Saturday, December 6, 2014

The Diary of a Social Butterfly



Recently I have read a book named - "The Diary of a Social Butterfly". The author is "Moni Mohsin". She is from Pakistan and she used to write a satire column with the same name in a leading Pakistani news paper. This book is actually a collection of her published work. From the cover, the book looks like a kind of girly cheeky fancy, but beware - 'Don't judge the book just by its cover'.

We, as Indians, have grown up in an environment in which our emotions towards Pakistan are pretty straight forward which, in one word, is hatred. But through this book, we come to know Pakistani people in a rather different way. She writes about the life of her own people. We cannot imagine the people in Pakistan living a day to day normal life, just like us in many ways. They also go to their offices. Inflation and price hike hit them too. I have always a belief that "Truth" is not just a single word but rather a much more complex phenomenon with lots of hidden layers attached to it. This book enlightens about the kind of thoughts, intellectuals in Pakistani media have about everything. The book's central character is a woman called Butterfly. She lives in Karachi. She likes parties, celebrations, expensive accessories just like any random page 3 elite in Indian metropolitan. She calls herself socialist because she attends lots of social gatherings. She is very proud of her Convent English as well. She resembles the character Maya Sarabhai, played by Ratna Pathak Shah, from the epic comedy Sarabhai vs Sarabhai, but not much. Her husband is an intellectual called Janu, about whom she thinks is a bore man who just doesn't watch anything other than CNN and BBC. Janu has very strong opinions about politics. He hates radical Mullas, who are taking Pakistan towards 16th century; The Army, which topples the democracy every now and then; The US, who runs behind the oil every time and also the corruption in Pakistan.

Butterfly also wants peace with India so she can come to Bollywood page 3 parties and do a lot of shopping in Khan market. Also, at some places she criticized India for traditions like Sati pratha. But I guess that's natural because Hindu Code Bill is actually passed after partition so they might have these stories told from their fore fathers about India.

The best thing about the book is humor. The satire work is just awesome. Be it about Janu's sisters or Janu's mother, or her own mother or even her friend circle; everything is just fantastic. Also, there is this guy called Dabbu, who is her Mausi's son, and his wife has run away taking all the money in his home and now she has to find a nice girl for his second marriage. Butterfly has an opinion on almost everything from Al Qaida's suicide bombs to Arundhati Roy's Sari. She is very frustrated on Osama, as because of him US is not giving visas to anybody and she has a long list of shopping from New York this season. The language is like a blend of English with Urdu and just gone superb. The lingo from all around Lahore, Karachi, or Islamabad (or as Butterfly calls it Isloo) go side by side and takes the writing to another level. For example, like in India a beautiful girl is 'Qatil', whereas she's a 'Tabahi' in Karachi. The book creates a new image of Pakistan which we never knew that it exists.

After reading the book, the cover makes sense too. It's a fantastic humorous book I have read in a long long time. Get it from Amazon. The price is Rs. 192/- ONLY.

Friday, November 28, 2014

इलाहाबाद में अस्थि विसर्जन

पिछले दिनों मेरी दादी का देहावसान हुआ था। हम लोग अस्थि विसर्जन के लिए इलाहाबाद गए थे। मैं पहली बार अस्थि विसर्जन के लिए गया था। इतना तो मुझे पता था कि ये कोई फिल्मों की तरह का अस्थि विसर्जन नहीं होगा जिसमें शाहरुख खान अकेले ही नदी में खड़े हो कर अस्थि प्रवाहित कर दे और डुबकी लगा ले। ये धार्मिक आडंबरों से ओतप्रोत कोई कार्यक्रम होगा, लेकिन मैं आडंबरों के परिमाण को देखना चाहता था। हिन्दी फिल्में तो यथार्थ से इतनी दूर होतीं हैं कि कभी नायक अपने पिता की मृत्यु में बाल भी नहीं देता। सिर्फ एक फिल्म मुझे याद है 'नेमसेक' जिसमें ऐसा हुआ था, लेकिन उसमें इसे महिमामंडित किया था और इसे हमारी जड़ों के साथ जोड़ा गया था।

हमें इलाहाबाद में संगम जाना था। मुझे चाचा ने बताया था कि हमें हाथी पंडा के पास जाना था। मैं उम्मीद कर रहा था कि जैसे ही हम वहाँ पहुंचेंगे पंडा हमें ऐसे घेर लेंगे जैसे रेल्वे स्टेशन के बाहर ऑटो वाले। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमारी गाडियाँ जैसे ही उस क्षेत्र में पहुँचीं, एक मोटरसाइकल वाले आदमी ने हमें रोका। वो कुछ पूछता इससे पहले ही चाचा ने बोल दिया- "हाथी पंडा"। वो बोला-"पीछे आओ"। और फिर हमारी गाडियाँ उसकी मोटर साइकल के पीछे चल पड़ी। माहौल किसी बड़े से हाट सा लग रहा था।  सभी पंडा लोगों के अलग अलग पंडाल थे। हर पंडाल में एक झण्डा लगा हुआ था जिसमें उस पंडा का चिन्ह था, किसी राजनीतिक पार्टी के चुनाव चिन्ह सरीका। भैंस, शेर, भालू, बैलगाड़ी, नाव, घोडा, यहाँ तक कि रेलगाड़ी और हवाईजहाज वाले पंडा भी थे। कुछ देर में हम हाथी वाले पंडा के पंडाल के आगे रुक गए। इनके पंडाल में हाथी का झण्डा लगा था। चाचा ने बताया कि ये लोग एक दूसरे के 'यजमान' नहीं हथियाते, जो जिस पंडा का यजमान है उसी के यहाँ जाता है।

पंडाल में मौजूद पंडा ने हमें तखत पर बैठाया। हमारे लिए चाय का ऑर्डर दिया गया। उन्हें बताया कि हम लोग गाँव अमखेड़ा, जालौन से आए हैं। मैं थोड़ा इधर उधर का माहौल देखने लगा। आगे एक बहुत बड़ा होटल सा लग रहा था। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अगर ये पंडा लोग पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते हैं तो आज तक इन्होंने अपने पक्के स्ट्रक्चर क्यों नहीं खड़े किए। हर जगह टाट, तिरपाल और कपड़ों के पंडाल बंधे हुए थे। बाद में किसी ने बताया कि ये ज़मीन होटल वालों की है और वो इस पर पक्का कुछ भी खड़ा नहीं करने देते। इन सबका भी ठेका होता है। जगह जगह दीवारों पर गंगा की सफाई के नारे लिखे थे- "गंगा दर्शन ही गंगा स्नान है"। लेकिन मुझे गंगा का काला पानी देख कर लग नहीं रहा था कि इस नारे का कुछ असर हुआ है। हो सकता है कि मैं बरसात के मौसम में आया था इसलिए पानी कुछ ज़्यादा ही गंदा लग रहा था। और वैसे भी भक्तों को केवल दर्शन से चैन थोड़े ही मिलेगा, स्नान तो वे करेंगे ही। हर पंडाल में कुछ बड़े बड़े लोहे के बक्से रखे थे। हाथी पंडा के यहाँ भी थे। इनमें यजमानों का लेखा जोखा था। मैं इधर उधर ताकने के बाद वापस आया तब तक एक बक्सा खुल चुका था और उसमें से एक मोटा सा लेखा निकल चुका था। लेखा के ऊपर एक खाकी हरे रंग का कवर भी था ताकि अंदर तक सीलन ना पहुंचे और लेखा पीढ़ियों तक चलता रहे। पंडा ने कवर हटाया, उसके ऊपर जालौन लिखा था। कुछ पन्ने पलटने के बाद उन्होने हमारा पन्ना खोज निकाला।

एक वंश को दो पेज आबंटित होते हैं। हमारे पन्ने के ऊपर हमारे दादाजी के दादाजी का नाम लिखा था। हमारे खानदान से सबसे पहले उनकी ही अस्थियों के विसर्जन के लिए उनके पुत्र इन हाथी वाले पंडाजी के यहाँ आए थे। लेखा में उन लोगों के नाम भी लिखे थे जो अस्थियाँ लाये थे और उन सभी लोगों के भी जो उन सभी उपस्थित लोगों के वंश को आगे बढ़ाने वाले थे। यानि उनके सभी पुत्रों के, और उनके पुत्रों के, और उनके पुत्रों के, इस तरह उनके पास पूरी वंशावली थी। मुझे भी कहा गया कि मैं भी अपना नाम लिखवा दूँ इस वंशावली में लेकिन मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरा नाम पहले से ही मौजूद था। खैर मेरे चाचा ने अपने पोते का जो अभी 2 साल का है उसका नाम ज़रूर जुड़वा दिया। मेरी मम्मी ने मुझे अपनी बेटी का नाम लिखवाने के लिए कहा लेकिन - "औरतों का नाम नहीं लिखा जाता"। अब बारी आई इस बार के प्रयोजन की तो लिखवाया गया हमारी दादी का नाम और उनकी अस्थि विसर्जन में जो जो पहुंचा था उनका नाम। बुआ ने कहा मेरा भी नाम लिखो, ताऊजी ने दूर से ही कहा- "औरतों का नाम नहीं लिखा जाता"। ये बात बुआ को नागवार गुज़री। उन्होंने कहा- "अपनी माँ की अस्थि विसर्जन करने आए हैं तो नाम तो लिखेगा ही।" ताऊजी सरेंडर। ताना देते हुए बोले- "लिख दो भाई इनका भी नाम। औरतों का तो आजकल बराबरी का हिस्सा है।" बुआ बोलीं- "मैं कोई हिस्सा थोड़े ही मांग रही हूँ भाईसाहब, नाम ही तो लिखने को कह रही हूँ। माँ तो वे सबकी थी और आए भी सभी हैं।" मुझे मज़ा आ गया बुआ की इस बात पर। खैर बुआ का और शायद सभी महिलाओं का नाम लिखा गया। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि ये नाम वंशावली वाले नहीं थे बल्कि इस बाबत थे कि कौन-कौन व्यक्ति अस्थि विसर्जन करने आया है। वंशावली में औरतों का नाम नहीं लिखा जाता, मेरी बहन का नहीं लिखा गया ना ही मेरी बेटी का। अपनी बेटी का नाम लिखवाना मेरी प्राथमिकता भी नहीं थी। इसलिए मैंने बुआ की तरह कोई विरोध भी नहीं किया। खैर फिर शुरू हुई पूजा। चाचा तखत पर बैठे। पिंडदान वही करता है जिसने दाह संस्कार किया हो और दाह संस्कार सबसे बड़ा या सबसे छोटा पुत्र करता है। पिंडदान का पिंड आटे की एक बड़ी सी लोई की तरह होता है (शायद आटे की लोई न हो पर दिखता वैसा ही है) और उसकी पूजा की जाती है। पूजा के बाद जब हमने पिंड देखा तो उस पर तमाम सिंदूर, चावल, कलावा और बहुत कुछ चढ़ा था। अस्थियाँ जो एक प्लास्टिक की एक थैली में लायी गईं थीं उनकी भी कुछ पूजा हुई। पंडा मंत्र पढ़ते गए और बताते गए कि कैसे कैसे पूजा करना है।

दादी का जब दाह संस्कार किया गया था तो उनकी पैरों की बिछिया और हाथ की एक चूड़ी जो चांदी की थी, और नथ जो सोने की थी पंडित जी ने उतरवा दी थीं। उनको भी अस्थियों के साथ विसर्जित करना था। पंडा को वो सब आइटम भी दे दिये गए। पंडा ने बड़ी चतुराई से हाथ की छींगली उंगली में सोने की नथ दबा के बाकी चांदी के आइटम अस्थियों के साथ मिला दिये। बाकी किसी का ध्यान नहीं गया पर चाचा का ध्यान चला गया। चाचा ने पहले ही देख लिया था कि ये नथ उंगली में दबा रहा है और उन्होने पंडा से कहा भी कि लाइये मुझे दीजिये पर पंडा ने जल्दी जल्दी बाकी सारी चीज़ें मिला दीं और ऐसे बर्ताव किया जैसे उसने कुछ भी नहीं दबाया। चाचा ने बाद में हमसे कहा -"मैंने सोचा कि छोड़ो अब किसी न किसी को तो मिलना ही है पर गंगा का जल छू जाता और उसके बाद कोई ले लेता तो मुझे दुख नहीं होता।" अब बारी थी संगम तक जाने की। पंडा ने दो नाव बुक करवाईं हम लोगों के लिए। उसने हम से कहा- "आपको संगम तक जाना है और प्रतिव्यक्ति 10 रुपये से ज़्यादा नहीं देना है। नाव वाला बीच में और ज़्यादा माँगेगा पर आप सिर्फ इतना ही देना। संगम में स्नान करने का कुल 100 रुपया दे दीजिएगा। इससे ज़्यादा नहीं। संगम पर ही आपको अस्थि विसर्जन करना है। वहाँ पर पंडित लोग कुछ कुछ बोलेंगे उस पर ध्यान नहीं दीजिएगा। हर चीज़ का पैसा लगता है।" हम लोग दो नावों में चल दिये। पानी एकदम काला दिख रहा था। शायद बरसात की वजह से। हालांकि मैं स्नान का इच्छुक नहीं था पर अक्सर ही मैं रीती रिवाजों के बीच आस्तिकों और श्रध्द्धालुओं का दिल नहीं दुखाता जब तक कोई ठोस कारण ना हो। नाव में चढ़ने से पहले कई सारे डिब्बे खरीद लिए गए थे गंगाजल भरने को। उनकी कीमत शायद 20 रुपये प्रति डिब्बा थी।

नाव थोड़ी आगे चली तो केवट ने शुरू किया- "उस ओर से कानपुर से गंगा आ रही है और इस ओर से दिल्ली से जमुना आ रही है। वहाँ पर संगम है जहां आपको लकीर दिखाई दे रही है। इस घाट पर लेटे हनुमान जी का मंदिर है। उस घाट पर (मुझे याद नहीं किसका) किला है। सरस्वती इनके नीचे से बहती है जो दिखाई नहीं देती जैसे कि हवा है हमें महसूस होती है पर दिखाई नहीं देती, जैसे कि आवाज़ है सुनाई तो देती है पर दिखाई नहीं देती। वैसे ही सरस्वती है जो है तो पर दिखती नहीं।" फिर उसने बोला-"किसकी अस्थियाँ है?" ताऊजी ने बताया-"माँ की"। उसने कहा-"सबकी नैया पार लगाने वाले भगवान राम की नैया एक केवट ने पार लगाई थी आज आपकी माता जी की नैया ये केवट पार लगा रहा है। श्रद्धा से जो ठीक समझें दे दीजिये।" सब लोगों से एक सुर में कहना शुरू किया- "नहीं नहीं। अभी कुछ नहीं। जितनी बात हुई थी उतना ही देंगे।" केवट बोला- "अरे! अपनी माँ के कार्यक्रम के लिए आए हो, इतना नहीं कर सकते।" लेकिन उसका इमोशनल अत्याचार चल नहीं पाया। फिर वो बोला-"हाथी निकल गया भैया और तुम पुंछ पकड़ कर लटक गए!" उसकी बात सुन कर सब ठहाका लगा कर हंस पड़े।

संगम आया। चाचा ने थैली का मुंह खोला। बाजू में दो तीन लड़के पानी में गोता लगाने को तैयार खड़े थे। जैसे ही चाचा ने थैली पलटाई लड़के पानी में गोता लगा दिये। एक ने तो, जो बिलकुल बाजू में था, ऐसा गोता लगाया कि आधी अस्थियाँ तो शायद पानी के नीचे उसने ही लपक लीं। शायद उनमें से किसी को बिछियाँ और चूड़ी मिल गईं हों। नथ तो खैर पहले ही पंडा हड़प चुका था। संगम पर कई बड़ी बड़ी नावों ने आपस में मिल कर एक घेरा बनाया हुआ था। बीच घेरे में पानी के अंदर नीचे लकड़ी के पटिये बंधे थे, जो घेरे की नावों से बंधे थे। श्रद्धालुओं को अपनी नाव से इस घेरे वाली नाव पर आना था फिर पानी में डूबे उन पटियों पर उतरना था और डुबकी लगानी थी। सब ने बारी बारी से स्नान किया। मोबाइल से अस्थि विसर्जन की और गंगा स्नान की कुछ तस्वीरें भी उतारी गईं।

मैंने भी स्नान किया। हालांकि पानी देख कर स्नान करने का मन बिलकुल नहीं था, पर मैं बड़े बुज़ुर्गों से विद्रोही का मेडल नहीं जीतना चाहता था। वैसे भी पानी इतना गंदा था कि मेरे नहाने से पानी तो क्या गंदा होता उल्टे मुझे अपने ही गंदे होने का डर लग रहा था। स्नान करने के बाद एक आदमी जो वहाँ बैठा था मुझे हाथ में दूध का एक गिलास देते हुए बोला- "दूध अर्पित कीजिये"। मैं समझ गया कि ये इसके 10-20 रुपये माँगेगा। मैंने कहा- "नहीं ऐसे ही ठीक है"। दूध भी बस कहने को था। 90 प्रतिशत तो पानी था। कुछ लोग वहीं पर हवन भी करवा रहे थे। बाद में मुझे पता चला यहाँ हर चीज़ का ठेका होता है। संगम में पटिये लगा कर स्नान करवाने से लेकर दूध चढ़वाने और यहाँ तक कि गोता लगाने वालों तक का। ऐसा नहीं कि कोई भी जाये और गोता लगाकर अस्थियों में से सोना-चांदी लूटने लगे। फिर हम लोग वापस लौटने लगे। लौटने का मार्ग अलग था थोड़ा सा। शायद इन नाविकों में भी नम्बर सिस्टम चलता है। इसे अब सबसे पीछे लगाना था। जहां से लौटना था वहाँ का पानी थोड़ा उथला था। दो नावों में कुल तीन केवट थे। हमारी नाव में दो और दूसरी नाव में एक। उथले पाने की वजह से केवट के चप्पू (मुझे दूसरा शब्द नहीं पता) दलदल में फंस सकते थे। इसलिए केवट को उतार कर पानी में धक्का लगाना पड़ रहा था और दूसरा आगे से खींच रहा था। दूसरी नाव जिसमें महिलाएं थीं उसमें तो एक ही मल्लाह था और उसे तो अकेले ही नाव को धक्का भी लगाना पड़ रहा था और अकेले ही खींचना भी पड़ रहा था। पानी की धार भी उल्टी थी इसलिए मेहनत भी और ज़्यादा लग रही थी। खैर, हम लोग किनारे पहुंचे और केवट को चैन मिला। किनारे के दलदल भरे पानी में भी कई लोग मिट्टी टटोल रही थे। पन्नी में मिट्टी भरते फिर उसे टटोलते कि शायद कोई सोना, चांदी या सिक्के मिल जाएँ। दूसरी नाव किनारे पर आ रही पर एक आदमी इतना तल्लीन हो के मिट्टी टटोल रहा था कि उसे नाव दिखी ही नहीं। वो तो भला हो कि सबने शोर मचाया तो उसका ध्यान गया और वो नाव के रास्ते से हटा, नहीं तो नाव उस पर चढ़ने ही वाली थी। पापा ने केवट को 500 रुपये दिये तो केवट खुश हो गया। उसने इतनी उम्मीद नहीं की थी। पापा ने भी उसकी मेहनत देख कर उसे 500 दे दिये थे। वो काम वाकई बहुत मेहनत का था। फिर ताऊजी ने केवट से कहा- "अब तो पूंछ निकल गई भैया?" और फिर सब ने एक जोरदार ठहाका लगाया। मल्लाह भी मुस्कुरा दिया। फिर उसने बताया कि उन्हें जो पैसे मिलते हैं उनमें से आधे पैसे तो पंडा लोग ले लेते हैं। पंडाल में लौटते वक़्त कुछ भिखारी भी मिले लेकिन उन्हें हम में से किसी ने भी कुछ भी नहीं दिया।

हमारे ड्राइवर ने भी एक बिसलेरी की बोतल दी थी गंगा जल भर लाने को। सारे डिब्बे और बोतलें संगम पर ही भर लीं गईं थीं। पानी इतना काला था पीने की सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन सारे बड़े लोग गंगाजल की तारीफ पर तारीफ कर रहे थे- "ये पानी इतना शुद्ध है कि कितने भी साल रखे रखो कभी कीड़े नहीं पड़ते। साधारण पानी को आप रख के देख लो, थोड़े ही दिनों में कीड़े पड़ जाएँगे। इसीलिए तो इसका महत्व है। दुनिया भर के वैज्ञानिक आश्चर्य करते हैं कि गंगा में ऐसा क्या है कि इसका पानी कभी खराब नहीं होता।"

खैर हम लोग वापस पहुंचे तो पंडा ने सबके हाथ में कलावा बांधा और 21000 रुपये की दक्षिणा मांग ली- "आपका हमारा साथ तो हमेशा का है। आप हमेशा हमारे यहाँ आते रहेंगे। पीढ़ियों का रिश्ता है। आपसे मांगना तो हमारा अधिकार है। देना आपकी श्रद्धा है। हमने तो बता दिया, अब आपकी जो मर्ज़ी हो दे दीजिये।" उसे कुल कितनी दक्षिणा दी, ये तो मुझे याद नहीं, लेकिन 21000 तो निश्चित रूप से नहीं ही दी थी। हमने फिर पंडा जी से बिदा ली। खाना हम लोग साथ लाये थे, वही जो उत्तर भारत में लगभग सभी लोग सफर में ले जाते हैं- पूरी, सब्जी, आचार और सेंव। पंडा ने बताया था- "आप लोग खाना लेटे हनुमान के मंदिर के बाहर जो मैदान है वहाँ बैठ कर खा लीजिये। लेकिन मंदिर के अंदर दर्शन के लिए मत जाइएगा। त्रयोदशी तक किसी का भी मंदिर में जाना वर्जित है।"

हम लोगों ने मंदिर के बाहर बने पार्क में चादरें बिछा कर खाना खाया। ताईजी और शायद चाची ने मंदिर के बाहर से ही कोशिश की कि शायद लेटे हनुमान के दर्शन हो जाएँ, लेकिन उन्हें वहाँ से हनुमानजी ने दर्शन नहीं दिये। मंदिर के अंदर तो जाने का प्रश्न ही नहीं था। पंडा ने पहले ही मना कर ही दिया था। खाने के बाद हम लोग वापस कटनी के लिए चल दिये।

गांधी जी की आत्मकथा 'सत्य के मेरे प्रयोग" में उन्होने अपनी काशी यात्रा का ज़िक्र किया है, जो मुझे प्रयाग (इलाहाबाद) यात्रा के इस पूरे घटनाक्रम में बराबर से याद आती रही। एक अंश इस प्रकार है:
संकरी, फिसलन वाली गली में से होकर जाना था। शांति का नाम भी नहीं था। मक्खियों की भिनभिनाहट तथा यात्रियों और दूकानदारों का कोलाहल मेरी सहन-शक्ति से परे था। जिस जगह मनुष्य ध्यान और भगवत-चिंतन की आशा रखता है, वहाँ उसे इनमें से कुछ नहीं मिलता। यदि ध्यान की ज़रूरत हो तो उसे अपने अंदर से पाना होगा। मंदिर में पहुँचने पर दरवाजे के सामने बदबूदार सड़े हुए फूल मिले। अंदर संगमरमर का बढ़िया फर्श था लेकिन किसी अंध श्रद्धालू ने उसे रुपयों से जडवाकर खराब कर डाला था और रुपयों में मैल भरा था।
दक्षिणा के रूप में कुछ चढ़ाने की मेरी श्रद्धा नहीं थी। इसलिए मैंने सचमुच ही सिर्फ एक पाई चढ़ाई, जिससे पुजारी पंडाजी तमतमा उठे। उन्होने पाई फेंक दी। दो-चार गालियां देकर बोले- "तू यों अपमान करेगा तो नर्क में सड़ेगा।" मैं शांत रहा। मैंने कहा- "महाराज, मेरा तो जो होना होगा सो होगा, पर आपके मुंह से गाली शोभा नहीं देती। यह पाई लेनी हो तो लीजिये, नहीं तो यह भी हाथ से जाएगी।" "जा तेरी पाई मुझे नहीं चाहिए", कहकर उन्होने मुझे दो-चार और सुना दीं। मैं पाई ले कर चल दिया। मैंने माना कि महाराज ने पाई खोई और मैंने बचाई। लेकिन महाराज पाई खोने वाले नहीं थे। उन्होने मुझे वापस बुलाया और कहा- "अच्छा, धर दे। मैं तेरे जैसा नहीं होना चाहता। मैं ना लूँ तो तेरा बुरा हो।" मैंने चुपचाप पाई दे दी और लंबी सांस लेकर चल दिया। इसके बाद मैं दो बार काशी-विश्वनाथ के दर्शन कर चुका हूँ, लेकिन वह तो 'महात्मा' बनने के बाद। इसलिए 1902 के अनुभव तो फिर कहाँ से पाता। मेरा 'दर्शन' करने वाले लोग मुझे दर्शन क्यों करने देते? 'महात्मा' के दुख तो मेरे जैसे 'महात्मा' ही जानते हैं। अलबत्ता, गंदगी और कोलाहल तो मैंने पहले जैसा ही पाया।
किसी को भगवान की दया के बारे में शंका हो, तो उसे ऐसे तीर्थ देखने चाहिए। वह महायोगी अपने नाम पर कितना ढोंग, अधर्म, पाखंड इत्यादि सहन करता है? उसने तो कह रखा है
ये यथा मां पद्यन्ते तांस्तथैव भ्जाम्यहम
अर्थात 'जैसी करनी वैसी भरनी'। कर्म को मिथ्या कौन कर सकता है? फिर भगवान को बीच में पड़ने की ज़रूरत ही क्या है? उसने तो अपना कानून बनाकर अपना पल्ला झाड लिया।

लौटते वक़्त गाड़ी में मुझे बड़े ताऊजी की बात याद आई, जो उन्होने नाव में अपना पर्स खंगालते हुए बोली थी- "कोई चिल्लर मिले तो गंगा जी में डाल दें।"

Friday, October 10, 2014

वो औरत

अभी पिछले दिनों मेरे दादी का इंतकाल हुआ। अस्थियाँ विसर्जित करने इलाहाबाद जाना था। घर की महिलाएं भी जाने की तैयारियां कर रहीं थीं। तभी किसी ने कह दिया - "औरतें अस्थि विसर्जन में नहीं जातीं"। हालांकि पहले हमारे ही घर में औरतें अस्थि विसर्जन में जा चुकीं थीं, लेकिन अक्सर ही पुरुष अपनी मर्ज़ी से औरतों के लिए नियम बना दिया करते हैं। खास तौर से प्रतिबंधित करने वाले। लेकिन मुझे देख कर खुशी हुई कि घर की औरतों ने अपना पक्ष रखा कि पहले जब हम जा चुके हैं तो अचानक ये नियम कैसा? और अपने माँ की अस्थि विसर्जन करने ही तो जा रहे हैं इसमें गलत क्या है? परिणाम स्वरूप घर के बड़े लोगों ने आपसी बातचीत में उनकी बात मान ली और तय हुआ कि सभी लोग चलते हैं। तीन गाडियाँ की गईं और सब लोग चल दिये।

हम लोग कटनी (म॰प्र॰) से इलाहाबाद जा रहे थे। ये घटना मैहर से कुछ दूरी पहले हुई। ड्राइवर ने गाड़ी धीमी की। हम सब लोग बाहर को देखने लगे। सड़क पर ढेर सारे वाहन पहले से ही रुके खड़े थे। ड्राइवर बोला -"लगता है चक्का जाम है आगे।" हम लोग उत्सुकता से देखने लगे। देखा तो सड़क के बीचों बीच बड़े बड़े पत्थर रख कर के रास्ता रोका गया था। सड़क के बीचों बीच एक आदमी पड़ा था और औरत उसके बाजू में बैठी रो रही थी। उसके चेहरे से ही गरीबी दिखाई दे रही थी। शायद गाँव के दलित आदिवासी थे। उनके चारों ओर कई सारे आदमी भी खड़े थे। दूसरी कई गाडियाँ भी चक्के जाम में फंसी हुईं थीं। उन में से कई लोगों को शायद जल्दी भी थी। कई लोग झल्लाए हुए भी थे। ड्राइवर ने काँच खोला। एक आदमी बताने लगा- "दारू पी के झगड़ा कर रहा था। पड़ोसी ने मार दिया। अब मर गया तो औरत ने सड़क जाम कर के रखी है। साले मादरचोद पहले तो दंगा करते हैं फिर पब्लिक को परेशान करते हैं। अरे जाओ यहाँ से, शमशान ले के जाओ उसे, यहाँ रोड में पड़े रहने से क्या मिलेगा।"

मैं भी गाड़ी से उतर आया। अचानक औरत ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। कोई बोला-"अभी शांत बैठी थी अभी रोने लगी। सब ड्रामा है मादरचोदों का।" तभी देखा कि आदमी हिल डुल रहा था। कोई बोला-"जिंदा है। मैं न कहता था ड्रामा कर रहे हैं साले।" मैं थोड़ा नर्वस भी था। कई बार ख़बरों में पढ़ा है कि चक्का जाम करने वाले हिंसक भी हो जाते हैं, तोड़ फोड़ भी करने लगते हैं। फिर हमारी गाड़ी तो ड्राइवर साहब ने सबसे आगे लगा रखी थी। धीरे धीरे मैं आगे बढ़ा और उस भीड़ का हिस्सा बन गया तो उनके चारों ओर खड़ी थी। कुछ गाँव के भी लोग थे। कुछ लोग नेतागिरी भी कर रहे थे। एक शख्स मुझे याद है जो नीले टाइप का सफारी सूट पहने था। पान से होंठ लाल थे और तिलक भी लगाए था। बुदबुदा बुदबुदा कर उस औरत और आदमी को निर्देश दे रहा था - "अभी ज्यादा न रो। अभी डीएम साहब नहीं आए और सुन रे ज्यादा हिल डुल ना।"

तभी कुछ पुलिस वाले आ गए। जहां तक मुझे याद है कोई महिला पुलिस नहीं थी और कोई नारेबाजी भी नहीं हो रही थी। सफारी सूट वाला धीरे से बुदबुदाया - "टीआई आया है। अभी नहीं हटना जब तक डीएम न आ जाये।" इतना कह कर वो थोड़ा पीछे हो लिया। पुलिस वाले ने पूछा - "क्या बात है? चलो हम आ गए हैं अभी बताओ क्या हुआ और रास्ता छोड़ो।" सफारी सूट वाला शायद इसी बात का इंतज़ार कर रहा था। तुरंत सामने आया -"जब तक डीएम साहब न आएंगे रास्ता नहीं खुलेगा।" पुलिस वाला सफारी सूट वाले को नज़रअंदाज़ करते हुए फिर औरत से बोला - "क्या हुआ? पहले रास्ता छोड़ो फिर बात करते हैं।" औरत दहाड़े मार मार के रोने लगी। हालांकि मुझे मामला अभी तक पता नहीं था लेकिन औरत के रोने में बनावट नहीं लग रही थी। ऐसा लगा की किसी बात पर वो वाकई में भीतर तक दुखी थी। सफारी सूट वाला आदमी बताने लगा- "इनकी बच्ची को एक आदमी भगा ले गया। हरियाणा का आदमी पता नहीं कहाँ ले गया। यहाँ की लड़कियों को भागा ले जाते हैं और बताते हैं की कई कई दिन तक पानी तक नहीं मिलता। ये बोलते हैं किसी जंगल में ले जाते हैं। फिर बेच देते हैं यहाँ की बच्चियों को। कई बार थाने गए पर कोई सुनवाई नहीं हुई। तीन दिन से आदमी परेशान है। खाना भी नहीं खाया। तबीयत खराब हो गई तो औरत क्या करे? अब जब तक डीएम साहब न आएंगे चक्का जाम नहीं हटेगा।" औरत रोये जा रही थी। एक आदमी, जो भी मेरे साथ खड़ा था, मुझसे बोला- "अब लड़की भाग गई तो हम लोग क्या करें? हमारा काहे रास्ता रोके हो? अपनी लड़की संभालती  नहीं और अब जब भाग गई तो हमारा रास्ता रोके हैं। हम क्या कर लेंगे?" मैंने उस से बहस करना ठीक नहीं समझा। नाबालिग लड़की को भगाना और अगवा करना एक ही बात है। लड़की को अगवा किया गया था।

इतने में डीएम की गाड़ी आ कर रुकी। औरत और ज़ोर से रोने लगी। सफारी सूट वाला आदमी फिर बुदबुदाया- "अभी डीएम साहब आ गए हैं। अभी ज्यादा नौटंकी न करना। हम बात करते हैं।" फिर उसने अपने साथ के सभी लोगों को ज़ोर से आवाज़ दी -"चलो रास्ता खोलो रे।" पत्थर हटने लगे। गाडियाँ साइड से मिली जगह से निकालने लगीं। औरत और आदमी अब भी रोड पर ही थे। हमारे ड्राइवर ने भी गाड़ी स्टार्ट की और निकालने लगा। मैं भी वापस उसमें बैठ गया। तभी मेरे ताऊजी ने कहा- "हरियाणा में लोग अपनी लड़कियों को मार डालते हैं। वहाँ लड़कियां काफी कम हो चुकीं हैं। अब उनको शादी के लिए लड़कियां ही नहीं मिलतीं। अब कई लोग दूसरी जगहों से लड़कियां ले जा के वहाँ जबरन शादियाँ करवाते हैं।" तभी मेरी ताईजी बोलीं- "अरे! पैसे वैसे नहीं मिले होंगे सोई ये ड्रामा है। ये लोग अपनी लड़कियों को बेच देते हैं ना!" मन में तो आया की कहूँ कि पैसों के लिए अपनी बच्ची बेचना पड़ रहा है यही क्या कम ज़ुल्म है? फिर मुझे उस औरत का चेहरा याद आया जो गाड़ियों की धूल में अब तक ओझल हो चुका था। वे आँसू नकली कतई नहीं थे। मैंने ताईजी से कहा- "सभी लोग थोड़े ही बेचते होंगे।"

...और इसके बाद हम में से किसी ने इस बारे में बात नहीं की। गर्मी काफी बढ़ चुकी थी और ड्राइवर ने एसी ऑन कर दिया।




PS:
मुझे नहीं मालूम फिर क्या हुआ? पुलिस ने कोई कार्रवाई की या नहीं। लेकिन मैंने बाद में इंटरनेट पर इस बाबत गूगल किया:

http://www.dnaindia.com/india/report-sex-ratio-in-haryana-worst-among-all-states-1829031

http://timesofindia.indiatimes.com/city/gurgaon/UN-report-highlights-grim-scenario-of-child-trafficking-in-Haryana/articleshow/20995848.cms


Saturday, October 4, 2014

प्रतिनिधि कहानियाँ - अखिलेश



प्रतिनिधि कहानियाँ - अखिलेश। जब मैंने इस पुस्तक का पिछला कवर देखा तो वहाँ पुस्तक के अंदर दी गयी मनोज कुमार पाण्डेय जी की भूमिका का अंश दिया था। मनोज जी लिखते हैं की अखिलेश की कहानिया 'बातूनी' कहानियाँ होती हैं। वाकई, बात एक दम सच है। इतनी लंबी कहानियाँ कि आप पढ़ते पढ़ते खो जाते हैं एक अलग ही लोक में। उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए मुझे मेरे एक दोस्त के बाबूजी याद आ गए। अपने ग्रेजुएशन के हम दोस्त लोगों की मंडली हमारे ही एक मित्र के ढाबे पे जाया करती थी खाना खाने। उनके बाबूजी दिन भर के आने जाने वालों से इतना हाल चाल लिया करते थे कि कोई उनसे बात करने बैठ भर जाये, उनके पास मसाले की कभी कमी नहीं होगी। अखिलेश की कहानियाँ भी वैसी ही हैं। कहानियाँ कम और चउरा ज़्यादा। लेकिन ये कहानियाँ बड़ी ईमानदार हैं। अखिलेश उन लेखकों में से हैं जो अपनी कहानियों में नाहक गंभीरता नहीं घुसेडते। कहने का अर्थ ये नहीं कि कहानियों में गंभीरता का अभाव है बल्कि ये कि कहानियाँ किसी आडंबर में नहीं फँसती। ऐसा लगता है कि कहानी शुरू हुई और साथ ही दुनिया जहान की पंचायत भी। जैसे दीवाली का कोई अनार। एक स्रोत से न जाने सितारे एक साथ, ठीक वैसे ही। कहानियाँ बाहर की ओर खुलती हैं और पाठक बड़ी आसानी से उनमें जा सकता है। कहीं कहीं कहानियों में चुहलबाजी भी है जो गुदगुदाती भी है। इन सब खूबियों के बावजूद कहानियाँ यथार्थवादी हैं।

पुस्तक में 6 कहानियाँ हैं। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 204 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 59 रूपये है। किताब को आप Amazon से खरीद सकते हैं। 

Saturday, September 27, 2014

कव्वे और काला पानी


कव्वे और काला पानी। निर्मल वर्मा की लिखी किताब अभी हाल ही में पढ़ी। एक ही शब्द है - "अद्भुत"। निर्मल वर्मा की मैंने एक किताब जलती झाड़ी पहले भी पढ़ी थी और मैं उनका पुराना मुरीद हूँ। निर्मल वर्मा की कहानियाँ कुछ लंबी होती हैं और पाठक को खींच लेतीं हैं। जिस प्रकार क्वांटम जगत में ऑब्जर्वर भी प्रयोग का ही हिस्सा बन जाता है ठीक उसी तरह निर्मल वर्मा की कहानियाँ भी पाठक को अपने में समेट लेतीं हैं। पाठक भी बाह्य जगत से टूट कर उनके बनाए क्वान्टम जगत में चला जाता है जहां निर्मल वर्मा पाठकों के मनोभाव को कंट्रोल करते हैं। जैसे कोई संगीतकार अपने वाद्य यंत्रों से खेलता है वैसे निर्मल वर्मा पाठक के मनोभावों से खेलते हैं। कई बार लगता है कि उनकी कहानी एक यात्रा है जिसमें कि ऊपर लिखा मोटा मोटा शीर्षक किसी स्टेशन सा है और पाठक वहाँ किसी गाड़ी में सवार होता है और शब्दों पर टिकी छतों से होते हुए कहानी में यात्रा करता है। कहानी को होते हुए महसूस करता है। जब कहानी पढ़ता है तो शायद पृष्ठों के भीतर किसी हिज्जे सा वो भी बन जाता है।
इस पुस्तक में सात कहानियाँ हैं। मेरे पसंदीदा है "धूप का एक टुकड़ा", "आदमी और लड़की" एवं "कव्वे और काला पानी"। पुस्तक में कुल 220 पृष्ठ हैं और पुस्तक का मूल्य 180 रुपये है। पुस्तक भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित है। हिन्दी साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य। आप इसे Amazon से खरीद सकते हैं.

Sunday, September 21, 2014

आइसक्रीम

भोपाल शहर. न्यू मार्किट. जून का महीना. शाम के सात बजे. सूरज का गुस्सा शांत हो गया था पर हवा में गर्मी का भभका अभी भी मौजूद था जो रह रह के कनपटे पे बरस जाता था. मैं एक दो मंज़िला इमारत की खिड़की से एक फाइबर की कुर्सी सटा कर बैठा था. ये मेरे एक मित्र का ऑफिस था जहां वो शेयर मार्किट में सट्टा लगवाता था. अभी कुछ ही दिन हुए यहां आये हुए. पहले बंगलुरु में सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी थी. अमरीका में एक बैंक डूबा और साथ साथ हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था भी ले डूबा. कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने पूंजीपतियों के दबाव में कर्मचारियों की छटनी कर दी ताकि उन अरबपतियों के डिविडेंट पे पड़ती आंच के ताप को कम किया जा सके. दूसरी नौकरी ढूंढ रहा हूँ. कुछ दिन के लिए अपने शहर भोपाल आया हूँ. नौतपे का दिमाग में असर था या अपनी किस्मत का कि अब शेयर मार्किट के नाम से नफरत होने लगी थी.


इस जगह जहां मैं बैठा हूँ, न्यू मार्किट का नज़ारा काफी खूब दिखता है. टॉप एंड टाउन आइसक्रीम की दूकान. सामने बनारस पानवाला. नीचे ज़मीन पर कई तरह के ढेर एक कतार में. कोई कमर में बाँधने की बेल्ट रखे है, जहां लड़के उन्हें अपने कमर पे बाँध संगी साथियों से पूछ रहे हैं - क्यों ठीक है न? बेल्ट में लगाने वाले बक्कल अलग से ढेर में रखे हैं. आगे एक ढेर है जहां कई तरह के फैंसी पर्स रखे हैं जिन्हें कॉलेज जाती मध्यम वर्ग की लडकियां कन्धों पे रख रख के देख रही हैं. माध्यम वर्ग की आँखों की चमक सस्ती चीज़ें देख कर अलग से नज़र आती है. वहीं आगे एक से एक कपड़ों के ढेर शुरू हो रहे हैं. टी शर्ट्स, लोअर, बरमूडे, कमीज़ें, पतलूनें, जुराबें, रूमाल, और फिर लड़कियों के टॉप्स, स्कर्ट्स, दुपट्टे लाल, पीले, नीले, और उन पर उकेरी डिसाइनें, कुछ पर बुँदे, मोती या कुछ और जिनकी परिभाषाएं लडकियां ही बेहतर बता सकती हैं. आगे एक और आदमी एक डंडे पर अपनी समूची दूकान डाले खड़ा है. डंडे से लटक रही पन्नियाँ जिनमे खुसी हैं बालों में लगाने वाले क्लिप्स, हैरपिन्स, गो गो, बिंदियों के पत्ते और न जाने क्या क्या. आगे एक खोमचा जिसमे बिक रहे हैं धूप के चश्मे. फैंसी चश्मे. कोई पूरा भक्क काला, कोई हल्का भूरा, कोई ऐसा की जिसमे पूरी दुनिया का प्रतिबिम्ब दीखता है. अलग अलग रंगों वाले प्लास्टिक के फ्रेम, गोल्डन फ्रेम, भूरे मेटल फ्रेम और कुछ ऐसे भी जिन्हें मोतियाबिंद के मरीज ऑपरेशन के बाद पहनते हैं. एक खोमचा जिनमें सेफ्टी पिन, सस्ती नेलपॉलिशें, लिपस्टिक, मस्कारा, आई लाइनर और न जाने क्या क्या. जमीन पर बैठा एक मोची. वहां कोने में. आइसक्रीम की दुकान के ठीक सामने की तरफ के कोने में. दो बोरों का कुल ज़मीनी घेरा. डंडे से बंधा एक काला छाता जो बारिश में किसी काम का नहीं. शायद गर्मी की धुप में कुछ काम आ जाता हो, लेकिन दोपहर के समय वो वहाँ बने शेड में सरक जाता है. सामने रखा एक लकड़ी का पटा जिसमें काली भूरी जूतों की पोलिशों के साथ साथ एक सफ़ेद बोतल भी मौजूद. जाने उसमें क्या रखा हो. एक जूता रखने का स्टैंड, कुछ ब्रश छोटे बड़े और कुछ फटी बनियानें भी. गल्ला उसी बोरे के नीचे जिस पर वो खुद बैठा है. जो कोई पैसे देता अपना एक घुटना ऊपर की तरफ तनिक उठा कर वहीं रख लेता. सामने एक दो गुब्बारे वाले जिनकी निगाहें आसपास गुज़रते बच्चों को टुंगाने में और हाथ गुब्बारों को रगड़ रगड़ के टिर्र टिर्र की आवाज़ें निकालने में व्यस्त हैं. गुब्बारे भी ऐसे कि बच्चे मुड़-मुड़ के देखें. कुछ बड़े गोल जिनपर बने चत्थे फूलने पर बहुत ही बड़े हो जाते. अंदर भरे बजरी के दाने और मुहाने पे एक रबर का पतला धागा. गुब्बारों को ठोको तो बजरी के दाने किसी बेचैन सी धुन में बजने लगते. कुछ गुब्बारे दिल के आकार के भी. कुछ गुब्बारे गैस वाले जो ऊपर की ओर उड़ने की कोशिश तो खूब करते पर उन्हें हमारी बेटियों के भविष्य की तरह एक खूंटे से बांध रखा है ताकि कोई पसंद करे तो अपने खूंटे से निकाल के उसके हाथों में दे दें. गुब्बारे वाले के बाजू में कुछ खिलौने वाले भी. कुछ बच्चे भी हैं साबुन के बुलबुले बेच रहे हैं. उनका बचपन भी उन्हीं बुलबुलों सा हो आया है. भारत निर्माण और इंडिया शाइनिंग के नारों को उघाड़ते बच्चे जब नली डालते हैं डिब्बी में और फूँक मारकर उड़ाते हैं बुलबुले तो शायद अपना थोड़ा बचपन भी उन्हीं बुलबुलों में सील बंद कर के उड़ा देते हैं. जब बुलबुले उड़ते तो आते जाते बच्चे और वो बच्चे भी जो अपने माँ बाप के सुरक्षित घेरे की गोद में बैठे होते हाथ मारने की कोशिश करते. कुछ तो फूट जाते और कुछ पहुंच बच से निकलते. वहीं पीछे एक मंदिर भी है जिसकी घंटियों की आवाज़ अक्सर बीच-बीच में सुनाई पड़ जाती है. दुनियादारी के चलचित्र के समानांतर चलते किसी बैकग्राउंड स्कोर की तरह.


"अरे यार कितनी बार बोला की चाय में शक्कर कम डाला कर."

मैं चौंका. पलट कर देखा देखा तो सामने एक बच्चा खडा था. लड़के के हाथ में एक बैंगनी पेंट से पुती तार वाली टी स्टैंड जिसका बैंगनी पेंट पपड़ियों की शक़्ल में उखड रहा था. कुछ गिलास खाली और मेरे लिए एक भरा. उसने स्टैंड मेरी तरफ बढ़ाया. मैंने एक चाय उठा ली. बच्चा जाने लगा और मैं उसे जाते हुए देखता रहा. तब तक जब तक वो मुंद ना गया ऑफिस के उस दरवाज़े से. उसके जाने के बाद भी याद आता रहा उसका अक्स. एक ही पल में जैसे किसी छापे को स्याही में डुबो के किसी काग़ज़ के ऊपर ठप्पा मार देते हैं. हाँ ठीक वैसे ही. शरीर ऐसा कि किसी कंकाल के ऊपर चमड़ी चिपका दी हो. एक एक पसली गिनी जा सकती थी. धुर पीली आँखें और उसी रंग के दांत. पिचका हुआ चेहरा. एक हाथ में टी स्टैंड. कंधे पे गमछा सरीखा कुछ. शायद किसी ज़माने में पूरा गमछा रहा हो. चिकटी सी बनियान. जाने इस नौतपे ने कैसे जिंदा छोड़ दिया. फर्र फर्र की आवाज़ से मेरा ध्यान मेज़ पर रखे अख़बार पर गया जो पंखे की हवा में उड़ने को आतुर दिखाई दे रहा था. पन्ने पर शिक्षा के अधिकार के विज्ञापन था. नौकरशाह सा एक पेपर वेट अखबार के ऊपर रखा था जिसके भीतर रंग बिरंगे फूल पत्तियों के आकार में बने सपने दिखाई दे रहे थे. लेकिन वे सपने थे, उन्हें छुआ नहीं जा सकता, वो पेपर वेट के कांच में बंद थे. वो लड़का शायद रोज़ इन अधिकारों की कतरनें काटता हो. चौकोर चौकोर कतरनें. और उनमें रखता हो पोहा, जलेबी, समोसा और चटनी. शायद उसे इस अधिकार के चुटकुले के बारे में कोई बताये तो उसकी भी हंसी छूट जाए या शायद रोना आये या शायद फिर वो किन्हीं दूर-दराज़ी सपनों में खो जाए. रंग बिरंगे फूल पत्तियों वाले सपने, ठीक वैसे ही जैसे कि उस पेपर वेट के भीतर हैं.


मैंने चाय का एक घूँट भरा. गर्मियों में कड़क चाय कुछ ज्यादा ही अच्छी लगती है. मेरा ध्यान एक बार फिर खिड़की के पार न्यू मार्केट की ओर गया. शाम के तकरीबन साढ़े सात बज चुके थे. बत्तियां काफी पहले ही जल चुकीं थीं. कहते हैं गाँव का बाज़ार सूरज ढलने पर बंद होता है और शहर का शुरू. बत्तियों से जगमगाता बाज़ार और भी ज्यादा आकर्षित करता है. बड़े बड़े शो रूम. उनके बाहर खड़े पुतले. पुतलों पे कपडे. इलीट वर्ग इनके अन्दर बहार जाता आता हुआ. उन्हें उन ज़मीन पर पड़े ढेरों से कोई मतलब नहीं होता. अमूमन ज्यादातर इलीट वर्ग ब्रांड कन्शिअस होता है. बगैर ये जाने कि ये बड़े बड़े कॉर्पोरेट्स अपने कर्मचारियों के साथ कैसा सुलूक करते हैं या हमारी प्राकृतिक संपदाओं का किस हब्सीपने से दोहन करते हैं हमारे ये लोग इन ब्रांड्स के पीछे उन तीन अंधे चूहों की तरह दौड़ते हैं जिनकी पूँछ किसान की बीवी ने काट दी थी. ज़्यादातर शो रूम्स के बाहर सेल के बोर्ड लगे हैं. कहीं २५ परसेंट तो कहीं ५० परसेंट. इतना सस्ता बेचने पर भी कंपनियों से लेकर दूकान मालिक तक मुनाफा कमाते ही होंगे. जब सेल नहीं होती तब तो ये मुनाफ़ा यकीनन अंधाधुंध ही कहलायेगा. तभी मेरी नज़र टॉप एंड टाउन आइसक्रीम की दुकान पर पडी. सामने बनारसी पान वाला. कुछ लोग पान खा रहे हैं. कुछ लोग सिगरेट पी रहे हैं. उन्हें देख कर मुझे भी सिगरेट की तलब लगने लगी. चाय ख़तम हो चुकी है. मैंने कितनी ही देर से सिगरेट नहीं पी. मैंने मुंह घुमाकर अपने दोस्त से पुछा - "सिगरेट है क्या?"
"नहीं यार. ख़तम हो गयी. अभी छोटू ग्लास लेने आएगा उससे मंगवाते हैं."


मैं फिर बाहर देखने लगा. लोग आइसक्रीम खा रहे हैं. बड़ी सी दुकान. छः सात लोगों का स्टाफ. कांच के काउंटरनुमा फ्रिज में कई तरह की आइसक्रीम. वनिला, बटर स्कॉच, केसर पिस्ता, टूटी फ्रूटी, स्ट्रॉबेरी, ब्लैक करंट. कई तरह की कुल्फियां. कई तरह की कोल्ड ड्रिंक्स. एक मशीन रखी है वहां उस कोने में. कोल्ड ड्रिंक उसी में से निकलती है. जब भी कोई मांगे बस काग़ज़ का एक गिलास उसके नल के नीचे रख दो और बटन दबा दो. कोल्ड ड्रिंक गिलास के अन्दर हाज़िर. दूकान के बाहर बच्चे. कुछ बच्चे अपने माँ बाप के साथ. कुछ यूं ही लावारिस से आवारा से यहाँ वहां घूमते हुए उन सौभाग्यशाली बच्चों को देख रहे हैं जो चाव से आइसक्रीम खा रहे हैं कोन में, कप में लकड़ी के चम्मचों से. एक बच्ची पर मेरी निगाह पडी. कोने में खड़ी उस खम्बे के जो आइसक्रीम की दुकान के कचरे डिब्बे के ठीक सामने था. दूकान का कचरा डिब्बा जिसमें लोग आइसक्रीम खा खा के कप डाल रहे थे. हरे रंग का वो डिब्बा जिसके ऊपर एक सफ़ेद झूलने वाला ढक्कन लगा था. जब भी कोई खाली कप डालता तो पहले ढक्कन को सरकाता फिर कप डालता और चला जाता. ढक्कन देर तक झूलता रहता. रुकने को होता कि कोई और आ जाता अपना खाली कप डालने. बच्ची वहां खड़ी-खड़ी चौकन्नी निगाहों से डिब्बे को देखती रही थी इस उम्मीद में कि कोई उसमें भरा हुआ कप डाले तो वो लपक ले. फटी से एक फ्रॉक जो उसके नाप से थोड़ी बड़ी थी. अंग्रेज़ी की एक कहावत है "बेगर्स आर नॉट चूज़र्स". फ्रॉक उसके कन्धों से बार बार सरक आती थी और वो उसे हाथ से कंधे के ऊपर चढ़ा लेती. लगता था उसके अवचेतन का कोई टुकडा उस फ्रॉक से जुड़ गया था शायद. उसके एक हाथ में कई सारी लकड़ी की चम्मचें थीं आइसक्रीम खाने वालीं. तभी एक बच्चा अपने डैडी के साथ आया और एक कप जिसमें आइसक्रीम बची थी उसे ढक्कन झुलाते हुए उस हरे डिब्बे में डालने लगा. शायद उसे आइसक्रीम अच्छी न लगी हो और उसके डैडी उसे दूसरी दिलवा दें. लडकी चौकन्नी सी डिब्बे की तरफ बढ़ी. डिब्बे की ऊंचाई लडकी के कंधे तक थी. वो उस झूलते ढक्कन को एक तरफ कर उसके अन्दर झाँकने लगी. सिर डिब्बे के अन्दर, एड़ियां ज़मीन से ऊपर और पूरा वजन पंजो पर. तभी एक स्टाफ के आदमी की नज़र पडी उसपे.

"ए लडकी, चल भाग यहाँ से. चल चल. रुक बताता हूँ."


वो बाहर आने लगा. लडकी घबरा गयी. भागने के लिए अपना सिर डिब्बे से निकालने लगी. उसका सिर फंस गया ढक्कन में. लडकी बदहवास सी खींचने लगी अपना सिर और भागने लगी अंधाधुंध. पता नहीं डिब्बा कहीं टकराया या उसका पैर. उसका संतुलन बिगड़ा. वो गिर गयी. डिब्बा भी गिर गया. उसका सिर बाहर आ गया. लडकी उठी और भाग के दूर खडी हो गयी. आइसक्रीम के ढेर सारे कप ज़मीन पर बिखर गए. स्टाफ का वो आदमी गालियाँ बकने लगा शायद और डिब्बे में उन कपों को वापस भरने लगा. तभी उसकी नज़र पडी एक कप पर जिसमें आइसक्रीम थी वो भी पूरी आधे कप. शायद वो सारा माजरा समझ गया. उसने कप आगे बढाते हुए लडकी को इशारा किया लडकी दौडती हुई आयी और कप को लगभग झपटती हुई वापस भाग गयी. दूकान वाले ने अपना डिब्बा वापस उसी जगह रख दिया. लडकी बनारसी वाले के सामने खडी हो के आइसक्रीम खाने लगी अपने लकड़ी के एक चम्मच से. और तभी मुझे लगा कि मैंने कितनी ही देर से सिगरेट नहीं पी.


(Dedicated to Nirmal Varma)

Friday, September 5, 2014

एक सौ पचास प्रेमिकाएँ


एक सौ पचास प्रेमिकाएँ। ये पुस्तक है राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 15 कहानियों, 144 पृष्ठों और 95 रूपये की। पुस्तक की लेखिका हैं सुश्री इन्दिरा दाँगी। लेखिका की पृष्ठभूमि बुंदेलखंड प्रतीत होती है। कहानियों का कंटैंट तो अच्छा है ही साथ ही सबसे प्रभावित करने वाली जो चीज़ है वह है उनकी भाषा और शैली। एक नवीनता है भाषाशैली में, एक तरलता है जो सहज ही उतरती जाती है। बुंदेलखंड की जो बोली है सुनने में नमकीन लगती है। हालांकि कहानियां बुंदेलखंडी में नहीं खड़ी हिन्दी में हैं लेकिन फिर भी नमक का ज़ायका आता तो है। कहानियाँ ऐसी जो खुद अपना रास्ता बनाती हैं। समझ नहीं आता कि लेखिका ने उन्हें लिखा है या आकार दिया है। वैसे तो इस पुस्तक की सारी ही कहानियाँ अच्छी हैं लेकिन मेरे पसंदीदा है - द हीरो। यह कहानी एक सामान्य क्लर्क की कहानी है जो किसी तरह अपने इलाके के मध्याह्न भोजन का बजट कम होने से बचाता है। इन कहानियों की एक बात जो सबसे अच्छी लगी कि लेखिका ने कहानियों को एब्रप्ट एंडिंग से बचाया। मसलन कई कहानीकार कहानी को एक फिलोसोफ़िकल टच देने के लिए अंत को थोड़ा विचित्र सा कर देते हैं। मैं उन्हें किसी तरह का कोई दोष नहीं दे रहा हूँ। सबकी अपनी शैली होती है। लेकिन इधर कई लेखकों की कहानी पढ़ कर नए पाठकों का ये कहना कि अंत कुछ समझ में नहीं आया अक्सर ही होता है। लेकिन इंदिरा जी की कहानियाँ ऐसी नहीं हैं। अंत बहुत अच्छे हैं।

कुल मिलाकर किताब बहुत ही अच्छी है और पढ़ने लायक है। किताब को आप Amazon से खरीद सकते हैं। 

Saturday, July 12, 2014

वो इतवार नहीं आते



हर चन्द रोज़ों के बाद, अब इतवार नहीं आते 
आ भी गए जो गर भूले से, तो वैसे शानदार नहीं आते 

यूं तो अब भी भीग जाते हैं बारिश में कभी-कभी 
अंतस को जो तर कर छोड़े, वैसे बौछार नहीं आते 

दस पैसों में झोली भर के ख़ज़ाना कंपटों का 
ठसाठस भरे दड़बों में अब, नज़र वो बाज़ार नहीं आते 

जब से लड़के शहर गए, चाँद नोट कमाने को 
एकजुट हो खिलखिलाते, अब त्यौहार नहीं आते 

नए दोस्त आते हैं अब भी, हिक़ारत साझा करने को 
अपने कंचे मुफ्त में दे दें, यार वो दिलदार नहीं आते 

Friday, July 4, 2014

13 दिसम्बर - भारतीय संसद पर हमले का अजीबोग़रीब मामला


13 दिसम्बर - भारतीय संसद पर हमले का अजीबोग़रीब मामला। ये पुस्तक 2007 में लिखी गई थी लेकिन मैंने ये पुस्तक अभी हाल ही में पढ़ी। एक फिल्म भी है जो पिछले साल रिलीज़ हुई थी लेकिन मैंने अभी इस पुस्तक के पढ़ने के बाद ही देखी - "शाहिद"। एक समाचार भी है जो अभी हाल ही में सुनने में आया कि न्यायालय ने 26 नवंबर के दहशतगर्दाना हमलों के इल्ज़ाम में फहीम अंसारी और सबाह अलाउद्दीन को बाइज्जत बारी करने के बाद अक्षरधाम मंदिर के 6 मुस्लिम आरोपियों को भी रिहा कर दिया और साथ ही गुजरात के तात्कालीन गृहमंत्री को इस बाबत लताड़ भी लगाई।

ये तीनों ही स्रोत इस बात की ओर इशारा करते हैं की हिंदुस्तान में पुलिस, जांच और सुरक्षा एजेंसियों का जो रवैया है आतंकवाद के प्रति वो वाकई चिंताजनक है। जब भी कोई धमाका हो, हमला हो, बजाए इसके कि दोषी को सलाखों के पीछे किया जाये, अमूमन कोशिश ये होती है कि सबसे पहले तो ढेर सारे लोगों (मुसलमानों) को गिरफ्तार करो। कुछ को यातना दो थर्ड डिग्री और गुनाह कुबूल करवाओ। फिर सबूत प्लांट करो। गवाह तैयार करो। चार्जशीट तैयार करो।

पुस्तक 13 दिसम्बर जैसा कि मैंने बताया 2007 में लिखी गई थी लेकिन मैंने अभी पढ़ी है। इस पुस्तक में 13 लेख हैं और अफजल गुरु का एक इंटरव्यू भी है। ये पुस्तक इस बात पर प्रकाश डालती है कि किस तरह अफजल को इस मामले में अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया। कोई वकील तक नहीं और सुनवाई ख़त्म। एसटीएफ़ का जम्मू कश्मीर के लोगों को आए दिन परेशान करने और पैसा वसूलने जैसी बातों का भी इस पुस्तक में जिक्र आता है। दिल्ली में अरबी के प्रोफेसर गिलानी की गिरफ्तारी के खिलाफ समाज के बुद्धिजीवियों का सामने आना और फिर श्री राम जेठमलानी जैसे विद्वान वकील का पैरवी के लिए तैयार होना और फिर अदालत द्वारा उन्हें बाइज्जत रिहा करना क्या बतलाता है?

यह पुस्तक अफजल की कहानी अफजल की जुबानी भी बताती है क्यूंकी उसका एक साक्षात्कार भी है। ये पुस्तक लोगों तक अफजल मामले की सच्चाई पहुंचाने के लिहाज़ से लिखी गई थी इस अपील के साथ कि लोग आगे आयें और अफजल को फांसी की सज़ा से बचाया जा सके। अब जब चूंकि अफजल को फांसी हो ही चुकी है ये पुस्तक बहुत अनोखा नज़रिया प्रदान करती है और उस नज़रिये से हम शाहिद और अक्षरधाम हमले के फैसले को देख सकते हैं। एक और नज़रिया जो मीडिया का होता है इस तरह के मामलों में उस पर भी प्रकाश डाला गया है। 256 पृष्ठों की ये पुस्तक पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित है और इसका मूल्य 299 रूपये है। इसे आप Amazon से खरीद सकते हैं।


पुस्तक का एक अंश (साभार):
यह अफजल की दास्तान है जो हमें कश्मीर घाटी में जीवन के असली रूप की झलक दिखाती है। यह वह बालकथा नहीं है जो हम अपने अखबारों में पढ़ते हैं कि सुरक्षाबल उग्रवादियों से लड़ते हैं और निरपराध लोग क्रॉस-फायर में फंस जाते हैं। वयस्क कथाओं में कश्मीर घाटी उग्रवादियों, गद्दारों, सुरक्षा बलों, दोहरे अजेंटों, मुखबिरों, पिशाचों, ब्लैकमेल करने वालों, ब्लैकमेल हुए लोगों, जबरन वसूली करने वालों, भारत और पाकिस्तान के गुप्तचर एजेंसियों के जासूस, मानवाधिकार एक्टिविस्टों, गैर-सरकारी संगठनों और अकल्पनीय मात्रा में बेहिसाब पैसों और हथियारों से भरी हुई है। इन चीजों और लोगों को अलग करने वाली कोई स्पष्ट सीमाएं नहीं हैं, यह बताना मुश्किल है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है।

Friday, June 27, 2014

एक ज़रा ठहराव चाहता हूँ



एक ज़रा ठहराव  चाहता हूँ 
कंपकंपाती रीढ़ की सिहन नहीं 
चटचटाती आंच का अलाव चाहता हूँ 
एक ज़रा ठहराव चाहता हूँ 


झिरझिराती काई के पिरामिड नहीं
क्षितिज से उमड़ी बयार चाहता हूँ 
डबडबाती आँख कि गड़न नहीं 
झिलमिलाती फुल्की फ़ुहार चाहता हूँ 
एक ज़रा ठहराव चाहता हूँ 


आपाधापी से भरी सुनामी नहीं 
बुड़बुड़ाती बारिश कि नाव चाहता हूँ 
खून से सनी कटार नहीं 
बरगद कि छाँव में 
सुकून भरी मज़ार चाहता हूँ 


एक ज़रा ठहराव चाहता हूँ 

Friday, June 20, 2014

…तभी तो प्रेम ईश्वर के क़रीब है



प्रेम क्या है? इसकी परिभाषा देना जितना मुश्किल है अनुभव करना उतना ही आसान - सिर्फ एक संवेदनशील मन की ज़रुरत है बस, और कुछ नहीं। एक कलाकार प्रेम की इस अनुभूति को आकार देने की कोशिश करता है। चित्रकार अपने चित्र में, मूर्तिकार अपनी मूर्ति में और कवि अपने शब्दों में। "…तभी तो प्रेम ईश्वर के क़रीब है" उत्तमी केशरी जी के द्वारा रचित कविता संग्रह इस कोशिश में सौ प्रतिशत सफल है। प्रकाशक विजया बुक्स, दिल्ली के द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक १५० पन्नों की है। हार्ड कवर वाली इस पुस्तक में कुल १५० कविताएं हैं। सभी कविताएं नयी कविताएं हैं। पुस्तक का मूल्य २९५/- रुपये है।

सभी कविताएं दिल को छू लेने वाली हैं। प्रेम के ना ना प्रकार के रूप हैं अथवा उसकी अनुभूति के, इस बात का अन्वेषण करती एक दस्तावेज़ की तरह लगती है यह किताब। प्रेम, प्रेमी-प्रेमिका के दरमियाँ पसरे आयामों को संकुचित करता अपनी उपस्थिति का अहसास कराता है। वियोग में खालीपन का अहसास कराता भी प्रेम है। प्रेम प्रकृति से हो चांदनी का चांदोबा त्वचा के पोरों से रिसता हुआ हीमोग्लोबीन में मिल जाता है और महीन धमनियों और शिराओं से होता हुआ दिल की गहराइयों में अपनी शीतलता छोड़ता है। प्रेम स्वयं से हो तो गौरैया के आँखों की पुतलियों में अपने चहकते अक्स को देख सकते हैं। उत्तमी जी भाषा में एक देसीपन है, एक सोंधापन है। अक्सर ही प्रेम की रूमानियत और रूहानियत को रेखांकित करने के लिए तमाम लेखक-कवि गण उर्दू का सहारा लेते हैं कि उर्दू की नफासत रेडीमेड मिल जाती है। लेकिन उत्तमी जी निहायत ही देसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए शब्दों से चित्रकारी करती लगतीं हैं। उनके उपमान दिखाई देते हैं। प्रकृति को बहुत ख़ूबसूरती के साथ दिखाया है। मसलन "जब खिल उठी थी" की ये पंक्तियाँ :


तब
महक उठा था मन
महुआ की सुगंध-सा।
खिल उठे थे
आँगन में गुलदाउदी,
डाहलिया
और
हरसिंगार के कई फूल।


महिलाओं और दलितों के विषय भी बहुत खूबसूरती के साथ रखे हैं।  "एक संकल्प यह भी" की ये पंक्तियाँ :

मटरू मोची की बेटी टुनियाँ
अपने मन में पाले हुए है
एक आकांक्षा सवर्ण-सी।


गाँव की पृष्ठभूमि को इस तरह चित्रित किया है कि आप उसकी छोटी-छोटी बारीकियों को अपने मस्तिष्क की गहराइयों में कैद अतीत को बाहर आता महसूस कर सकते हैं। "जब गाँव याद आता है" की कुछ पंक्तियाँ:


भोर होते ही
प्रभाती गाते थे
सनफूल दादा।
इसलिए कि
धनियां फूआ के आँगन में
फैली तनी पेड़ पर
चहचहाने लगता था
चिड़ियों का झुण्ड।
अलसुबह
माँ कूटने लगती थी
ढेंकी में धान।


इस किताब की मेरी सबसे पसंदीदा कविता है "प्रत्यय", जिसकी कुछ पंक्तियाँ ये हैं :

माँ
जब लेती थी आटा की लोइयाँ
घुमाती थी बेलन से
बनाती आकार गोल-गोल
मानो वह रोटी नहीं
सूरज हो।

कभी माँ,
रोटी बेलती तो
कभी चूल्हे में सूखे जलावन डालती,
फूँक मारती और खाँसती


कुल मिलाकर पुस्तक बहुत ही अच्छी है।


Friday, June 13, 2014

मामला कब ठंडा होगा?



पिछले इतवार की बात है। रात के करीब साढ़े ग्यारह पौने बारह बज रहे होंगे। हम लोग अपने घर में सोने की तैयारी में थे। तभी मेरे ढाई साल की बेटी ने पानी मांगा और मेरे पत्नी रसोई की तरफ पानी लेने बढ़ी। मैं बेडरूम में ही अपनी बेटी के साथ था। तभी मेरे पत्नी ने ज़ोर ज़ोर से आवाज़ दी -
"अभिषेक ! अभिषेक !"
आवाज़ ऐसी कि ज़ोर की भी और धीरी भी। कुछ ऐसी कि जब इंसान चाहता तो है ज़ोर से बोलना लेकिन कोई दूसरा ना सुन ले इस कर थोड़ी दबा कर भी बोलता है। चूंकी मैं बेडरूम में था मैंने वहीं से पूछा -
"क्या हुआ?"
उसने पलट कर बोला - "जल्दी आओ"।
मैं जल्दी से हॉल में पहुंचा। उसने कहा - "सुनो"।
हम लोग अपने हॉल में दीवार से सटे सोफ़े के नजदीक आ गए। दीवार पर बनी एक खिड़की से बाहर झाँकने लगे। बाहर शोर शराबे की आवाज़। कुछ औरतें शायद रो रहीं थीं। आदमियों की भी आवाज़। कुछ स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहा था बस हो हो हा हा की तरह का कुछ शोर सुनाई दे रहा था। मैंने तुरंत अपने घर की तरफ देखा। हॉल की लाइट बंद थी। बेडरूम की लाइट भी बंद थी। बेडरूम में जो अटैच बाथरूम था उसकी बत्ती ज़रूर जल रही थी। मैंने तुरंत दौड़ कर बाथरूम की लाइट बंद की। मैं जिस इलाके में रहता हूँ वहाँ हिन्दू मुस्लिम दोनों रहते हैं। रहते क्या हैं काफी अच्छे से रहते हैं। आस पास दुकाने भी हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की हैं। एक बाजू वाले पड़ोसी हिन्दू और दूसरे वाले मुस्लिम हैं। मेरे तो मकान मालिक भी एक मुस्लिम हैं। बाकी कोई विचार मेरे दिमाग में नहीं आया। अभी चंद रोज़ पहले ही एक मुस्लिम को पुणे में जिस तरह दाढ़ी बढ़ाने और टोपी पहनने की वजह से मार दिया गया था वही घटना मेरे दिमाग में सबसे पहले आई। लगा कि यहाँ भी तो कुछ हो नहीं गया। हालांकि बैंगलोर में इसकी उम्मीद ना के बराबर थी लेकिन फिर पुणे में भी तो उनके मोहल्ले वाले यही कह रहे थे कि वहाँ भी सब सामान्य हुआ करता था। लोग अच्छे से रहते थे। वो लड़का भी सॉफ्टवेअर इंजीनियर था। बाहर से आए लोगों ने किया जो किया और वो भी फेसबुक की किसी सामाग्री को ले कर के जिसके बारे में बाद में बताया गया कि वो फ़र्ज़ी थी। हालांकि बाहर के शोर में किसी तरह की कोई नारेबाजी नहीं थी लेकिन शायद दिमाग में नारेबाजी उठ खड़ी हुई थी। गौर से सुना कि कहीं कोई हर हर महादेव या जय श्रीराम या अल्लाह हो अकबर के नारे तो नहीं। नहीं, ऐसे कोई नारे नहीं थे। फिर भी मैंने अपनी पत्नी से कहा -
"पीछे की तरफ जाओ। आना (मेरी बेटी) को भी साथ ले जाओ। बिलकुल आवाज़ ना करना। रसोई की लाइट भी बंद कर दो।"
वो मेरी बात मानते हुए पीछे की ओर चल पड़ी बच्ची के साथ। मैं धीरे से दरवाजे पर आया। बिलकुल धीरे, बगैर किसी आवाज़ के दरवाजा खोला। हमारे घर में दरवाजे के बाहर एक चैनल है जिसे सुरक्षा की दृष्टी से मकान मालिक ने बनाया था। उसमें रात में हम लोग ताला डाल के सोते हैं। मैंने चैनल का ताला नहीं खोला। तभी मेन गेट से पार मेरी निगाह एक आदमी पर पड़ी । वो आराम से टहलता हुआ चला जा रहा था। तब मुझे समझ आया कि कोई 'वैसी' बात नहीं है। मैंने चैनल खोला फिर मेन गेट। बाहर आया, देखा - पड़ोस के आगे वाले अपार्टमेंट में शायद किसी की अचानक तबीयत खराब हो गई थी और उसी वजह से हो हल्ला मचा था। उनकी ही पत्नी या बच्चे रो रहे थे और आदमी लोग गाड़ी निकाल के उन्हें अस्पताल ले जा रहे थे।

कुछ समय बाद में जब मैं वापस घर आया और अपनी पत्नी और बच्ची के साथ बैठा था तो महसूस किया उस दहशत को जिसमें थोड़ी देर पहले क़ैद था। बाद में एक दफा उन लोगों का भी खयाल आया जिनके घर के बाहर कोई भीड़ सच में आई थी। हम सभी लोगों में असुरक्षा कितनी ज़्यादा भीतर तक पैठ चुकी है। काफी देर तक हम लोग यही चर्चा करते रहे। दूसरे दिन समाचारों में पता चला कि पुणे में मुसलमानों ने दाढ़ी हटा ली है और टोपी भी कुछ दिनों के लिए नहीं पहनने का फैसला किया है। तब तक जब तक मामला ठंडा ना हो जाये। आखिर ये मामला कब ठंडा होगा?

Friday, June 6, 2014

'बिस्कुट'


जेठ का महीना था। पहाड़ों पर बर्फ़ पिघलने लगी थी। सत्तू एक टिमटिमाती बत्तियों और चकरियों वाली वज़न मापने की मशीन के स्टैंड पर बैठा था। नज़रें सामने लगे टी-स्टॉल के स्टोव की लौ से होते हुए किसी शून्य को जा रहीं थीं। मुड़े हुए घुटने और उन पर मुड़े हुए हाथ - किसी बेजान बुत सा बैठा था। ये धरासू का बस स्टैंड था। धरासू उत्तराखंड में ऋषिकेश से तक़रीबन दो सौ किलोमीटर की दूरी पर एक कसबा है। 


थोड़ी देर वहाँ बैठने के बाद सत्तू उठा और साइकिल स्टैंड से अपनी साइकिल निकाल कर चल पड़ा। थोड़ी ही देर में उसकी साइकिल बस स्टैंड के इलाक़े से बाहर निकल कर एक पगडंडी पर रेंगने लगी। धरासू चारों तरफ पहाड़ों से घिरा था। हर तरफ़ हरियाली और प्रकृति के चमत्कार। झरने, पेड़, इंद्र का धनुष और बारिश। वो साइकिल से उतर कर उसे घसीटता हुआ चढ़ाई चढ़ने लगा। पहाड़ी इलाक़ों ये सबसे बड़ा कष्ट है - जहाँ तक ढलान हो आराम से चलो पर चढ़ाई आते ही कसरत शुरू। वहाँ ऊंचे टीले पर एक मंदिर है। पुजारी भी वहीं बाजू में एक कुटिया बना के रहता है। कोई कहता है कि ये मंदिर ज़मीन क़ब्ज़िआने का तरीक़ा है। पर सत्तू को क्या। वहाँ पहुँच कर साइकिल एक पेड़ से टिका दी और मंदिर पे बने शेड में सुस्ताने लगा। पहाड़ों की चढ़ाई वाक़ई थकान भरी होती है। 

"क्या हुआ ? " - पुजारी ने पूछा। 

"कुछ नहीं" - सत्तू बोला - "बस ऐसे ही"

"आज इस समय ?"

"काम में मन नहीं लग रहा था। वैसे भी जेठ के महीने में बारिस आये तो राहगीर कहाँ से आयें ?"

"सो तो है। तुम्हारी बच्ची कैसी है ? का बोला डाक्टर ?"

"बोला कि कोई बड़ी बीमारी है। ये सुसरी बीमारियां भी गरीबों की ही दुस्मन हैं। अमीर आदमी तो इलाज करा लेवे, गरीब कहाँ को जाए ? बस भोले बाबा की ही सरन है, जो न कराये सो है।"

"चिंता न करो। भोला बाबा जरूर कुछ करेगा। ये लो आगी लगाओ।" - पुजारी बाबा माचिस आगे बढ़ाते हुए बोला। 

सत्तू माचिस जलाता है। बाबा चिलम सुलगाता है। चिलम सुर्ख़ लाल हो कर जलने लगती है जैसे किसी माणिक के अंदर कोई जुगनू बंद हो। अभी चिलम टूटे और जुगनू उड़ जाए।  कुछ देर बाद सत्तू को गांजा असर करने लगता है। सत्तू वहीँ शेड में पड़े-पड़े सो जाता है। 

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"उठो! उठो! देखो बाहर प्रलय आ गया।" - पुजारी की आवाज़ से सत्तू जागता है। "बाहर ऐसी बारिश आयी कि सब बह गया।"

"कौन बताया ?"

"मुन्ना आया था। तुम्हारी महरिया तुम्हें ढूंढ रही थी जो तुम बस स्टैंड पे नहीं थे। बता रहा था कि केदारनाथ में भोले बाबा को छोड़ कर सब कुछ बह गया। हज्जारों-हज्जार आदमी, बच्चा, बूढ़ा, औरतियां सब बह गए। प्रलय आ गया रे प्रलय आ गया।"

"अब ?"

"अब का ? सुने हैं सेना आ रही है बचाने को।"

"किसको ?"

"अबे बुड़बक ! जो बच गए हैं उनको और किसको। सुने हैं यहीं धरासू में कैम्प लगेगा।"

"अच्छा !!"

"हां। चलो तुम घर जाओ, सब चिंता करते होंगे।"

सत्तू अपनी साइकिल ले कर ढलान पर लुढ़कता हुआ घर की ओर चल पड़ता है। 


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"सुनो ! मुन्ना आया है। कहता है कि कैंप लगा है। मदद के वास्ते लोकल की पब्लिक को बुलाया है।"

"कौन बुलाया है ?"

"वो सब हमें नहीं पता। मुन्ना बाहर खड़ा है, खुदई पूछ लो।"

सत्तू बाहर आता है। 

"अबे सुना है कैंप लगा है।"

"तो ?"

"तो चल चलते हैं। पांच-पांच रुपिया का बिस्कुट चार-चार सौ में बिक रहा है।"

"अच्छा !!"

सत्तू सोच में पड़ जाता है - "बिटिया के इलाज को चाहिए बीस हजार। अगर पचास पैकिट बिक गए तो इलाज का खर्च पूरा। और लागत सिर्फ़ अढ़ाई सौ रूपया। वाह ! भोला बाबा बड़ा दयालु है।"


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सत्तू कैंप के पास पहुँचता है। सेना के जवान भी हैं और पब्लिक भी। 

"इन्हीं को बचा के लाये हैं" - सत्तू सोचता है। 

औरतें बच्चे रो रहे हैं। आदमियों की आँखों में भी दहशत है। आँखों से पता लगता है कि साक्षात मौत देख कर आये हैं। महाकाल के दरसन खातिर गए थे तांडव देख कर आये हैं। बच्चे भूख से बिलख रहे हैं। लड़के लोकल वालों को आँखों देखा हाल सुना रहे हैं - "हर तरफ पानी ही पानी ! लगता था पूरा हिमालय पिघल गया। चारों और लाशें ही लाशें। जो बचे थे वो लाशों के ऊपर सो कर रात गुज़ारे। कुछ बच्चे तो भीग के निमोनिया से मर गए।"

"अंकल ! भूख लगी है" - एक चार-पांच साल की बच्ची ने सत्तू का हाथ हिलाकर बोला। सत्तू का ध्यान टूटता है। 

"तुम्हारे माँ-बाप कहाँ हैं ?"

"पता नहीं"

"पैसे हैं ?"

"पैसे ?"

बच्ची के पूछने के तरीक़े से सत्तू समझ गया कि इसके पास पैसे नहीं हैं। 

अब इसे बिस्कुट दे दूं तो अपनी बच्ची को कैसे बचाऊँ ? इसके तो माँ-बाप बह चले, मैं भी अपनी बच्ची खो दूं क्या?

"बगैर पैसे के ना दूंगा" - सत्तू बोला। 

बच्ची आगे चल दी। शायद किसी और से खाने के लिए पूछने को। 

मैं क्यों दूँ ? मैं ना दूंगा। कोई-ना-कोई तो दे ही देगा। और जो कोई ना देगा तो सेना वाले तो देंगे ही। मैंने थोड़े ही कहा था कि यहाँ आओ। फिर मेरी कौन जिम्मेवारी बनती है। कोई पाप कहे कि पुन्य। और भोले बाबा अपने दरसनार्थियों को मार के कौन पुन्य का काम किये ? भगवान् मारे तो कुछ नहीं और आदमी के लिए पाप-पुन्य? सत्तू एक चट्टान पे बैठा सोच ही रहा था कि तभी एक शोर से सत्तू का ध्यान भंग होता है। सत्तू भाग के वहाँ जाता है।

लोग घेरा बनाये खड़े थे। सेना का एक जवान एक बच्ची को उठा के ला रहा था। 

"ये तो वोहि बच्ची है !" - सत्तू ने देखकर सोचा। 

"क्या हुआ ?" - उसने भीड़ में खड़े एक आदमी से पूछा। 

"पता नहीं। शायद बेहोश हो या शायद मर गयी हो।"

"अभी तो ठीक थी?"

"पता नहीं शायद निमोनिया हो या शायद भूखी हो। पैर फिसल के पत्थर से सिर टकराया है। पता नहीं बचे ना बचे।"

सत्तू पे अचानक जैसे पहाड़ टूट गया हो। सारी संवेदनाओं ने एक साथ जैसे काम करना बंद कर दिया हो। काटो तो खून नहीं। उस बच्ची का चेहरा याद करने कि कोशिश कर रहा था पर दिमाग में अपनी ही बच्ची दिख रही थी अस्पताल के पलंग पे पड़ी। 

"हे भोले बाबा ! ये का करा दिए ? इतना बड़ा पाप करा दिए। कहाँ जाएँ अब ?"

"भैया ! क्या बेच रहे हो ?" - एक आवाज़ से वो चौंका। सामने एक अधेड़ उम्र की औरत खड़ी थी। मन में तो आया कि कह दे ज़मीर बेच रहा हूँ, पर होठों से कुछ ना निकला। अपने झोले का मुंह खोलते हुए बिस्कुट के पैकिट उसके सामने कर दिए। 

"कितने पैसे हुए ?"

"बेचने को नहीं हैं, खाने को हैं। खा लो।" - सत्तू बोला और आगे बढ़ गया। 

पीठ पीछे उस औरत को किसी से कहते सुना - "भोले बाबा मदद जरूर करेंगे, हमको पूरा भरोसा था। "

Friday, May 30, 2014

अर्थ


विज्ञान के तमाम तर्क जहाँ ख़त्म होते हैं, भावनाएं वहीँ से जन्म लेती हैं। व्यक्तिव का निर्माण देश, काल और परिस्थिति के बगैर सम्भव नहीं है। व्यक्तित्व एक परिस्थितिजन्य परत है लेकिन स्वप्रेरणा से इसे एक कृति बनाया जा सकता है। इस परत के सुदूर अंतस में क्या है ? क्या आत्म से साक्षात्कार सम्भव है ? क्या अपनी तमाम मान्यताओं और उनसे जन्मे पूर्वाग्रहों को छोड़ पाना सम्भव है ?



प्रायः हम सभी अपने लिए एक भूमिका चुन लेते हैं और ताउम्र उसे ढोते फिरते हैं। अपनी सोच को एक खूंटे से बांधकर जो एक घेरा बनता है उसे दुनिया समझते हैं और उस खूटें को ईश्वर। क्या प्याज़ के छिल्के की तरह व्यक्तित्व के सारे आवरण हटाने पर कुछ शेष रह जाता है ? क्या आत्मा की परिकल्पना उसी बीज के होने की अवधारणा है ? इन तमाम प्रश्नों के उत्तर वही दे सकता है जो अपने सारे आवरण, सारे मुखौटे हटा पाने में सक्षम हो।

कायाकल्प एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। सुदूर अंतस में सिर्फ 'अर्थ' हैं। शब्दों के अर्थ नहीं होते, बल्कि अर्थ को व्यक्त करने के लिए शब्द बनते हैं।

जो प्रकट है - वे शब्द हैं। मूल में एक ही अर्थ है जो प्रकट होने के लिए शब्द गढ़ता है। वह जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और विशाल से विराट है - शब्द है। विराट को अपनी सीमाओं से मापना व्यर्थ है। नज़रों कि अपनी सीमा है , आकाश की नहीं। लघु को मापना भी व्यर्थ है , क्योंकि वह हमारे लघुत्तम पैमाने से भी लघु है। अनगिनत शब्द अनगिनत ब्रम्हांड रच सकते हैं। शब्द - अनादि है , अनंत है। अर्थ - निहीत है , व्याप्त है , मूल है।

ग़ालिब ने उस अर्थ को ईश्वर और ख़ुद को शब्द मानते हुए लिखा है -
न था कुछ तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने में
न होता मैं तो क्या होता 

Friday, May 23, 2014

मौसम बदल गया



झांका देखा खिड़की से तो
सब कुछ हसीन दिखता था
ताला लगाते बाहर आते
तब तक मौसम बदल गया

बैठता था वो बूढ़ा जो
प्याऊ के उस मुहाने पर
जब से पानी क़ैद हुआ
तब से जाने किधर गया

नहीं उगलती सोना चांदी
बेबसियां अब निगलती है
धीरे धीरे कसते कसते
फंदा आख़िर लटक गया

धूप ही है बस बची हुई
दे सकें जो कुछ विरासत में
पापी पेट हमारा ये
बाक़ी सब तो निगल गया

Friday, May 16, 2014

कारतूस



सब देख कर हुए नादाँ
कुछ कोई नहीं कहता 
क्यूँ पीटते हो दरवाज़े को
कि भीतर कोई नहीं रहता 

हवा का दबा के टेंटुआ
कांक्रीट के जंगल उगा लिए 
आतें लपेट दीं गर्दन पे
पर लालच नहीं ढहता 

बेबसी हमारी हुए बस आंकड़े 
यहाँ मरे इतने, उतने  वहाँ 
लेनदार पिशाचों के सिवा किसी का
एक क़तरा नहीं बहता 

तब गूंजतीं हैं आवाज़ें
नक्सलबाड़ी नक्सलबाड़ी 
अपराधी बना डाला कहके उन्हें कि
तंत्र में यक़ीं नहीं रहता 

लौटा दो हक़ उन्हें उनका 
कि वो भीख नहीं मांगते 
कि रह जाते हैं बस कारतूस ही 
शेष कोई नहीं रहता 

Friday, May 9, 2014

वो एक पल



वो दिन
वो एक पल 
जब कोई सांस कभी दुबारा 
भीतर न जा सकेगी 
दिमाग की नसों में प्रतिपल 
बौखलाए फिरते जुलूस 
थम जायेंगे 
मशीन के सभी सूचकांक
गिर जायेंगे तली में 
और बन जायेगी 
एक लकीर 
फिर कभी आइना 
ये अक्स ना देखेगा 
काल का डमरू 
थम जाएगा 
और साथ ही थम जाएगा 
उसका तांडव भी 
चंद नुक्ते चीखेंगे 
चिलाएंगे 
पर उनकी सदा के शब्द  
न पार पायेंगे 
पूर्णविराम की उस दीवार को 
जिसके पार 
कोई शब्द नहीं 
सिर्फ अर्थ होंगे 
मेरे अर्थ 
जो एकाकार होंगे 
व्याप्त से 
वो दिन 
वो एक पल 

Friday, May 2, 2014

आवेश



आवेश उसको आख़िर में 
अकेला छोड़ गया 
पानी तो कुछ देर को 
बरस कर गुज़र गया 
टपका छत से देर तलक 
टपकता छोड़ गया 

आने के पाखंडों को 
गिनवाया इस क़दर उसने 
भलाई ख़ुद की गिनाने को 
कलपता छोड़ गया 

निचोड़ के उसके इतर को 
इतनी कड़वाहट भर दी 
खुली हवा की सांस को 
तरसता छोड़ गया 

आँखें सुर्ख़ अंगारों सी 
ताप दूर से भभकता है 
नफ़रत की इक आग में 
झुलसता छोड़ गया 

Saturday, April 19, 2014

महायज्ञ



साल 1930। जवाहर लाल नेहरू लाहौर में रावी के तट पर भारत का झंडा फहरा चुके थे। कांग्रेस पूर्ण स्वराज की घोषणा कर चुकी थी। साहब सुबह सवेरे अपने घर के दालान में बैठे थे। सामने मेज पर एक खाकी टोपी और कुछ अखबार।  गहरी चिंता में लगते थे। खाकी वर्दी, घुटनों तक चढ़ते बूट और उस पर रोबदार मूंछे। साहब अंग्रेजी सियासत में दरोगा थे और इसका पता भी चलता था। बाजू में कुर्सी पर श्री बृजेश कुमार बैठे थे। लेखक थे, नेशनलिस्ट भी। कई पत्र पत्रिकाओं में अंग्रेजी सियासत के खिलाफ आये दिन छपते रहते थे और इस वजह से कई बार जेल की हवा भी खा चुके थे, पर लिखना उन्होंने कभी बंद नहीं किया। समाज में इज्जतदार थे। ये हिंदुस्तान के इतिहास का वो दौर था कि जब कोई अंग्रेजों की खिलाफत में जेल जाता था तो समाजियों में उसकी इज्जत बढ़ जाती थी। जितने ज्यादा दिन अंदर रहता, बाहर इज्जत भी उसी अनुपात में अनवरत बढ़ती रहती। वैसे बृजेश कुमार एक दलित परिवार से थे और समाज में दलितों के खिलाफ सवर्णों के शोषण पर भी लिखते थे।  इसीलिए तो साहब के बराबरी में कुर्सी पर बैठे थे वरना किसी आम दलित की इतनी हिम्मत कहाँ कि जूता पहन के दालान के अंदर भी घुस जाए। अभी कुछ ही समय हुए इस कस्बे में आये थे और यहीं साहब के सरकारी आवास के सामने एक किराए के कमरें में रहते थे। अक्सर ही साहब के यहाँ आना जाना लगा रहता था। वैसे साहब को यह बृजेश कुमार फूटी आँख नहीं सुहाता था - एक तो दलित ऊपर से नेशनलिस्ट। साहब की तो रग-रग में महारानी की वफादारी दौड़ती थी। शास्त्रों में भी लिखा है कि अपने अन्नदाता से गद्दारी सबसे बड़ा पाप है, हालांकि पाप-पुण्य से ज़्यादा साहब को अपनी रसूख से सरोकार था। पाप-पुण्य तो महज़ एक तर्क है जो इंसान अपनी नीचता को ढकने के लिए कहीं से भी खोज ही लेता है। शायद यह एक ऐसी बात हो जो किसी भी दौर में एक-सी रहे। बाजू में रामलाल खड़ा था जो साहब के नीचे सिपाही हुआ था, उन्हीं की सिफारिश पे, और इसलिए साहब के लिए वफादारी भी और सिपाहियों से थोड़ी ज्यादा थी। घर के भीतर थीं श्रीमती निर्मला देवी, साहब की धर्म-पत्नी। बाँझ थीं और शायद इसीलिए प्रताड़ना की अधिकारी भी जो कि उन्हें साहब से बराबर मिलती भी थी।


इसी बीच निर्मला देवी का दरवाजे से आगमन। चेहरा पूरी तरह घूंघट के भीतर, हाथों में चाय की ट्रे। रामलाल ने लपक के चाय की ट्रे उनके हाथों से ली और साहब के सामने मेज पे रख दी। निर्मला देवी दालान में लगे पौधों से तरकारी चुनने आगे बढ़ गयीं। साहब ने ट्रे से चाय का प्याला उठाया, एक सुड़की ली और द्रुत गति से उठ पर दरवाजे को लौटती निर्मला देवी की तरफ अपना रुख़ किया। किसी की परवाह किये बगैर सबके सामने निर्मला देवी के चेहरे पर अपने हाथ से एक ज़ोरदार  प्रहार कर दिया। हाथ एक दरोगा का था। निर्मला देवी किसी सूखे पत्ते सी ज़मीन पर गिर गयीं। सिर का पल्लू भी गिर गया और आँचल की तरकारी भी। शायद चाय ठंडी हो गयी हो या शायद शक्कर कम रह गयी हो। साहब तुरंत पलट कर अपनी खाकी टोपी उठा कर ड्यूटी पर चल दिए। पीछे-पीछे रामलाल भी दौड़ा। बृजेश कुमार कुर्सी पर बैठे के बैठे रह गए। क्या प्रतिक्रिया दें कुछ नहीं सूझता था। घरेलू हिंसा के बारे में काफी सुना था लेकिन इस तरह किसी रसूखदार दरोगा के दालान में इसकी उम्मीद न थी। खुद को थोड़ा सम्भाल कर उठे और ज़मीन पर पड़ी निर्मला देवी की तरफ बढे। निर्मला देवी के सिर से खून बह रहा था। क्यारी की ईंट से सिर टकरा गया लगता था। हाथ पकड़ कर सहारा देते हुए कुर्सी पर बैठाया। निर्मला देवी की आँखों में शर्मिंदगी थी।पराये लोगों के सामने साहब ने हाथ उठा दिया। सब क्या सोचते होंगे मेरे बारे में। बृजेश कुमार ने अपने कुर्ते की जेब से रुमाल निकाल के निर्मला देवी के सिर की तरफ बढ़ाया। निर्मला देवी और भी ज़यादा असहज हो गयीं। बृजेश कुमार के हाथ से रुमाल ले कर खुद ही अपनी चोट पर रख लिया। चेहरे का घूंघट कब ही का हट चुका था। बृजेश कुमार भी बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गए। 

"मुझे अफ़सोस है जो हुआ" - बृजेश कुमार चुप्पी तोड़ते हुए बोले 

"अपने अफ़सोस को यूं ज़ाया न कीजिये"

"ऐसा क्यों कहतीं हैं ?"

निर्मला देवी बात बदलतीं हुईं बोलीं - "आपके रुमाल पे दाग़ आ गया।"

"रुमाल की फिक्र ना कीजिये, मेरे पास दो और भी हैं।"

निर्मला देवी कुछ ना बोलीं। 

"चोट ग़हरी लगती है। मैं मरहम ले के आता हूँ।" - थोड़ी चुप्पी के बाद बृजेश कुमार बोले 

"ये चोट मरहम से ठीक न होगी"

"जो मरहम चोट ठीक न कर सके तो मरहम काहेका"

"कुछ चोट नसीब की होती है। इसमें मरहम का कोई दोष नहीं।"

"माफ़ कीजियेगा, पर अपना नसीब हम खुद चुनते हैं।"

"कहना आसान है, करना मुश्किल।"

"मैं ये नहीं कहता कि करना आसान है। पर आसान रास्ते चुनकर नसीब को दोष देना भी तो ठीक नहीं। "

"मेरी जगह होते तो समझते। "

"मैं आप ही की जगह हूँ।"

"वो कैसे?"

"एक दलित हूँ और दलितों की सवर्णों के बीच क्या स्थिति होती है ये तो आपको बताने की ज़रुरत नहीं है। पर मैंने शोषण को कभी अपना नसीब नहीं समझा, उसका विरोध किया और आज समाज मुझे अपने सम्मान से जीने अधिकार से अलग नहीं कर सकता।" 

"आप पुरुष हैं ना। औरत की मजबूरी नहीं समझेंगे।"

"जब तक आप ये सोचती रहेंगी कि किसी काम को क्यूँ ना किया जाए, तब तक आप उसे कर भी नहीं पाएंगी। अपने आप को इन बेतुके तर्कों से बचाएं।" बृजेश कुमार ने मेज पे रखे अखबारों में से एक अपने हाथ में उठाते हुए कहा - "ये देखिये पहले पृष्ठ पे किसकी तस्वीर छपी है?"


"कौन हैं ये ?"

"ये सरोजिनी नायडू हैं। गांधी जी की दांडी यात्रा में कदम से कदम मिला कर चलती हुईं। औरत चाहे तो कुछ भी कर सकती है। अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाना आना चाहिए बस।"

निर्मला देवी की नज़रें अखबार में बने चित्र को देखने लगीं। मन किसी गहरी सोच में डूब गया लगता था और उसका प्रतिबिम्ब उनके चेहरे पे बदलते भावों में झलक रहा था। बृजेश कुमार उन तैरते हुए बदलावों को देख रहे थे। सहसा निर्मला देवी का ध्यान बृजेश कुमार की ओर गया। उनको अपनी तरफ यूं ग़ौर से देखते हुए असहज हो उठीं।

"चलिए मैं चलती हूँ। खाने की तैयारी करनी है। आपका रूमाल मैं धो कर भिजवा दूंगी।"

"ठीक है, मैं भी चलता हूँ।"

बृजेश कुमार नमस्ते की मुद्रा में उठे और मुख्य द्वार की ओर प्रस्थान करने लगे। निर्मला देवी उन्हें जाते हुए देखती रहीं। उनके जाने के बाद भी एक बार फिर अखबार के उस चित्र को देखने लगीं।

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निर्मला देवी अपने कक्ष में आईने के सामने बैठी थीं। श्रृंगार मेज पर रखा था वही अखबार। सरोजिनी नायडू के उस चित्र को देखतीं फिर आईने में अपने अक्स को। क्या हर औरत के भीतर कोई सरोजिनी नायडू हो सकती है? क्या मेरे भीतर भी है? जाने क्या सोच कर उठीं और उस खोली की तरफ चल दीं जहाँ पुराने अखबारों के ढेर रखे रहते थे। उस ढेर से एक अखबार निकाला। चित्रों में कुछ ढूंढने लगीं। एक चित्र दिखा। पुलिस क्रांतिकारियों पर लाठी चार्ज करती हुई और औरतें घायल क्रांतिकारियों की मरहम पट्टी करती हुईं। शायद बृजेश बाबू सही कहते हैं। ज़माना बदल गया है। औरतें क्रांतिकारियों के साथ कदम से कदम मिला कर भी चल सकती हैं। सरोजिनी नायडू अकेली नहीं हैं, उनका साथ न जाने कितनी ही औरतें दे रहीं हैं। औरत चाहे तो कुछ भी कर सकती है। चित्र पर दुबारा गौर किया। पुलिस अधिकारी के चेहरे पर रौब, बिलकुल साहब जैसा। मन अचानक सिहर उठा। अखबारों को फिर से जमा दिया और खोली से बहार आ गयीं और चल दीं घर के पीछे की तरफ जहां कपड़े सूखने डले थे। रस्सी से बृजेश कुमार का रूमाल उठा भीतर ले आयीं।

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अगले दिन साहब के ड्यूटी पर जाने के बाद माली से बृजेश कुमार को संदेसा भिजवाया। ज़रा सामने वाले बृजेश बाबू से कहना कि मैंने बुलाया है। माली बृजेश कुमार के घर की तरफ चल दिया। घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खुला। घर क्या छोटा सा कमरा था। एक कोने में खाना बनाने का कुछ सामान। चूल्हा शायद घर के पीछे की तरफ हो। ज़मीन पर ही कोने में एक चटाई पर बिछौना लगा था। हर तरफ कागज़ ही कागज़।अलमारी खुली हुई और सारे कपड़ों का एक ढेर ज़मीन पे। माली ये दृश्य देख पहले तो थोड़ा चौंका। फिर बोला - "जी मैं वो सामने दरोगा साहब के यहाँ से आया हूँ। मेम साब ने बुलवाया है।"

"ठीक है आता हूँ अभी"

माली वापस चल दिया। निर्मला देवी जैसे माली के आने की ही राह तक रहीं थीं। चेहरे के भाव छुपाते हुए बोलीं - "बोल के आया?"

"अभी थोड़ी देर से आ रहे हैं।"

"कितनी देर से? कुछ कहा?"

"नहीं बस कहा कि अभी आता हूँ "

"क्या कर रहे थे बृजेश बाबू?"

"पता नहीं घर समेट रहे थे या बिखेर रहे थे। पूरा सामान कमरे में अस्त-व्यस्त। शायद छोड़ कर जा रहे हों यहाँ से"

निर्मला देवी का मन धक से हो आया। छोड़ के जा रहे हैं? क्यों? कहाँ? कब?

निर्मला देवी सोच में डूबी ही थीं कि सामने मुख्य द्वार से बृजेश कुमार का प्रवेश।

निर्मला देवी बगैर किसी तक़ल्लुफ के बोल पड़ीं - "कहाँ जा रहे हैं ?"

"आप से किसने कहा कि मैं कहीं जा रहा हूँ।"

"माली कह रहा था कि आप कहीं जाने के लिए सामान जमा रहे थे।"

"वो.. हाँ.. गांधी जी दांडी के लिए निकल पड़े हैं। लोग कह रहे थे कि इसके बाद अंग्रेजी सामानों की होली जलाएंगे, तो मैं भी अपने सारी अंग्रेज़ी वस्तुएं अलग कर रहा था। कल जब यात्रा हमारे यहाँ से निकलेगी मैं भी सोच रहा हूँ उसी क़ाफ़िले के साथ हो लूं।"

"माली बता रहा था कि गांधी जी कहते हैं कि कोई एक गाल पे मारे तो दूसरा आगे कर दो। ये क्या बात हुई? ऐसे तो मिल चुकी आज़ादी।"

"गांधी जी ये ज़रूर कहते हैं कि दूसरा गाल आगे कर दो लेकिन कभी विरोध छोड़ने को नहीं कहते। अभी भी वो नमक क़ानून तोड़ने दांडी जा रहे हैं। कोई उन पर लाठी चलाये तो वो पलट के वार नहीं करेंगे पर दांडी के रास्ते से एक क़दम भी नहीं हटाएंगे।"

"आप गांधी जी के बड़े भक्त लगते हैं।"

"बस अंग्रेजों से इस देश को मुक्ति मिल जाए, और मुझे क्या चाहिए?"

"साहब भी क्रांतिकारियों को लाठियों से मारे हैं?"

"सच कहूँ तो.. हाँ। हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी हमारे ये अपने ही लोग हैं।"

"ये तो देश से गद्दारी हुई।"

"हुई तो"

"गद्दारों के लिए भी हिंसा नहीं?"

"नहीं। किसी के लिए भी नहीं। गांधी जी कहते हैं कि हिंसा अच्छे प्रयोजन के लिए भी की जाए तो भी वो अच्छाई क्षणिक ही होती है पर हिंसा का रास्ता हमेशा के लिए एक आदर्श बन जाता है। कालान्तर में लोग अच्छाई और बुराई को अपने अपने नज़रिये से देखेंगे। हिंसा को आदर्श मान लेने पर समाज में एक ऐसी अराजकता फैलेगी जो किसी के क़ाबू किये नहीं थमेगी।"

"आपके सारे तर्क हमारी समझ में तो नहीं आते पर लगता है कि कुछ अच्छा ही होगा। आप यहाँ से चले जायेंगे?"

"सोच तो कुछ ऐसा ही रहा हूँ।"

"और हम?"

बृजेश कुमार अचानक चौंक गए। निर्मला देवी भी खुद को मन ही मन कोसने लगी। हाय ये मैं क्या कह गयी? ये जुबां भी न जाने कब कहाँ बेतकल्लुफी में कैसे फिसल जाए। दिमाग में एक चुभन सी होने लगी और उस पर अचानक पसरी ये दम घोंटू खामोशी। बृजेश कुमार खामोशी तोड़ते हुए बोले - "माली कह रहा था कि आपको कुछ काम था।"

"जी बस आपका रूमाल लौटाना था" - निर्मला देवी रूमाल बृजेश कुमार की ओर बढ़ाती हुई बोलीं।

रूमाल लेते बृजेश कुमार हुए बोले - "तो मैं चलूँ।"

"चाय लेंगे?"

"नहीं बस इजाज़त दीजिये"

"फिर कब आयेंगे?"

"जब आप बुलावा भेजें।"

"आप तो मोर्चे के साथ चले जायेंगे फिर हम कैसे बुलावा भेजेंगे? आपको एक बात बताएं, कल एक लम्हा ख़याल आया था कि काश हम भी सरोजिनी नायडू जी का साथ देने को निकल पड़ें। जो कहीं साहब लाठी चार्ज कर दे मोर्चे पर तो हम भी क्रांतिकारियों की मरहम पट्टी करें। अपने होने का शायद कोई अर्थ निकल आये।"

"ख़याल तो बहुत नेक है। बहुत सी महिलाएं अपने पतियों के साथ इस क्रांति में चल पडी हैं और बहुत सी अपने घरबार को छोड़ कर। "

"हमें ले चलेंगे अपने साथ।"

"मैं तो इस देश के हर व्यक्ति को इस आंदोलन में जोड़ना चाहता हूँ। चाहे वो आदमी हो या औरत। कल हमारे यहाँ से दांडी यात्रा गुज़रेगी। बहुत से लोग उस यात्रा में गांधी जी के साथ हो लेंगे। हम लोग भी हो लेंगे।"

"मैं आपकी आभारी हूँ" - कहते हुए निर्मला देवी की आँखों से आंसू छलक उठे।

बृजेश कुमार ने रूमाल दुबारा निर्मला देवी की तरफ बढ़ाते हुए कहा - "इस रूमाल को अब आप ही रख लें।"

निर्मला देवी के चेहरे पर रोते रोते भी एक मुस्कराहट तैर उठी। मन का ताप उतर रहा था।

अचानक मुख्य द्वार से रामलाल का प्रवेश। रामलाल को देख कर जैसे निर्मला देवी को सांप सूंघ गया हो। हड़बड़ाते हुए बोलीं - "बृजेश बाबू, आप अब जाइये यहाँ से।"

बृजेश कुमार बोले - "कल सुबह मैं आपको लिवाने आउंगा।"

बृजेश कुमार के ये शब्द रामलाल के कानों तक भी पहुंचे। निर्मला देवी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। अब क्या होगा? रामलाल कहीं साहब से न कह दे। इस क़ैद से मुक्ति के लिए एक किरन नज़र आयी थी वो भी अब धुंधलाने लगी थी। कहीं बृजेश बाबू को कुछ हो न जाए। हे भगवान् रक्षा करना। आँखें मुंद गयीं और हाथ जुड़ गए। होंठ कुछ बुदबुदाने लगे। किसी मनोकामना का हवन और उसमें अश्रुओं की आहुति।

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अगली सुबह। साहब ड्यूटी के लिए तैयार। बाहर बहुत से सिपाही और हवलदार भी खड़े थे। आज गांधी जी की यात्रा आनी थी। साहब चिंता में दीखते थे। निर्मला देवी साहब के जाने की प्रतीक्षा कर रहीं थीं। ये ड्यूटी पे निकले और मैं आज़ाद। सरोजिनी नायडू का चित्र अखबार से काट कर अपने सामान में रख लिया था। साहब ने रामलाल की तरफ देखा। रामलाल ने अपना सिर हिलाया, जैसे इशारों इशारों में कह रहा हो कि काम हो गया। साहब के होंठों पे तिरछी मुस्कान, जैसे मन ही मन अभी किसी की खिल्ली उड़ाई हो। दरवाज़े के परदे से झांकती निर्मला देवी ये मौन संवाद देख कर सिहर उठीं। कहीं कुछ शैतानी हुआ लगता था। दिल ज़ोरो से धड़क रहा था। मन में दुःख, संताप, उम्मीद और पश्चाताप के भाव एक साथ उमड़ रहे थे। तभी देखा कि साहब मुख्य द्वार से जा चुके थे और सभी सिपाही भी। निर्मला देवी निकलीं और दौड़ती हुईं सामने के मुख्य द्वार से होतीं हुईं बृजेश कुमार के घर की तरफ दौड़ पड़ीं। घर का दरवाज़ा खुला था। निर्मला देवी घर के भीतर पहुंच गयीं। घर में कुल एक ही कमरा था। बृजेश बाबू वहाँ नहीं थे। एक झोला रखा था जिसमें शायद जाने का सामान रखा हो। निर्मला देवी से रहा नहीं गया। झोले को टटोला। एक डायरी निकली। डायरी के पन्ने पलटने पर एक तह किया कागज़ नीचे फर्श पर टपका। कागज़ को खोला। कुछ लिख के काटा गया था। कटे हुए अक्षरों को गौर से देखा, लिखा था - "निर्मला"। निर्मला देवी वहीं बैठ गयीं। सामान तो यहीं है फिर वो यात्रा में शामिल होने तो नहीं गए। कहीं और गए तो दरवाज़ा खुला क्यों? ताला क्यूँ नहीं? कुछ तो ग़लत है। सहसा एक पड़ोसी दरवाज़े पर आया। निर्मला देवी अपने आंसू पोछते हुए बोलीं - "बृजेश बाबू कहाँ हैं?"

"कल रात को पुलिस के दो आदमी आये थे और उन्हें ले गए।"

"कहाँ?"

आदमी कुछ न बोला।

"भगवान के लिए बता दीजिये कहाँ?"

"पास वाले गाँव के एक कुंए में उनकी लाश मिली है। उनके घर वालों को पुलिस इत्तेला कर रही है।"

निर्मला देवी की आँखों के सामने पूरी ज़मीन हिलने लगी। लग रहा था आसमान और ज़मीन के बीच कहीं लटका हुआ था बृजेश बाबू का कमरा।

"क्या हुआ ऐसी अहिंसा से?" निर्मला देवी ज़ोर से चीखीं।


तभी कहीं दूर से ढोल मंजीरों की आवाज़ कानों में आयी। दांडी यात्रा शहर में पहुँच चुकी थी। उन आवाज़ों में लगा कि बृजेश बाबू के शब्द हवा में तैर रहे हैं - "अपना नसीब हम खुद चुनते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किल आ जाए विरोध नहीं छोड़ेंगे। बस अंग्रेजों से इस देश को मुक्ति मिल जाए, और मुझे क्या चाहिए?" मंजीरों की आवाज़ नज़दीक आ रही थी। निर्मला देवी ने कमरा एक बार फिर से देखा। कोने में एक पोटला पड़ा था। खोल के देखा। कुछ कपडे थे। वे कपडे जो ये क्रांतिकारी इंक़लाब के इस यज्ञ में स्वाहा करना चाहता था। निर्मला देवी ने एक बार फिर बृजेश बाबू के उसी रुमाल  से अपने आंसू पोछे और उस पोटले को कंधे पर उठा चल पड़ीं मंजीरों की आवाज़ की दिशा में। महायज्ञ में एक और क्रांतिकारी जन्म ले चुका था। ज़ुल्म के बंधनों को तोड़ कर आज़ादी भविष्य के मंजीरों की तरफ कदम बढ़ा रही थी। अगले ही दिन गांधी जी ने भी दांडी में नमक का कानून तोड़ दिया।