासर नामुमकिन है। सिद्धू और बहुगुणा के उदाहरण ताज़ातरीन सबके सामने हैं। क्या सिद्धू जब तक भाजपा में थे तो क्या मुसलमान विरोधी थे और आज तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों के खेमे में जा कर धर्मनिरपेक्ष हो गए? वहीं रीता बहुगुणा कांग्रेस से निकल कर भाजपा में गईं तो क्या हिंदुत्ववादी हो गईं? दरअसल ये सारे लोग शातिर, मौकापरस्त और चालाक राजनीतिज्ञ हैं। अपनी शातिर चालों में ये पब्लिक को उलझा के रखते हैं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या जनता को विकल्प मिला? 

एक राजनेता पार्टी 'A' से विधायक है और चुनाव के पहले एंटिइंकमबेनसी को देखते हुए पार्टी 'A' से पार्टी 'B' में चला जाता है। जनता 'विकल्प' की तलाश में 'PARTY B' को चुनती है लेकिन जो राजनेता चुन के आता है वो तो वही है जो पिछली सरकार में था। हम ये सोचें कि क्या यह व्यक्ति अचानक एक भ्रष्टाचारी से आदर्शवादी बन जाएगा? क्या ऐसा हो सकता है? और सबसे बड़ी बात है कि पार्टी 'B' ने तो चुनाव में जाने से पहले ही जनता को धोखा दे दिया। अगर दूसरी पार्टियों के दलबदलुओं को चुनाव में उतार कर एक विकल्प देने की बात की जा रही है, तब तो ये पहले दिन से ही ढोंग कहलाएगा और इसका पर्दा फ़ाश तो तभी हो जाता है जब टिकिटों का बंटवारा होता है। 

जनता को ये पता तो होता है कि चुनाव भी आईपीएल की तरह हो चुका है। पिछली बार जो इस टीम से खेला था अबकी बारी इस वाली से खेलेगा। अब जब जनता की जानकारी में सारी बातें हैं तो वह तो पुराने अनुभवों के आधार पर candidates को वोट देगी। इसलिए ठीक इसी समय उम्मीदवारों से और उनके ट्रैक-रिकॉर्ड से ध्यान हटाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। अगर ध्यान नहीं हटाया जाएगा तो पब्लिक तो हर उम्मीदवार के पिछले काम-काज को तौलेगी ही। इसमें सबसे पहले ज़रूरी हो जाता है जनता के सामने आदर्श पेश किया जाना। एक पार्टी विचारधारा के नाम पर हिन्दुत्व को परोसती है, दूसरी liberalism को। जबकि अभी तक जो धर्म-निरपेक्ष थे वही अब हिंदुत्ववादी खेमे में बैठे हैं। वोटों का ध्रुवीकरण ज़रूरी हो जाता है। जनता की स्टीरियो-टाइपिंग ज़रूरी हो जाती है। स्टार-प्रचारकों को न्यौते दिये जाते हैं। ये सब इसलिए कि जनता से ये मौका छीनना है कि वह अपने क्षेत्र के बारे में, चुनाव में उतरे सभी प्रत्याशियों के बारे में, उनके पिछले रेकॉर्ड के बारे में, किसी के ऊपर कोई क्रिमिनल केस है तो उसके बारे में कुछ भी मूल्यांकन करे। इस कड़ी में सबसे पहले कोई विवाद पैदा किया जाता है। हम सभी ने देखा था कि किस तरह पिछले कुछ चुनावों के समय भी लव जिहाद, घर वापसी, intolerance जैसे मुद्दे यकायक चुनावी discourse के बीच पटक दिये गए थे। इस बार रामजस कॉलेज में मार-पिटाई के बाद फिर एक नया मुद्दा आया - कौन nationalist है कौन anti-national? हालांकि ये मुद्दा पहले भी उठा है लेकिन चुनाव के समय ही इसे परवान चढ़ाया गया। पूरा देश इस debate में फंस गया। जब बाहर से कोई स्टार-प्रचारक जाता है तो उसे ना तो लोकल मुद्दों की detail में  जानकारी ही होती है और ना ही वो कोई ठोस या objectivity भरा कोई वादा ही कर सकता है। उसके भाषणों में एक ही बात होती है 'विकास' की बातें। विकास अपने आप में बहुत vague शब्द है। आवारा पूंजी और कॉर्पोरेटीकरण का ही दूसरा नाम विकास रख छोड़ा है। कोई मॉडेल किसी के पास नहीं है। दो विकल्प हैं - एक नागनाथ है और दूसरा सांपनाथ। पूरे चुनाव के दौरान टीवी चैनल और बाकी सोशल मीडिया इस विवाद में कूद-कूद के भाग लेतें है। एक पार्टी nationalist बन जाती है, बाकी सब एंटी-नेशनल। चुनाव कई चरणों में होता है और चरण-दर-चरण ये debate भी बहुत तीखा होता जाता है। चुनाव खत्म होते ही देशभक्ति के बादल छंट जाते हैं और कान फोडू debates की जगह ले लेते हैं Exit Polls। शेयर बाज़ार Exit Polls के दम पर एक दिन और हरे निशान में चढ़ता है। 

अब भाजपा को ये समझ आ गया है कि राम मंदिर में अब वो आकर्षण नहीं रहा। अब ज़रूरत है एक नए और पहले से बड़े ध्रुवीकरण के जुमले की। जो लोग कट्टर हिन्दू नहीं हैं वो भी nationalist तो बन ही सकते हैं क्योंकि सतही तौर पर nationalism काफी कुछ patriotism या देशभक्ति की तरह लगता है। आम दुनियादारी वाले आदमी के लिए ये बहुत पेचीदा बातें हैं कि भारत माता की जय न बोलना किस तरह से फ्रीडम ऑफ स्पीच से कनैक्टेड है और राष्ट्रगान के लिए खड़ा ना होना किस तरह ज़रूरी नहीं है। जो बातें दरअसल अकैडमिक मुद्दों के discussions की हैं उन्हें राजनीतिज्ञ बहुत चालाकी से प्राइमटाइम debate में तब्दील कर देते हैं। आम आदमी जो न तो इन मुद्दों की संवैधानिक पेचीदगियों से उतना परिचित होता है न ही उसे इतनी फुर्सत है। उसे बस एक स्टैंड लेना होता है। वो देखता है उन liberals को न्यूज़-स्टूडिओ में गला फाड़ते हुए जिन्होनें उसे बेरोजगारी और भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया था और जहां उसे वे लोग ये कहते हुए नज़र आते हैं कि भारत माता की जय बोलना ज़रूरी नहीं है, राष्ट्रगान में खड़े होना ज़रूरी नहीं है। वो फैसला कर लेता है और इस तरह वो न केवल एक liberal पार्टी को ही छोडता, बल्कि liberalism को भी छोड़ देता है। तमाम नतीजों के सारे भोंपू जब कल बजे, तो यही लगा कि हर शख्स liberals से खार खाये बैठा है। 

liberals से ये नफरत आज एक ग्लोबल पैटर्न है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ग्लोबलाइज़ेशन का दौर है। पूंजी एक देश से दूसरे देश में बह रही है और साथ में बहुत से sentiments भी बहा के ले जा रही है। इसी आवारा पूंजी के भरोसे टिके स्टॉक मार्केट, वायदा कारोबार, रीयल एस्टेट और War Against Terror के बुलबुले में क़ैद है सारी अर्थव्यवस्थाएँ। और ये बुलबुला ऐसा है जो अक्सर ही फटता भी रहता है। इसका फटना ही हर बार एक असंतोष, एक एंटी-इंकमबेनसी खड़ी कर देता है। और तब यही आवारा पूंजी एक दलबदलू की तरह दूसरे खेमे में शिफ्ट हो जाती है और एक rebellion की बोली बोलने बोलती है। बस, यहीं से पैदा होता है फासीवाद। फासीवाद कोई अचानक से नहीं आ जाता। 'विकल्प' की लंबी और थकाऊ तड़प या तो एक क्रान्ति को जन्म देती है या एक फासीवादी को जन्म देती है। इतिहास की जानकारी रखने वाले मेरी इस बात से तो सहमत होंगे ही कि पब्लिक ने liberals को भरपूर मौका दिया है। काफी समय उन्होनें राज किया। लेकिन उन्होनें liberalism की चाशनी में लपेट कर गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ही दिये हैं। ये तो बस चाशनी के बदलने का दौर है। लेकिन चाशनी बदल भी जाये तो भी चीनी तो वही रहनी है। 

Tuesday, February 28, 2017

कैंसर



हमारा समाज दरअसल एक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। कोई भी समाज गुज़रता है। हर दौर में गुज़रता है। दरअसल इतिहास कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो गुज़र चुकी है। हम अपनी-अपनी ज़िंदगियों को जोड़-जोड़ कर जो एक समाज बनाते हैं उसकी अपनी एक ज़िंदगी होती है। और इस समाज की ज़िंदगी की घटनाओं को ही हम इतिहास और वर्तमान के दायरे में बांटते चलते हैं। मुझे अक्सर ही लगता है कि एक ऐसा भी तत्व है जो हम सभी के समग्र से परिभाषित होता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे हमारा अपना शरीर। हमारा शरीर अरबों-खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। रोज़ न जाने कितनी ही कोशिकाएँ मरती हैं, पैदा होतीं हैं। उन कोशिकाओं से मिल कर कई अंग बनते हैं जिनमें वे अपना-अपना काम करते हैं। इन कोशिकाओं की अपनी एक individual ज़िंदगी होती है। उन्हें individually ऑक्सिजन चाहिए, पोषण चाहिए। न जाने क्यों मुझे ये लगता है कि इन कोशिकाओं को ये कभी पता भी होगा कि उनके जैसे अरबों-खरबों से मिल कर एक शरीर बना है जो चलता है, फिरता है, खाता है, दफ्तर जाता है, घर पर काम करता है। जैसे कोशिकाएँ अपना काम करतीं हैं किसी दूसरे आयाम के एक अनजाने विराट के लिए, क्या ये मुमकिन हैं कि हम लोग भी ठीक उन्हीं कोशिकाओं की तरह अपना-अपना काम नहीं कर रहे हों। रोज़ न जाने कितने मरते हैं, कितने जन्मते हैं। अपनी-अपनी individual ज़िंदगियाँ इस समग्र में जीते हैं। लेकिन किसी और आयाम से देखने पर क्या हम भी उन्हीं कोशिकाओं की तरह ना होंगे जिन्हें अपने विराट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो ये नहीं समझ पा रहे कि उन जैसे अरबों-खरबों से मिल कर एक और आकार, कोई मेटा-शरीर भी कहीं होगा।

क्या ये समाज, देश, मानवता या ज़िंदगी उसी मेटा का हिस्सा है? जब शरीर की ये कोशिकाएँ बीमार हो जातीं हैं तो शरीर भी बीमार हो जाता है। इसका तर्क उल्टा भी किया जा सकता है। गर शरीर बीमार है तो यकीनन उसके अवयव भी बीमार होंगे।

आज के दौर में जब हम अपने समाज, देश और मानवता को देखते हैं तो लगता है कि बीमारी तो निश्चित रूप से है। अलग-अलग समाज अलग-अलग गुट बनाकर एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं। न केवल वैचारिक, बल्कि हिंसा पर भी अक्सर ही आमादा होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में तना-तनी है। अगर मेटा बीमार है तो निश्चित ही हम भी बीमार होंगे। चाहे आज सोशल-मीडिया या पारंपरिक मीडिया को देखें तो indiviiduals की ओर से प्रेरित नफ़रतों के सैलाब को आसानी से देख सकते हैं। और अक्सर ही हमारे इर्द-गिर्द, हमारे जाने-पहचाने चेहरे इन भीड़ों का हिस्सा होते हैं। अभी हाल ही में अमरीका में 2 भारतीयों को एक सरफिरे ने कत्ल कर दिया। क्या ये बात अचानक उसके मन में आई होगी कि चलो आज किसी गैर-मुल्की को मारा जाये? मुझे ऐसा नहीं लगता। ज़्यादा संभावना इस बात की है कि बहुत लंबे समय से नफरतों के इन गुटों में चाहे online हो या offline उसका affiliation रहा होगा। इसे ही brainwash कहा जाता है। तमाम आतंकी संगठन और कट्टर पंथी लोग इंसान की इस प्रकृति का इस्तेमाल करना जानते हैं। मैंने पढ़ा था कि तालिबान ने छोटे उम्र के बच्चों को अपने संगठन में शामिल करने लिए वहाँ के मदरसों को सबसे पहले अपना निशाना बनाया। हिटलर ने भी अपनी आत्म-कथा Mein Kampf में लिखा है कि किस तरह बच्चों में एक विशेष भावना भरना ज़रूरी है अपनी नाज़ी पार्टी के उद्देश्यों के लिए। दरअसल तार्किक रूप से देखा जाये तो हमारे इर्द-गिर्द के सामान्य विद्यालय जो सामान्य शिक्षा देते हैं वो भी एक तरह की brainwashing ही है। फर्क ये है कि ये शिक्षा नफरत से भरी हुई नहीं है लेकिन काम ये भी वैसे ही करती है। एक व्यक्ति को एक विशेष तरह के माहौल में बहुत समय तक रखो तो वो भी अंततः वैसा ही हो जाता है। लेकिन आज के दौर में सूचना प्राप्त करने के साधन बदल चुके है। आज इंटरनेट की वजह से ये आलम है कि हमारे इर्द-गिर्द हर तरह की सोच, हर तरह की नफरत बहुत ही आसानी से हमारी पीढ़ी तक पहुँच रही है। आप एक facebook लॉगिन करके खुद ही brainwash हो सकते हैं, बगैर ये समझे कि आप brainwash हो रहे हैं। यकीन जानिए कि आपको अपनी नफरत उतनी ही उचित प्रतीत होती होगी जितनी एक घोषित आतंकवादी को अपनी नफरत सही लगती होगी। जैसा कि मैंने पहले कहा कि जब शरीर बीमार होता है तो यकीनन उसकी कोशिकाएँ बीमार होंगी। ये कोशिकाएँ अगर किसी बाहरी तत्व जैसे bacteria या virus की वजह से बीमार हों तो एक बात है लेकिन ये उस phenomenon को आप क्या कहेंगे जब ये कोशिकाएँ खुद ही शरीर को मारने पर आमादा हो जाएँ? कैंसर।

Friday, May 30, 2014

अर्थ


विज्ञान के तमाम तर्क जहाँ ख़त्म होते हैं, भावनाएं वहीँ से जन्म लेती हैं। व्यक्तिव का निर्माण देश, काल और परिस्थिति के बगैर सम्भव नहीं है। व्यक्तित्व एक परिस्थितिजन्य परत है लेकिन स्वप्रेरणा से इसे एक कृति बनाया जा सकता है। इस परत के सुदूर अंतस में क्या है ? क्या आत्म से साक्षात्कार सम्भव है ? क्या अपनी तमाम मान्यताओं और उनसे जन्मे पूर्वाग्रहों को छोड़ पाना सम्भव है ?



प्रायः हम सभी अपने लिए एक भूमिका चुन लेते हैं और ताउम्र उसे ढोते फिरते हैं। अपनी सोच को एक खूंटे से बांधकर जो एक घेरा बनता है उसे दुनिया समझते हैं और उस खूटें को ईश्वर। क्या प्याज़ के छिल्के की तरह व्यक्तित्व के सारे आवरण हटाने पर कुछ शेष रह जाता है ? क्या आत्मा की परिकल्पना उसी बीज के होने की अवधारणा है ? इन तमाम प्रश्नों के उत्तर वही दे सकता है जो अपने सारे आवरण, सारे मुखौटे हटा पाने में सक्षम हो।

कायाकल्प एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। सुदूर अंतस में सिर्फ 'अर्थ' हैं। शब्दों के अर्थ नहीं होते, बल्कि अर्थ को व्यक्त करने के लिए शब्द बनते हैं।

जो प्रकट है - वे शब्द हैं। मूल में एक ही अर्थ है जो प्रकट होने के लिए शब्द गढ़ता है। वह जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और विशाल से विराट है - शब्द है। विराट को अपनी सीमाओं से मापना व्यर्थ है। नज़रों कि अपनी सीमा है , आकाश की नहीं। लघु को मापना भी व्यर्थ है , क्योंकि वह हमारे लघुत्तम पैमाने से भी लघु है। अनगिनत शब्द अनगिनत ब्रम्हांड रच सकते हैं। शब्द - अनादि है , अनंत है। अर्थ - निहीत है , व्याप्त है , मूल है।

ग़ालिब ने उस अर्थ को ईश्वर और ख़ुद को शब्द मानते हुए लिखा है -
न था कुछ तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने में
न होता मैं तो क्या होता 

Friday, April 11, 2014

देस मेरा रंगरेज़ रे बाबू



आज यूं ही बैठे बैठे इक़बाल साहब की वो रचना याद आ गयी जो आज कल सभी को सिर्फ १५ अगस्त और २६ जनवरी को ही याद आती है - सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा। आखिर हिंदुस्तान में ऐसा क्या है जो ये सारे जहां से अच्छा लगे? शायद हमारी गंगा जमनी तहज़ीब। पीपली लाइव को वो गाना - देस मेरा रंगरेज़ रे बाबू, घाट घाट यहाँ घटता जादू ...। इस ज़मीन पर जो आया इस रंगरेज़ ने उसके रंग और अपने रंग का ऐसा ताना बाना रचा कि तबियत रंगीन हो गयी।

आज भौगोलीकरण के इस दौर में जब बदलाव इतनी तेज़ रफ़्तार से हमारी ज़िंदगियों को बदल रहे हैं, एक ख़याल आया कि ज़रा इस दौर को ग़ौर से देखा जाए। अपने इर्द गिर्द देखने पर पाया कि इस रंगरेज़ का जादू अभी थमा नहीं है। पिक्चर अभी चल रही है। मसलन, मैक डोनल्ड जैसे मंझे खिलाड़ी दुनिया भर में अपने बर्गर का लोहा मनवाकर हिंदुस्तान आये तो धीरे धीरे उन्हें भी इस जादू ने अपने असर में कर लिया - मैक आलू टिक्की और मैक पनीर टिक्का, हमारी उनकी साझेदारी। उन्हीं की तर्ज़ पर अब जगह जगह देसी खोमचे वाले भी वड़ा पाव के साथ साथ आलू टिक्की वाला बर्गर भी बनाने लगे। दिल्ली में तो ऐसे ठेले आपको हर जगह दिख जायेंगे। बैंगलोर की अम्मीज़ बिरयानी - बिरयानी वही लेकिन पैकिंग, पेशक़श और डिलीवरी किसी बहुराष्ट्रीय पिज़्ज़ा ब्रांड की तरह। वहीं मल्टीनेशनल पिज़्ज़ा ब्रांड्स भी पनीर और कीमे वाला पिज़्ज़ा बनाने लगे हैं।


हमारे यहाँ के लोग तो वैसे भी जुबां से चटोरे और मिज़ाज़ के तंदूरी हैं। एक मियाँ साहब जो मुग़लई अच्छा बनाते थे, उन्होंने भी अपनी दुकान का नाम बदल लिया है। अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग कर के कूल कर लिया है। अब दक्षिण भारतीय लोग उनके यहाँ टंगड़ी क़बाब और ज़ाफ़रानी पुलाव के बाद बाहर खड़े बिहारी भैया के यहाँ से पान खाते हैं। उन्हीं भैया से जाना के हुक्के फिर बिकने लगे हैं, पर अब ब्रांड वाले पैकेजिंग वाले, पुराने देसी वाले नहीं, नए अंग्रेजी नाम वाले। पान का स्वरुप भी बदल रहा है। लोग ज़र्दा और सुपारी कम खाने लगे हैं और शायरों की महफ़िलें भी नहीं रहीं। अब पान धीरे धीरे डिजर्ट की नयी भूमिका निभाने लगा है। गुलकंद वही बस थोड़ी ज्यादा मात्रा में और साथ में चेरी जो कभी उत्तर भारत में हेमामालिनी के नाम से मशहूर हुआ करती थी। आज पान के स्वाद की च्युइंग गम आ गयी और कई टपरों पे वनीला और चॉकलेट फ्लेवर के पान मिलने लगे।  पान आज भी वही बनारसी, कलकत्ता और महोबा वाला।

हल्दीराम के नमकीन देश छोड़िये विदेश में भी मशहूर हो चुके हैं। नई टैग लाइन है - इंडियन स्नैक्स। रसगुल्ले पैकिंग में आने लगे - स्वाद वही बंगाली छैना, बस थोड़े अतिरिक्त प्रेसेर्वेटिव्स के साथ। सोन पपड़ी के पैकेट तो शायद ही किसी दुकान में ना दिखाई दें। गरम गरम रसगुल्ले के साथ नया कॉम्बिनेशन है वनीला, स्ट्रॉबेरी आइसक्रीम। कोक और पेप्सी के साथ दुकान में रखे फ्रिज में मिल जायेगी अमूल की मस्ती छांछ। जलजीरा भी खुद को रीइनवेंट करने में लगा है सोडे के साथ, नाम - जीरा फ़िज़ (Jeera Fizz) ।

उत्तर पूर्व के प्रसिद्ध मोमोज़ आज पूरे हिंदुस्तान में फेमस और एक टीवी सीरियल के बाद गुजरात के महिला उद्योग का खाखरा पैक होकर चेन्नई के किसी सुपर मार्केट से होता हुआ अपने किसी मद्रासी अन्ना के घर को जा रहा। दिवाली के दीपक भी पैक हो कर मॉल में बिक रहे और सुप्रसिद्ध योगाचार्य अपने योग की सीडी मार्किट में लॉन्च कर रहे। सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के बाद उत्तर भारत से बैंगलोर आये लोग अपनी होली के रंगों में दक्षिण भारत को भी रंगने लगे हैं। लोग धीरे धीरे हिंदी भी अंग्रेजी के अक्षरों का इस्तेमाल कर के लिख रहे और हमारे श्री अशोक चक्रधर साहेब अपने पूरे चमन के साथ फेसबुक और ट्विटर पर आ रहे।

Friday, March 14, 2014

संघ का सिद्धान्त



आज मैं यहाँ संघ के सिद्धान्त के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। अरे घबराइये नहीं मैं आर. एस. एस. के किसी सिद्धांत की बात नहीं कर रहा। मैं तो बात कर रहा हूँ गणित के संघ सिद्धांत की। यह सिद्धांत बहुत कुछ जोड़ की तरह है बस इसमें समूहों की बात होती है। मसलन, अगर एक समूह स्वरों का हो और एक व्यंजनों का तो उनका संघ होगा दोनों का समावेश यानी वर्णमाला।

इसी तरह अगर कुछ दिलचस्प समूहों का संघ निकाला जाए तो नतीजे भी काफी दिलचस्प आयेंगे और आयेंगे भी या नहीं पता नहीं। जैसे कि अगर एक समूह बनाया जाए सभी प्रेमी युगलों का और एक समूह बनाया जाए शिवसेना, बजरंग दल, श्रीराम सेना तथा विश्व हिन्दू परिषद् का, तो इनका संघ क्या होगा? क्या एक ऐसा समूह जिसमें सभी शामिल हों? लेकिन क्या ये शिवसेना और बजरंग दल वाले इस नए समूह में प्रेमी-प्रेमिकाओं को रहने देंगे? गणित के सारे नियमों को धता बताते हुए उन्हें इस 'रेज़लटैन्ट' समूह से खदेड़ न देंगे? वो भी बाक़ायदा उनके मुंह पर कालिख पोत कर!! भारतीय संस्कृति की 'रक्षा' तो वे वहाँ भी करेंगे ही।

वैसे प्राचीन भारत में गणित के क्षेत्र में काफ़ी शोध हुआ करता था। शून्य की खोज भारत में हुई और फिर इसका अनुप्रयोग भी हमनें अपनी तमाम सरकारी और गैर सरकारी योजनाओं के नतीजों के रूप में प्रचुरता से किया। भई बाक़ी कोई देश करे न करे हम तो करेंगे ही, नहीं तो ये दुनिया वाले कहेंगे नहीं कि एल्लेल्लो, जब ये लोग खुद ही अपनी इतनी बड़ी खोज का इस्तेमाल नहीं कर रहे तो फिर हम भला क्यों करें इस शून्य का इस्तेमाल। हमारे इतनी व्यापक मात्रा में शून्य के इस्तेमाल को देखकर ही तो बाद में इस शून्य का तालिबान ने भी अपनी उदारता के लिए और जॉर्ज बुश साहब ने भी अपने आई. क्यू. के लिए प्रयोग किया, और प्रयोग भी क्या खूब किया। अपनी इस खोज पे हमें गर्व है और हमेशा रहेगा।


अब हालांकि इस संघ के सिद्धांत की खोज हमारी इस गौरवशाली धरती पर तो नहीं हो सकी पर इसके अनुप्रयोग तो हमने ही सबसे ज्यादा किये हैं। एक उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट कर रहा हूँ। किसी शोध ने कभी कहा था कि बच्चों को स्कूल में यूनिफार्म पहनना चाहिए ताक़ि उनमें एक दुसरे के कपड़े देख कर किसी तरह का 'कॉम्प्लेक्स' ना आ जाए। तो जी हमने स्कूलों में लगा दी यूनिफार्म। सभी प्राइवेट स्कूलों के 'बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स' का ये नया 'साइड बिज़नस' चमक गया। यूनिफार्म के साथ साथ फिर वे कॉपी, किताब, पेन, पेंसिल, स्कूल बैग और यहाँ तक कि जूते मोज़े भी बेचने लगे। आमदनी भी दिन दूनी रात चौगुनी हो गयी। फिर मार्किट में लांच हुई एक और शोध। इस नयी शोध ने कह दिया कि अगर बच्चों को अपने रोज़ के कपड़े अपनी पसंद से चुनने की स्वतंत्रता दी जाए, तो इससे बच्चों में निर्णय लेने कि क्षमता बढ़ती है। अब स्कूल प्रशासन धर्म संकट में। अब तक तो साइड बिज़नस मेन से ज़्यादा फ़ैल चुका था। क्या किया जाए? तब गणित के एक प्रोफेसर साहब ने संघ के इस सिद्धांत का आईडिया सुझाया। नतीजा निकला कि बच्चे हफ्ते में चार या पांच दिन यूनिफार्म में आकर अपने ज़ेहन में किसी तरह के काम्प्लेक्स को पनपने से रोकेंगे और एक या दो दिन गैर यूनिफार्म आकर अपनी किसी 'डिसिशन मेकिंग एबिलिटी' को बढ़ा सकें तो बढ़ा लें। तो देखा आपने किस तरह संघ के सिद्धांत ने दोनों का समावेश कर लिया। ये तो वही बात हुई न कि चित मैं जीता और पट तू हारा।

अब हमारा प्यारा देश तो वैसे भी अनेकता में एकता की बात सदियों से करता आया है। तमाम राजनीतिक पार्टियां भी आये दिन इसका आलाप लगाती रहती हैं। संघ के इस सिद्धांत को हमने अपनी आत्मा में रचा-बसा लिया है। हमारी सभी राजनीतिक पार्टियों ने भी जिस तरह चोरों, गुंडों, लुटेरों, हत्यारों, भ्रष्टाचारियों, जातिवादियों, साम्प्रदायिक लोगों को राजनीति की मुख्य धारा से जोड़ा, मैं तो कहूंगा कि वह इस संघ सिद्धांत की सबसे उम्दा मिसालों में से एक है। और वैसे भी ऐसा कर के इन पार्टियों ने संविधान की मूल भावना की रक्षा ही तो की है। जोड़-तोड़ की राजनीति, माफ़ कीजिये 'कोएलिशन गवर्नमेंट' भी तो इसी संघ सिद्धांत के एक और अनुप्रयोग का ही परिणाम है।


और यहाँ तक कि हममें से हर एक अपने-अपने अंतर्मन में भी इस सिद्धांत का पालन बराबर एवं पूर्ण निष्ठा के साथ करता है। हम टैक्स चोरी करते हैं फिर काले धन पे बवाल भी मचाते हैं। टी. टी. को, ट्रैफिक पुलिस को, चपरासियों व अधिकारिओं को घूस देते हैं लेकिन जब कोई बेचारा जंतर-मंतर पर अनशन करने बैठ जाता है तो हम इसी सिद्धांत का उपयोग करते हुए वहाँ भी चले आते हैं। पायरेटेड विंडोज से फेसबुक और ट्विटर पे भ्रष्टाचार के खिलाफ कमेंट और ट्वीट मारते हैं। अब कोई इसे हिपोक्रिसी कहे तो कहता रहे हमारी बला से। क्या पता कल को हम उनकी भीड़ में भी शुमार हो जाएँ इसी सिद्धांत का उपयोग कर के।