Tuesday, January 8, 2019

वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता


वजूद तक नहीं रहता, फासला जहां नहीं रहता
किसी साये का अपना कोई बाक़ी निशां नहीं रहता

यूं तो वो क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद है
जिस भी गली मैं देखूँ, केवल वहाँ नहीं रहता

मुद्दतें गुज़रीं, अब किससे मिलने आए हो
वो शख्स कोई और था, अब यहाँ नहीं रहता

तलाशते अपनी ज़मीन को यां पहुंच तो गए लेकिन
मालूम न था शहर में अब आसमां नहीं रहता

कोई राज़ तब जाकर मुक़म्मल होता है जब
उसका दुनिया में अंतिम भी राज़दां नही रहता

जो तन्हा छोड़ दो तो वो भी खंडहर हो जाएगा
अपने बाशिंद से जुदा तो कोई मकां नहीं रहता

9 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ये उन दिनों की बात है : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. बहुत खूब ...अपनों से जुदा हो के मकां नहीं रहता ... गहरी बातें ...

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ११ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. जो तन्हा छोड़ दो तो वो भी खंडहर हो जाएगा
    अपने बाशिंद से जुदा तो कोई मकां नहीं रहता....
    बहुत खूब ..........

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  5. बेहतरीन रचना.....आदरणीय

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  6. जो तन्हा छोड़ दो तो वो भी खंडहर हो जाएगा
    अपने बाशिंद से जुदा तो कोई मकां नहीं रहता
    बहुत लाजवाब...

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  7. शानदार अस्आर एक से बढ़कर एक उम्दा बेहतरीन।

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